आपराधिक कानून एवं नागरिक अधिकार ⏱️ 5 मिनट 📅 2026-10-07

Police Arrest Rules (BNSS 35): 7 साल से कम सजा में बिना नोटिस गिरफ्तारी अवैध, नागरिक अधिकार SOP

एड
एडवोकेट राजेश शर्मा
वरिष्ठ आपराधिक विधि सलाहकार एवं बीएनएसएस शोधार्थी

एडवोकेट राजेश शर्मा भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) एवं नागरिक अधिकारों के विशेषज्ञ विधिक सलाहकार हैं।

⚡ त्वरित उत्तर (Quick Answer)

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 35 (पूर्ववर्ती CrPC 41A) के तहत जिन अपराधों में अधिकतम सजा 7 वर्ष या उससे कम है, उनमें पुलिस किसी भी नागरिक को सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। पुलिस के लिए अनिवार्य है कि वह पहले औपचारिक लिखित 'Notice of Appearance' (उपस्थिति का नोटिस) जारी करे। यदि नागरिक नोटिस का पालन करते हुए पूछताछ में सहयोग करता है, तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों या अस्वस्थ व्यक्तियों की गिरफ्तारी के लिए डीएसपी की पूर्व अनुमति अनिवार्य है।

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📑 विषय सूची (Table of Contents)

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कानूनी धारा व नियम: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) धारा 35 व धारा 43 (पूर्ववर्ती CrPC 41A व 41B) | संकानूनी संरक्षण: भारत का संविधान अनुच्छेद 21 व 22 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं गिरफ्तारी के विरुद्ध अधिकार) | सर्वोच्च न्यायालय मिसाल: अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) 8 SCC 273 व डी.के. बसु दिशानिर्देश | कानूनी सुरक्षा: 7 वर्ष से कम सजा वाले गंभीर अपराध (Cognizable Offence)ों में गिरफ्तारी के स्थान पर उपस्थिति नोटिस अनिवार्य
⚡ तुरंत समाधान (Quick Answer): यदि पुलिस आपके घर या दफ्तर आकर किसी मुकदमे में आपको सीधे थाने ले जाने या हथकड़ी लगाने की धमकी दे रही है, तो अपने अधिकारों को पहचानें। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 35 के अनुसार, यदि आपके खिलाफ दर्ज मामले में अधिकतम सजा 7 साल या उससे कम है (जैसे चेक बाउंस, सामान्य धोखाधड़ी, 498A, जमीन विवाद, साधारण मारपीट), तो पुलिस आपको सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। पुलिस का कानूनी दायित्व है कि वह पहले आपको लिखित रूप में 'हाजिरी का नोटिस' (Notice of Appearance) दे। जब तक आप उस नोटिस के अनुसार थाने जाकर पूछताछ में सहयोग करते हैं, तब तक पुलिस आपको गिरफ्तार करने का कोई कानूनी हक नहीं रखती। बिना ठोस लिखित आधार के की गई गिरफ्तारी गैर-कानूनी होती है।

विषय सूची (Table of Contents)

पुलिस की गिरफ्तारी की शक्ति और उस पर संकानूनी व कानूनी अंकुश

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भारत में पुलिस को लेकर आम नागरिक के मन में सबसे गहरा भय 'अकारण गिरफ्तारी' और थाने की हवालात में बंद किए जाने का होता है। भ्रष्ट पुलिसकर्मी अक्सर विरोधी पक्ष से मिलीभगत करके या पैसे ऐंठने के लिए किसी भी छोटी सी शिकायत पर नागरिक के घर दबिश देकर हथकड़ी लगाने की धमकी देते हैं।

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ा है:

  • संविधान का अनुच्छेद 21: किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से केवल "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" के तहत ही वंचित किया जा सकता है। पुलिस की व्यक्तिगत मर्जी से नहीं।
  • संविधान का अनुच्छेद 22(1): प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी का वास्तविक कारण तुरंत जानने और अपनी पसंद के वकील से गोपनीय परामर्श लेने और बचाव करने का अक्षुण्ण अधिकार है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक सिद्धांत: "गिरफ्तारी की शक्ति होना एक बात है, और उस शक्ति का प्रयोग करने का न्यायोचित आधार होना बिल्कुल दूसरी बात है।" केवल एफआईआर में नाम होने से पुलिस को किसी को भी तुरंत हथकड़ी लगाने का लाइसेंस नहीं मिल जाता।

BNSS 2023 की धारा 35 का सच: 7 साल तक की सजा में गिरफ्तारी क्यों वर्जित है?

1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 35 (जो पुराने CrPC की धारा 41A का संवर्धित रूप है) ने पुलिस की मनमानी गिरफ्तारी की शक्ति पर कड़ा कानूनी ताला लगा दिया है:

BNSS धारा 35(1) का सीधा कानूनी अधिदेश:

जिन अपराधों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) या किसी अन्य कानून के तहत सजा 7 वर्ष से कम है या 7 वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है, उनमें पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को सीधे गिरफ्तार नहीं करेगा। पुलिस अधिकारी उस व्यक्ति को अपने समक्ष उपस्थित होने के लिए एक लिखित नोटिस (Notice of Appearance) जारी करने के लिए बाध्य है।

  • नागरिक का कर्तव्य: नोटिस में निर्दिष्ट तिथि, समय और स्थान पर पुलिस अधिकारी के समक्ष उपस्थित होना और पूछे गए प्रश्नों का सत्य उत्तर देना।
  • गिरफ्तारी पर पूर्ण प्रतिबंध: धारा 35(2) में स्पष्ट लिखा है: "जहाँ ऐसा व्यक्ति नोटिस का पालन करता है और उसका पालन करना जारी रखता है, उसे उस नोटिस में उल्लिखित अपराध के लिए तब तक गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, जब तक कि पुलिस अधिकारी लिखित रूप में कारण दर्ज न करे कि उसकी राय में उसे गिरफ्तार किया जाना आवश्यक है।"

यानी यदि आप पुलिस की जांच में सहयोग कर रहे हैं और थाने पहुंचकर अपना बयान दर्ज करा रहे हैं, तो पुलिस अधिकारी आपको गिरफ्तार नहीं कर सकता। यदि वह फिर भी गिरफ्तार करना चाहता है, तो उसे केस डायरी में ठोस सबूत दर्ज करने होंगे कि आप गवाहों को धमका रहे हैं या देश छोड़कर भागने की फिराक में हैं।

60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों व बीमार व्यक्तियों की गिरफ्तारी हेतु DSP की पूर्व अनुमति अनिवार्य

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BNSS 2023 में वरिष्ठ नागरिकों और गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों के मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व सुरक्षा कवच जोड़ा गया है:

  • धारा 35(7) का नया कानूनी नियम: यदि किसी व्यक्ति पर ऐसा अपराध करने का आरोप है जिसमें 3 वर्ष से कम की सजा है, और वह व्यक्ति 60 वर्ष से अधिक आयु का वरिष्ठ नागरिक है या किसी गंभीर बीमारी/दुर्बलता (Infirmity) से ग्रस्त है, तो पुलिस का जांच अधिकारी (IO / Sub-Inspector) उसे सीधे गिरफ्तार करने का साहस भी नहीं कर सकता।
  • डीएसपी स्तर के अधिकारी की पूर्व लिखित अनुमति: ऐसे बुजुर्ग या अस्वस्थ व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए कम से कम उप-पुलिस अधीक्षक (DSP / ACP) स्तर के राजपत्रित अधिकारी की पूर्व लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है। डीएसपी को यह संतुष्ट होना पड़ेगा कि गिरफ्तारी के बिना जांच संभव नहीं है।

अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य: अनावश्यक गिरफ्तारी पर पुलिसकर्मियों को जेल व अवमानना

सर्वोच्च न्यायालय का लैंडमार्क जजमेंट अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) 8 SCC 273 आज भी भारत के प्रत्येक पुलिस अधिकारी और न्यायिक मजिस्ट्रेट पर पत्थर की लकीर की तरह लागू होता है:

  1. चेकलिस्ट भरना अनिवार्य: 7 साल से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी करते समय पुलिस अधिकारी को अर्नेश कुमार चेकलिस्ट के सभी बिंदुओं को भरना होता है और मजिस्ट्रेट के सामने यह साबित करना होता है कि गिरफ्तारी क्यों अपरिहार्य थी।
  2. मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी: यदि पुलिस किसी आरोपी को बिना धारा 35 नोटिस दिए सीधे मजिस्ट्रेट के सामने रिमांड के लिए पेश करती है, तो मजिस्ट्रेट का कानूनी कर्तव्य है कि वह पुलिस रिमांड खारिज करे और आरोपी को उसी क्षण रिहा कर दे।
  3. दोषी पुलिस अधिकारी पर विभागीय जांच व अवमानना: यदि कोई पुलिसकर्मी अर्नेश कुमार गाइडलाइंस और धारा 35 का उल्लंघन करके किसी नागरिक को अवैध रूप से गिरफ्तार करता है, तो वह न केवल विभागीय कार्रवाई और निलंबन का भागीदार बनता है, बल्कि संबंधित उच्च न्यायालय (High Court) उसके खिलाफ अदालत की अवमानना (Contempt of Court Act 1971) की सीधी कार्रवाई करके उसे जेल भेज सकता है।

BNSS धारा 43: गिरफ्तारी ज्ञापन (Arrest Memo) व स्वतंत्र गवाह के अनिवार्य नियम

यदि किसी जघन्य अपराध (7 साल से अधिक सजा) में पुलिस को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना ही पड़ता है, तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 43 (पूर्ववर्ती CrPC 41B) के तहत गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है:

  • नेमप्लेट और वर्दी: गिरफ्तारी करने वाले प्रत्येक पुलिस अधिकारी की वर्दी पर उसका नाम, पद और बेल्ट नंबर स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकने योग्य होना चाहिए। सादे कपड़ों में बिना पहचान दिखाए किसी को उठाना अपहरण की श्रेणी में आता है।
  • गिरफ्तारी ज्ञापन (Arrest Memo): मौके पर ही एक औपचारिक अरेस्ट मेमो तैयार किया जाना अनिवार्य है। इसमें निम्नलिखित का उल्लेख होना चाहिए:
    1. गिरफ्तारी का सही समय, तारीख और सटीक स्थान।
    2. मौके पर उपस्थित कम से कम एक स्वतंत्र प्रतिष्ठित गवाह या गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार के सदस्य के हस्ताक्षर।
    3. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के स्वयं के प्रतिहस्ताक्षर (Countersignature)।
  • परिवार को तुरंत सूचना देने का अधिकार (धारा 48): गिरफ्तार व्यक्ति को यह कानूनी हक है कि पुलिस उसकी गिरफ्तारी और उसे किस थाने की हवालात में रखा गया है, इसकी तत्काल सूचना उसके द्वारा बताए गए किसी परिजन या मित्र को फोन या वायरलेस द्वारा दे।

हथकड़ी लगाने पर सुप्रीम कोर्ट व कानून की सख्त पाबंदी: कब लगाई जा सकती है हथकड़ी?

फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को पकड़ते ही हथकड़ी पहना देती है। वास्तविकता में भारतीय कानून में हथकड़ी लगाना एक अत्यंत दुर्लभ और असाधारण कदम है:

  • प्रेम शंकर शुक्ला बनाम दिल्ली प्रशासन (सुप्रीम कोर्ट): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि किसी भी विचाराधीन कैदी या आरोपी को सामान्य रूप से हथकड़ी लगाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मानवीय गरिमा का घोर उल्लंघन है।
  • BNSS 2023 धारा 43(3) के सीमित नियम: नए कानून के तहत पुलिस केवल आदतन, खूंखार अपराधियों, आतंकवादियों, हत्या, बलात्कार, संगठित अपराध सिंडिकेट, या उन कैदियों को ही अदालत ले जाते समय हथकड़ी लगा सकती है जिनके पुलिस हिरासत से भागने या हिंसक हमला करने का ठोस दस्तावेजी रिकॉर्ड मौजूद हो।
  • सामान्य मामलों, वित्तीय अपराधों, वैवाहिक विवादों या छोटे मुकदमों में किसी भी आरोपी को हथकड़ी लगाना पूर्णतः गैर-कानूनी है। यदि पुलिस ऐसा करती है, तो संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ मानवाधिकार हनन का वाद दायर किया जा सकता है।

गिरफ्तार व्यक्ति के 6 मौलिक अधिकार: मेडिकल जांच, वकील से परामर्श व 24 घंटे में पेशी

यदि किसी नागरिक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है, तो कानून उसे निम्नलिखित 6 अचूक सुरक्षा कवच प्रदान करता है:

  1. गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार (BNSS धारा 47): पुलिस को लिखित रूप में बताना होगा कि किस एफआईआर, किस धारा और किस आरोप के तहत हिरासत में लिया गया है और क्या अपराध जमानती (Bailable) है या गैर-जमानती।
  2. जमानती अपराध में थाने से ही जमानत का अधिकार: यदि अपराध जमानती है (जैसे धारा 138, साधारण मारपीट, लापरवाही से गाड़ी चलाना), तो पुलिस को थाने में ही मुचलका लेकर तुरंत छोड़ना होगा; वह जेल नहीं भेज सकती।
  3. वकील से मिलने का अधिकार (BNSS धारा 38): पूछताछ के दौरान (पूरे समय नहीं तो भी) अपने वकील से मिलने और कानूनी परामर्श लेने का अधिकार।
  4. हर 48 घंटे में अनिवार्य सरकारी मेडिकल जांच (BNSS धारा 53): हिरासत में लेने के तुरंत बाद और उसके बाद प्रत्येक 48 घंटे के भीतर अधिकृत सरकारी डॉक्टर से मेडिकल जांच कराना अनिवार्य है, ताकि पुलिस हिरासत में मारपीट (Custodial Torture) न कर सके। शरीर पर पहले से मौजूद चोटें मेडिकल पर्चे में दर्ज होती हैं।
  5. 24 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी (BNSS धारा 58): गिरफ्तारी के समय से ठीक 24 घंटे के भीतर (यात्रा का समय छोड़कर) आरोपी को निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष भौतिक रूप से पेश करना अनिवार्य है। 24 घंटे से एक मिनट भी अधिक थाने में रखना 'अवैध हिरासत' माना जाता है।
  6. मुफ्त कानूनी सहायता पाने का अधिकार (Free Legal Aid): यदि आरोपी वकील का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है, तो मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) से सरकारी खर्चे पर मुफ्त वकील उपलब्ध कराए।

अवैध गिरफ्तारी बनाम वैध कानूनी प्रक्रिया तुलनात्मक सारणी (5-कॉलम)

नीचे दी गई 5-कॉलम तुलनात्मक सारणी में पुलिस की मनमानी कार्यशैली और कानूनन मान्य वैध गिरफ्तारी प्रक्रिया का संपूर्ण भेद प्रस्तुत किया गया है:

प्रक्रियात्मक मानक अवैध / मनमानी पुलिस कार्रवाई कानूनन मान्य वैध प्रक्रिया (BNSS) कानूनी / न्यायिक आधार नागरिक का रक्षात्मक अधिकार
7 साल से कम सजा में घर से सीधे खींचकर थाने ले जाना लिखित धारा 35 उपस्थिति नोटिस देना BNSS धारा 35 व अर्नेश कुमार केस बिना नोटिस थाने जाने से इनकार
60+ बुजुर्ग की गिरफ्तारी दरोगा द्वारा सीधे हिरासत में लेना डीएसपी की पूर्व लिखित अनुमति अनिवार्य BNSS धारा 35(7) विशेष सुरक्षा डीएसपी अनुमति आदेश की मांग करना
गिरफ्तारी का दस्तावेज कोई कागजी मेमो नहीं, केवल मौखिक मौके पर अरेस्ट मेमो + स्वतंत्र गवाह दस्तखत BNSS धारा 43 व डी.के. बसु नियम अरेस्ट मेमो की कॉपी मांगना
हथकड़ी का उपयोग सामान्य नागरिक को सरेआम हथकड़ी लगाना हथकड़ी वर्जित (केवल खूंखार आतंकी हेतु) प्रेम शंकर शुक्ला जजमेंट व BNSS 43(3) अवैध हथकड़ी पर मुआवजे का दावा
अदालत में पेशी की मियाद 2-3 दिन तक अवैध रूप से थाने में बैठाना सख्त 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट पेशी संविधान अनुच्छेद 22(2) व BNSS 58 हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट

गैर-कानूनी हिरासत के विरुद्ध मजिस्ट्रेट व हाईकोर्ट में शिकायत का प्रारूप

यदि पुलिस ने किसी नागरिक को बिना धारा 35 नोटिस दिए या 24 घंटे से अधिक समय तक गैर-कानूनी रूप से थाने में बैठा रखा है, तो परिजन अपने वकील के माध्यम से ड्यूटी मजिस्ट्रेट की अदालत में तुरंत सर्च वारंट / रिहाई आवेदन दाखिल कर सकते हैं:

न्यायालय: मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट महोदय / ड्यूटी मजिस्ट्रेट महोदय, [जिले का नाम]
प्रकरण: बंदी की अवैध हिरासत से रिहाई बाबत प्रार्थना पत्र।

प्रार्थी / आवेदक: [परिजन का नाम, पिता का नाम, निवासी पता एवं बंदी से संबंध, उदा. पिता/भाई/पत्नी]
बनाम
राज्य (मार्फत थाना प्रभारी, पुलिस थाना [थाने का नाम])

विषय: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 100 (पूर्ववर्ती CrPC 97) एवं धारा 35 के उल्लंघन में अवैध रूप से निरुद्ध बंदी [हिरासत में लिए गए व्यक्ति का नाम] को मुक्त कराए जाने हेतु सर्च वारंट जारी करने बाबत।

महोदय,
सविनय निवेदन निम्न प्रकार है:
1. यह कि प्रार्थी का [पुत्र/भाई] श्री [व्यक्ति का नाम], उम्र [वर्ष], एक सम्मानित नागरिक है।
2. यह कि दिनांक [तारीख] को समय लगभग [समय] बजे विपक्षी पुलिस थाना [थाने का नाम] के उप-निरीक्षक [नाम यदि ज्ञात हो] मय जाब्ता प्रार्थी के घर आए और बिना कोई गिरफ्तारी वारंट दिखाए, बिना धारा 35 का कोई नोटिस दिए, प्रार्थी के [पुत्र/भाई] को जबरन अपने साथ थाने ले गए।
3. यह कि उक्त व्यक्ति के विरुद्ध यदि कोई मामला दर्ज भी है, तो वह 7 वर्ष से कम की सजा का है, जिसमें BNSS धारा 35 एवं सर्वोच्च न्यायालय के 'अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य' के दिशानिर्देशों के तहत गिरफ्तारी पूर्णतः वर्जित है।
4. यह कि आज [समय, उदा. 36 घंटे] बीत जाने के उपरांत भी उक्त व्यक्ति को न तो किसी अदालत में पेश किया गया है और न ही उसका कोई मेडिकल परीक्षण कराया गया है। विपक्षी पुलिस द्वारा उसे अवैध रूप से थाने की हवालात में बंद रखा गया है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 व 22 का घोर उल्लंघन है।

प्रार्थना:
अतः माननीय न्यायालय से सादर प्रार्थना है कि:
क) तत्काल एक कोर्ट कमिश्नर (वकील (Advocate)) नियुक्त कर पुलिस थाना [थाने का नाम] की हवालात में सर्च वारंट निष्पादित कराया जाए तथा बंदी को माननीय न्यायालय के समक्ष पेश कराकर अवैध हिरासत से तुरंत रिहा फरमाया जाए।
ख) दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध BNS की धारा 127 (गलत तरीके से बंधक बनाना) एवं धारा 199 के तहत आपराधिक संज्ञान लेकर कार्रवाई का आदेश दिया जाए।

हस्ताक्षर प्रार्थी
दिनांक: [स्थान एवं तारीख]

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)

Q1: क्या 7 साल से कम सजा वाले किसी भी मामले में पुलिस सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती?

सामान्य नियम यही है कि 7 साल तक की सजा में गिरफ्तारी नहीं हो सकती, केवल धारा 35 का नोटिस देना होता है। पुलिस केवल असाधारण परिस्थितियों में ही सीधे गिरफ्तार कर सकती है—जैसे यदि आरोपी गवाहों को धमका रहा हो, सबूत मिटा रहा हो, देश छोड़कर भागने की तैयारी में हो, या अपना सही नाम-पता बताने से इनकार कर रहा हो। इन कारणों को पुलिस को केस डायरी में लिखित दर्ज करना अनिवार्य होता है।

Q2: यदि पुलिस मुझे थाने में बुलाए तो क्या मुझे अकेले जाना चाहिए?

कभी भी अकेले न जाएं। अपने साथ किसी समझदार परिजन या अपने वकील (Advocate) को अवश्य लेकर जाएं। थाने में प्रवेश करने से पहले अपने परिजनों को सूचित कर दें कि आप किस समय थाने में प्रवेश कर रहे हैं ताकि पुलिस अवैध रूप से बैठा न सके।

Q3: क्या किसी महिला को रात के समय गिरफ्तार किया जा सकता है?

BNSS 2023 की धारा 43(5) (पूर्ववर्ती CrPC 46(4)) के अनुसार किसी भी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले (रात में) गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। असाधारण परिस्थितियों में यदि रात में महिला को गिरफ्तार करना ही पड़े, तो महिला पुलिस अधिकारी को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट से पहले लिखित पूर्व-अनुमति लेनी अनिवार्य होती है।

Q4: क्या पुलिस पूछताछ के दौरान मारपीट या थर्ड-डिग्री टॉर्चर कर सकती है?

कदापि नहीं! भारत के कानून और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पुलिस कस्टडी में मारपीट करना पूरी तरह गैर-कानूनी और गंभीर अपराध (Cognizable Offence) है। प्रत्येक आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेशी के समय यह अधिकार है कि वह मजिस्ट्रेट को अपने शरीर की चोटें दिखाए; मजिस्ट्रेट तुरंत डॉक्टर का बोर्ड गठित कराकर दोषी पुलिसकर्मियों पर एफआईआर का आदेश दे सकते हैं।

Q5: यदि पुलिस धारा 35 का नोटिस न दे और सीधे गिरफ्तार कर ले तो क्या सजा होगी?

सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार फैसले के अनुसार ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारी को उच्च न्यायालय द्वारा अदालत की अवमानना में जेल भेजा जा सकता है। इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता की धारा 127 (गलत तरीके से बंधक बनाना) और धारा 199 के तहत उस पुलिसकर्मी पर 2 साल की जेल का मुकदमा दर्ज होता है।

Q6: पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा (Confession) कोर्ट में मान्य होता है या नहीं?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 23 (पूर्ववर्ती IEA धारा 25) के तहत पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कोई भी बयान या अपराध स्वीकारोक्ति (Confession) अदालत में पूरी तरह अमान्य होती है। उसका कोई कानूनी मूल्य नहीं होता। केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने धारा 183 BNSS (पुराना CrPC 164) के तहत दर्ज बयान ही मान्य होता है।

Q7: क्या पुलिस मेरे फोन या लैपटॉप को बिना वारंट जब्त कर सकती है?

BNSS 2023 की धारा 105 के तहत पुलिस जब्ती कर सकती है, लेकिन जब्ती के समय मौके पर मोबाइल वीडियो रिकॉर्डिंग करना और मौके पर ही इलेक्ट्रॉनिक हैश-वैल्यू (Hash Value) जनरेट करके जब्ती सूची पर दो स्वतंत्र गवाहों के दस्तखत कराना अनिवार्य है।

Q8: यदि मुझे आशंका हो कि पुलिस मुझे झूठे केस में फंसाकर अरेस्ट करेगी तो क्या करूँ?

यदि आपको किसी गैर-जमानती अपराध में झूठी गिरफ्तारी की गंभीर आशंका है, तो गिरफ्तारी से पहले ही अपने वकील के माध्यम से सत्र न्यायालय (Sessions Court) या उच्च न्यायालय (High Court) में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail under BNSS Section 482 / पूर्ववर्ती CrPC 438) की याचिका दाखिल करें। कोर्ट से अग्रिम जमानत मिलते ही पुलिस आपको गिरफ्तार नहीं कर सकती।

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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q. क्या 7 साल से कम सजा वाले किसी भी मामले में पुलिस सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती?

A. सामान्य नियम यही है कि 7 साल तक की सजा में गिरफ्तारी नहीं हो सकती, केवल धारा 35 का नोटिस देना होता है। पुलिस केवल असाधारण परिस्थितियों में ही सीधे गिरफ्तार कर सकती है—जैसे यदि आरोपी गवाहों को धमका रहा हो, सबूत मिटा रहा हो, देश छोड़कर भागने की तैयारी में हो, या अपना सही नाम-पता बताने से इनकार कर रहा हो। इन कारणों को पुलिस को केस डायरी में लिखित दर्ज करना अनिवार्य होता है।

Q. यदि पुलिस मुझे थाने में बुलाए तो क्या मुझे अकेले जाना चाहिए?

A. कभी भी अकेले न जाएं। अपने साथ किसी समझदार परिजन या अपने वकील (Advocate) को अवश्य लेकर जाएं। थाने में प्रवेश करने से पहले अपने परिजनों को सूचित कर दें कि आप किस समय थाने में प्रवेश कर रहे हैं ताकि पुलिस अवैध रूप से बैठा न सके।

Q. क्या किसी महिला को रात के समय गिरफ्तार किया जा सकता है?

A. BNSS 2023 की धारा 43(5) (पूर्ववर्ती CrPC 46(4)) के अनुसार किसी भी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले (रात में) गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। असाधारण परिस्थितियों में यदि रात में महिला को गिरफ्तार करना ही पड़े, तो महिला पुलिस अधिकारी को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट से पहले लिखित पूर्व-अनुमति लेनी अनिवार्य होती है।

Q. क्या पुलिस पूछताछ के दौरान मारपीट या थर्ड-डिग्री टॉर्चर कर सकती है?

A. कदापि नहीं! भारत के कानून और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पुलिस कस्टडी में मारपीट करना पूरी तरह गैर-कानूनी और गंभीर अपराध (Cognizable Offence) है। प्रत्येक आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेशी के समय यह अधिकार है कि वह मजिस्ट्रेट को अपने शरीर की चोटें दिखाए; मजिस्ट्रेट तुरंत डॉक्टर का बोर्ड गठित कराकर दोषी पुलिसकर्मियों पर एफआईआर का आदेश दे सकते हैं।

Q. यदि पुलिस धारा 35 का नोटिस न दे और सीधे गिरफ्तार कर ले तो क्या सजा होगी?

A. सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार फैसले के अनुसार ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारी को उच्च न्यायालय द्वारा अदालत की अवमानना में जेल भेजा जा सकता है। इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता की धारा 127 (गलत तरीके से बंधक बनाना) और धारा 199 के तहत उस पुलिसकर्मी पर 2 साल की जेल का मुकदमा दर्ज होता है।

Q. पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा (Confession) कोर्ट में मान्य होता है या नहीं?

A. भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 23 (पूर्ववर्ती IEA धारा 25) के तहत पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कोई भी बयान या अपराध स्वीकारोक्ति (Confession) अदालत में पूरी तरह अमान्य होती है। उसका कोई कानूनी मूल्य नहीं होता। केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने धारा 183 BNSS (पुराना CrPC 164) के तहत दर्ज बयान ही मान्य होता है।

Q. क्या पुलिस मेरे फोन या लैपटॉप को बिना वारंट जब्त कर सकती है?

A. BNSS 2023 की धारा 105 के तहत पुलिस जब्ती कर सकती है, लेकिन जब्ती के समय मौके पर मोबाइल वीडियो रिकॉर्डिंग करना और मौके पर ही इलेक्ट्रॉनिक हैश-वैल्यू (Hash Value) जनरेट करके जब्ती सूची पर दो स्वतंत्र गवाहों के दस्तखत कराना अनिवार्य है।

Q. यदि मुझे आशंका हो कि पुलिस मुझे झूठे केस में फंसाकर अरेस्ट करेगी तो क्या करूँ?

A. यदि आपको किसी गैर-जमानती अपराध में झूठी गिरफ्तारी की गंभीर आशंका है, तो गिरफ्तारी से पहले ही अपने वकील के माध्यम से सत्र न्यायालय (Sessions Court) या उच्च न्यायालय (High Court) में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail under BNSS Section 482 / पूर्ववर्ती CrPC 438) की याचिका दाखिल करें। कोर्ट से अग्रिम जमानत मिलते ही पुलिस आपको गिरफ्तार नहीं कर सकती।

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✔ ऑनलाइन फॉर्म व रिजल्ट ✔ खसरा नक्शा व बही ✔ कोर्ट केश आर्डर ✔ फोटोकॉपी व कलर फोटो ✔ डाक सेवा व लेमीनेशन
👤 मुकेश पटेल: +91 9990768274
👤 धरम पटेल: +91 9009261475
🏛️ सिविल कोर्ट, पटेरा रोड ⭐ सरकारी सेवा केंद्र
📞 कॉल करें 💬 WhatsApp
धरम पटेल से बात करें: कॉल (9009261475) • WhatsApp
💡 सलाह: ऑनलाइन फॉर्म भरवाने के लिए अपने आवश्यक दस्तावेज़ (10वीं/12वीं अंकसूची, आधार कार्ड, फोटो व हस्ताक्षर) WhatsApp पर भेजकर घर बैठे फॉर्म भरवा सकते हैं।

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