⚡ त्वरित कानूनी सारांश (Quick Legal Takeaway)
सड़क दुर्घटनाओं को लेकर नए कानून BNS धारा 106 को लेकर सोशल मीडिया पर व्यापक भ्रांतियां हैं कि 'हर एक्सीडेंट पर 10 साल की जेल और 7 लाख जुर्माना लगेगा'। वास्तविक कानून यह है कि धारा 106(1) के तहत दुर्घटना होने पर 5 साल तक की सजा है, लेकिन 10 साल की कठोर सजा (धारा 106(2)) केवल तब लागू होती है जब चालक घायल को तड़पते हुए छोड़कर भाग जाए और किसी भी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को घटना की सूचना न दे। यदि भीड़ की हिंसा (Mob Lynching) के डर से चालक मौके से हटकर सुरक्षित स्थान से तुरंत पुलिस को 112 पर सूचना दे देता है, तो वह 10 वर्ष की कड़ी सजा से कानूनन सुरक्षित हो जाता है।
विषय सूची (Table of Contents)
- 1. नए हिट एंड रन कानून को लेकर देशव्यापी भ्रम बनाम जमीनी सच्चाई
- 2. BNS धारा 106(1) बनाम 106(2) का विस्तृत कानूनी विश्लेषण
- 3. 'सुरक्षित बंदरगाह' (Safe Harbor): पुलिस या मजिस्ट्रेट को तत्काल सूचना देने का नियम
- 4. भीड़ की हिंसा (Mob Lynching) का डर: ड्राइवर जान कैसे बचाए और कानून का पालन कैसे करे?
- 5. गोल्डन आवर (Golden Hour) व मोटर वाहन अधिनियम धारा 134 के तहत चालक के कर्तव्य
- 6. हिट एंड रन मामलों में गिरफ्तारी, जमानत व ट्रायल की कानूनी स्थिति
- 7. दुर्घटना घटित होने पर चालक व वाहन स्वामी हेतु आपातकालीन SOP
- 8. IPC 304A बनाम BNS 106(1) बनाम BNS 106(2) तुलना सारणी (5-कॉलम)
- 9. दुर्घटना के बाद पुलिस को दी जाने वाली तत्काल लिखित/डिजिटल सूचना का प्रारूप
- 10. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)
- 11. आधिकारिक सरकारी पोर्टल व क्लस्टर गाइड्स
1. नए हिट एंड रन कानून को लेकर देशव्यापी भ्रम बनाम जमीनी सच्चाई
भारत दुनिया में सड़क दुर्घटनाओं के मामले में सबसे अधिक हताहतों वाले देशों में से एक है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 4.5 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें 1.5 लाख से अधिक निर्दोष नागरिकों की जान चली जाती है। इनमें से लगभग 30% मौतें केवल इसलिए होती हैं क्योंकि दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति सड़क पर खून से लथपथ पड़ा रहता है और पहले एक घंटे यानी 'गोल्डन आवर' (Golden Hour) में उसे अस्पताल नहीं पहुंचाया जाता।
ब्रिटिश कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC 1860) की धारा 304A में लापरवाही से गाड़ी चलाकर किसी की जान लेने पर मात्र 2 साल की सजा और थाने से ही तुरंत जमानत का प्रावधान था। चालक किसी को कुचलकर भाग जाते थे और अगले दिन जमानत लेकर बाहर आ जाते थे।
इसी गैर-जिम्मेदाराना प्रवृत्ति को रोकने के लिए संसद ने भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) की धारा 106 में कड़े बदलाव किए। परंतु दिसंबर 2023 और जनवरी 2024 में देश भर के ट्रक, बस और टैक्सी चालकों ने बड़े पैमाने पर हड़ताल शुरू कर दी। अफवाह फैलाई गई कि सरकार हर ड्राइवर को 10 साल के लिए जेल भेजेगी और ₹7 लाख का जुर्माना वसूलेगी।
हकीकत में, संसद और केंद्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि कानून का उद्देश्य किसी निर्दोष ड्राइवर को प्रताड़ित करना नहीं है, बल्कि घायल व्यक्ति की जान बचाना और पुलिस को सूचना देने की जवाबदेही तय करना है।
2. BNS धारा 106(1) बनाम 106(2) का विस्तृत कानूनी विश्लेषण
BNS की धारा 106 को दो स्पष्ट भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक चालक, वाहन स्वामी और आम नागरिक को इन दोनों सब-सेक्शन (Sub-section)ओं का अंतर समझना आवश्यक है:
धारा 106(1): सामान्य लापरवाही से मृत्यु (Rash or Negligent Act)
"जो कोई जल्दबाजी व लापरवाही या लापरवाही भरे किसी ऐसे कार्य से, जो आपराधिक मानव वध की कोटि में नहीं आता, किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करेगा, वह किसी एक अवधि के कारावास से, जो पांच वर्ष (5 Years) तक का हो सकेगा, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा; और यदि ऐसा कार्य किसी रजिस्टर्ड डॉक्टर (Doctor) द्वारा किया जाता है, तो दो वर्ष तक का कारावास होगा।"
विशेषताएं:
- यह सड़क दुर्घटनाओं पर सामान्य रूप से लागू होने वाली धारा है।
- पुरानी IPC 304A में सजा 2 वर्ष थी, जिसे बढ़ाकर 5 वर्ष किया गया है।
- यदि दुर्घटना अनजाने में या वाहन के ब्रेक फेल होने से हुई, और चालक ने कानून का पालन किया, तो यही धारा लागू होगी।
धारा 106(2): हिट एंड रन— सूचना न देकर फरार होना
"जो कोई जल्दबाजी व लापरवाही और लापरवाही भरे ढंग से कोई वाहन चलाकर किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करेगा, जो आपराधिक मानव वध की कोटि में नहीं आता, और ऐसी घटना के तुरंत बाद किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को उसकी रिपोर्ट किए बिना भाग जाएगा, वह किसी एक अवधि के कारावास से, जो दस वर्ष (10 Years) तक का हो सकेगा, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।"
विशेषताएं:
- यह धारा केवल और केवल तब आकर्षित होती है जब दो शर्तें एक साथ पूरी हों:
- वाहन चालक की लापरवाही से किसी की मृत्यु हुई हो, तथा
- चालक ने घटना की रिपोर्ट किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को किए बिना भागने (Absconding) का प्रयास किया हो।
- अधिकतम सजा 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना है। (कानून में कहीं भी ₹7 लाख के जुर्माने की कोई न्यूनतम निश्चित सीमा नहीं लिखी है, यह न्यायालय के विवेक पर निर्भर है)।
3. 'सुरक्षित बंदरगाह' (Safe Harbor): पुलिस या मजिस्ट्रेट को तत्काल सूचना देने का नियम
BNS धारा 106(2) की भाषा में ही चालक के लिए सबसे बड़ा कानूनी बचाव छिपा है। कानून कहता है: "...और ऐसी घटना के तुरंत बाद किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को उसकी रिपोर्ट किए बिना भाग जाएगा..."
इसका कानूनी व्याख्या (Statutory Interpretation) यह है कि यदि चालक घटना के तुरंत बाद किसी भी कानूनी माध्यम से पुलिस या मजिस्ट्रेट को सूचना दे देता है, तो अपराध की सामग्री (Ingredients of Offence) टूट जाती है। जैसे ही सूचना दर्ज हो जाती है:
- चालक पर धारा 106(2) का कठोर अपराध नहीं लगाया जा सकता।
- मामला स्वतः धारा 106(1) के दायरे में सीमित हो जाता है।
- अदालत में यह सिद्ध हो जाता है कि चालक का इरादा कानून से भागने का नहीं था, बल्कि उसने एक जिम्मेदार नागरिक की तरह राज्य मशीनरी को सूचित किया।
4. भीड़ की हिंसा (Mob Lynching) का डर: ड्राइवर जान कैसे बचाए और कानून का पालन कैसे करे?
ड्राइवरों का सबसे बड़ा और व्यावहारिक डर यह था कि "यदि हम दुर्घटना के बाद मौके पर रुककर घायल को अस्पताल ले जाने लगे, तो उत्तेजित भीड़ हमें पीट-पीटकर मार डालेगी (Mob Lynching कर देगी)।" यह चिंता पूरी तरह वास्तविक और जमीनी है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में बहस के दौरान और बाद में जारी कानूनी स्पष्टीकरण में यह साफ किया है कि:
- कानून चालक को यह बाध्य नहीं करता कि वह हिंसक भीड़ के सामने अपनी जान जोखिम में डालकर मौके पर ही खड़ा रहे।
- यदि चालक को अपनी जान या शारीरिक सुरक्षा का खतरा महसूस होता है, तो वह तत्काल उस विशिष्ट स्थान से सुरक्षित दूरी पर हट सकता है।
- उसे केवल यह करना है कि वह नजदीकी पुलिस चौकी, थाने या सुरक्षित स्थान पर जाकर डायल 112 पर कॉल करे और कहे: "मेरी गाड़ी से अमुक स्थान पर दुर्घटना हो गई है। भीड़ के भय से मैं थोड़ी दूर आ गया हूं। कृपया तुरंत एंबुलेंस और पुलिस बल भेजें।"
- 112 की कॉल रिकॉर्डिंग पुलिस के केंद्रीय सर्वर पर टाइम-स्टैम्प और जीपीएस के साथ सुरक्षित हो जाती है। यह कॉल रिकॉर्डिंग अदालत में इस बात का अकाट्य प्रमाण बनती है कि चालक भागा नहीं था, बल्कि उसने तुरंत पुलिस को रिपोर्ट कर दी थी।
5. गोल्डन आवर (Golden Hour) व मोटर वाहन अधिनियम धारा 134 के तहत चालक के कर्तव्य
सड़क सुरक्षा कानून में दुर्घटना के बाद के पहले 60 मिनट को 'गोल्डन आवर' कहा जाता है। यदि इस अवधि में पीड़ित को प्राथमिक उपचार या ट्रॉमा सेंटर पहुंचा दिया जाए, तो 50% से अधिक मौतों को टाला जा सकता है।
मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 134 चालक पर निम्नलिखित जिम्मेदारियां डालती है:
- चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करना: घायल व्यक्ति को नजदीकी अस्पताल पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करना, जब तक कि भीड़ के उग्र होने के कारण ऐसा करना असंभव न हो।
- अस्पताल में पहचान दर्ज कराना: डॉक्टर को घटना की सही जानकारी देना। उच्चतम न्यायालय के 'गुड सेमेरिटन गाइडलाइंस' (Good Samaritan Guidelines) के अनुसार, घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले व्यक्ति को पुलिस बेवजह परेशान नहीं कर सकती।
- बीमा कंपनी को सूचना: वाहन स्वामी और चालक का दायित्व है कि दुर्घटना के बाद 48 से 72 घंटे के भीतर अपनी थर्ड पार्टी बीमा कंपनी (Third Party Insurance) को सूचित करें ताकि पीड़ित परिवार को मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) के तहत उचित मुआवजा मिल सके।
6. हिट एंड रन मामलों में गिरफ्तारी, जमानत व ट्रायल की कानूनी स्थिति
धारा 106 के अंतर्गत कानूनी प्रक्रिया को समझना आवश्यक है:
क्या धारा 106(1) जमानती है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की प्रथम अनुसूची के अनुसार, धारा 106(1) एक संज्ञेय (Cognizable) और जमानती (Bailable) अपराध है। इसका अर्थ है कि यदि पुलिस ने धारा 106(1) में मामला दर्ज किया है, तो आरोपी को थाने से ही या मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होते ही जमानत पाने का कानूनी हक है। इसके लिए जेल जाना आवश्यक नहीं होता।
क्या धारा 106(2) गैर-जमानती है?
धारा 106(2) (बिना सूचना दिए भागना) एक संज्ञेय और गैर-जमानती (Non-Bailable) अपराध है। इसमें जमानत थाने से नहीं मिलती। आरोपी को गिरफ्तार करके मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाता है। नियमित जमानत के लिए सत्र न्यायालय (Sessions Court) या उच्च न्यायालय में याचिका लगानी पड़ती है।
यही कारण है कि दुर्घटना के तुरंत बाद पुलिस को सूचित करना जीवन और स्वतंत्रता दोनों के लिए निर्णायक साबित होता है।
7. दुर्घटना घटित होने पर चालक व वाहन स्वामी हेतु आपातकालीन SOP
यदि दुर्भाग्यवश किसी वाहन चालक से कोई अप्रिय सड़क दुर्घटना घटित हो जाती है, तो उसे घबराने के बजाय निम्नलिखित 7 चरणों वाली कानूनी SOP का पालन करना चाहिए:
- वाहन को नियंत्रित कर सुरक्षित रोकें: अचानक तेज रफ्तार से भागने की कोशिश न करें, क्योंकि इससे अन्य वाहनों से टकराने या पलटने का खतरा बढ़ जाता है।
- स्थिति का तत्काल मूल्यांकन करें: यदि सड़क सुनसान है और भीड़ हिंसक नहीं है, तो तुरंत उतरकर घायल की सांस और चोट की स्थिति देखें।
- तुरंत 112 और 108 डायल करें: अपने मोबाइल फोन से राष्ट्रीय आपातकालीन नंबर 112 (पुलिस) और 108 (एंबुलेंस) पर कॉल करें। घटना का सटीक स्थान (किलोमीटर पोल या माइलस्टोन, पेट्रोल पंप, जीपीएस लोकेशन) बताएं। कॉल का स्क्रीनशॉट ले लें।
- यदि भीड़ आक्रामक हो जाए: अपनी जान को खतरे में डाले बिना सीधे नजदीकी पुलिस स्टेशन या पुलिस सहायता केंद्र (Police Booth) की ओर जाएं।
- थाने में स्वयं को प्रस्तुत करें: थाने में जाकर स्पष्ट बताएं कि दुर्घटना हुई है और आपने 112 पर पहले ही सूचित कर दिया है। इसे थाने की 'जनरल डायरी' (GD Entry) में दर्ज करवाएं।
- अपने वकील से संपर्क करें: वकील को पूरे घटनाक्रम की सत्य जानकारी दें। यदि वाहन का बीमा, फिटनेस, पॉल्यूशन और चालक का ड्राइविंग लाइसेंस वैध है, तो इन सभी दस्तावेजों की प्रतियां तैयार रखें।
- डैशकैम फुटेज सुरक्षित करें: यदि आपकी गाड़ी में डैशबोर्ड कैमरा (Dashcam) लगा था, तो उस मेमोरी कार्ड को तुरंत सुरक्षित निकाल लें। वह फुटेज सिद्ध करेगा कि क्या गलती पैदल यात्री की थी या किसी अन्य वाहन की।
8. IPC 304A बनाम BNS 106(1) बनाम BNS 106(2) तुलना सारणी (5-कॉलम)
| कानूनी मानक | पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC 304A) | BNS 106(1) (सामान्य उपेक्षा से मृत्यु) | BNS 106(2) (हिट एंड रन - भाग जाना) | बचाव का कानूनी आधार व जमानत स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| अधिकतम कारावास सजा | अधिकतम 2 वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों। | अधिकतम 5 वर्ष का कारावास तथा जुर्माना। | अधिकतम 10 वर्ष का कारावास तथा जुर्माना। | पुलिस को तत्काल सूचना देने पर 106(2) हटकर 106(1) हो जाता है। |
| जमानत की प्रकृति | जमानती (Bailable); थाने से ही मुचलके पर रिहाई। | जमानती (Bailable); कानूनी हक के रूप में जमानत। | गैर-जमानती (Non-Bailable); केवल कोर्ट के विवेक पर। | 106(1) में जेल नहीं जाना पड़ता, 106(2) में कस्टडी का खतरा। |
| सूचना देने की बाध्यता | आईपीसी में भागने पर सजा बढ़ाने का कोई पृथक प्रावधान नहीं था। | चालक ने पुलिस को तुरंत सूचना दी या मौके पर सहयोग किया। | चालक ने बिना सूचना दिए पुलिस व कोर्ट से छिपने का प्रयास किया। | डायल 112 कॉल लॉग व जीडी एंट्री निर्दोषिता का ठोस सबूत। |
| चिकित्सकों हेतु नियम | सामान्य 2 वर्ष का नियम ही डॉक्टरों पर भी लागू था। | डॉक्टरों के चिकित्सकीय कार्य में मृत्यु पर अधिकतम 2 वर्ष की सजा। | चिकित्सकों पर लागू नहीं; केवल वाहन चालकों हेतु। | चिकित्सकों को ड्यूटी के दौरान आकस्मिक मौतों पर विशेष राहत। |
| विचारण का न्यायालय | प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMIC). | प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMIC). | सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय (Court of Session). | सत्र न्यायालय में ट्रायल अधिक सख्त और समय लेने वाला होता है। |
9. दुर्घटना के बाद पुलिस को दी जाने वाली तत्काल लिखित/डिजिटल सूचना का प्रारूप
दुर्घटना के तुरंत बाद जब आप थाने पहुंचे या अपने वकील के जरिए लिखित सूचना दें, तो उसका प्रारूप निम्नलिखित होना चाहिए ताकि आपके ऊपर धारा 106(2) न लगाई जा सके:
श्रीमान थाना प्रभारी महोदय,
थाना: .................... जिला: ....................
विषय: सड़क दुर्घटना की तत्काल सूचना एवं भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) की धारा 106(1) के अंतर्गत कानूनी पालन बाबत।
महोदय,
निवेदन है कि मैं प्रार्थी .................... पुत्र श्री .................... निवासी .................... वाहन संख्या .................... (कार / ट्रक / मोटरसाइकिल) का पंजीकृत चालक / स्वामी हूं।
1. यह कि आज दिनांक ................ को समय लगभग ................ बजे मैं अपने उक्त वाहन से ................ से ................ की ओर सामान्य गति से जा रहा था।
2. यह कि स्थान ................ के समीप अचानक एक अज्ञात व्यक्ति / मोटरसाइकिल अप्रत्याशित रूप से वाहन के सामने आ गई। प्रार्थी ने आपातकालीन ब्रेक लगाकर बचाने का पूर्ण प्रयास किया, परंतु दुर्भाग्यवश टक्कर हो गई।
3. यह कि घटना के तुरंत बाद प्रार्थी ने वाहन रोककर स्थिति देखी। मौके पर स्थानीय भीड़ उग्र होने लगी और प्रार्थी पर जानलेवा हमले का प्रयास किया गया, जिससे अपनी जान की सुरक्षा हेतु प्रार्थी वहां से हटकर तत्काल इस थाने / पुलिस सहायता केंद्र पर उपस्थित हुआ है।
4. यह कि प्रार्थी ने घटना के तुरंत बाद अपने मोबाइल नंबर ................ से आपातकालीन पुलिस हेल्पलाइन 112 पर समय ................ बजे सूचना दर्ज करा दी थी ताकि घायल को तत्काल एंबुलेंस सहायता मिल सके।
5. यह कि प्रार्थी कानून का पालन करने वाला नागरिक है और पुलिस जांच में पूर्ण सहयोग करने हेतु उपस्थित है। वाहन का वैध बीमा, प्रदूषण प्रमाण पत्र एवं प्रार्थी का ड्राइविंग लाइसेंस संलग्न है।
अतः श्रीमान जी से निवेदन है कि उक्त दुर्घटना की इस प्राथमिक सूचना को जनरल डायरी (GD) में दर्ज करते हुए उचित कानूनी कार्रवाई करने की कृपा करें।
संलग्नक:
1. ड्राइविंग लाइसेंस प्रति
2. वाहन आरसी व बीमा पॉलिसी प्रति
3. 112 कॉल डिटेल स्क्रीनशॉट
दिनांक: ................
समय: ................
प्रार्थी चालक / वाहन स्वामी
(हस्ताक्षर व फोन नंबर)
10. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)
क्या नए कानून में हर एक्सीडेंट पर 10 साल की जेल और ₹7 लाख जुर्माना लगेगा?
बिल्कुल नहीं। यह एक कोरी अफवाह है। 10 साल की सजा केवल BNS धारा 106(2) में तब लागू होती है जब चालक लापरवाही से किसी की जान ले और बिना पुलिस या मजिस्ट्रेट को सूचना दिए मौके से फरार हो जाए। कानून में ₹7 लाख के किसी अनिवार्य न्यूनतम जुर्माने का उल्लेख नहीं है।
यदि दुर्घटना के बाद भीड़ मारने दौड़े तो ड्राइवर क्या करे?
ड्राइवर को अपनी जान जोखिम में डालने की आवश्यकता नहीं है। वह तुरंत सुरक्षित दूरी पर जाकर नजदीकी पुलिस स्टेशन पहुंचे या अपने फोन से तुरंत 112 डायल करके दुर्घटना की सूचना दे। यह कॉल रिकॉर्ड सिद्ध करेगी कि वह भागा नहीं था बल्कि उसने पुलिस को सूचित किया था।
क्या BNS धारा 106(1) जमानती (Bailable) अपराध है?
हां। धारा 106(1) (सामान्य उपेक्षा से मृत्यु) एक जमानती अपराध है। इसमें आरोपी को थाने से ही जमानत पर रिहा होने का कानूनी हक है।
क्या BNS की धारा 106(2) वर्तमान में पूरी तरह लागू हो चुकी है?
संसद ने कानून पारित कर दिया है, लेकिन ट्रांसपोर्ट यूनियनों के साथ वार्ता के बाद केंद्र सरकार ने आश्वस्त किया था कि धारा 106(2) के व्यावहारिक नियमों पर ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (AIMTC) से विस्तृत चर्चा के बाद ही इसे पूरी तरह क्रियान्वित किया जाएगा। वर्तमान में सामान्य मामलों में धारा 106(1) के तहत कार्रवाई की जा रही है।
दुर्घटना में घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाने वाले मददगार (Good Samaritan) को क्या कानूनी सुरक्षा है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मोटर वाहन अधिनियम की धारा 134A के तहत घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले मददगार को पुलिस पूछताछ के लिए बाध्य नहीं कर सकती, न ही उससे जबरन नाम-पता पूछ सकती है। उसे किसी सिविल या आपराधिक दायित्व से पूर्ण कानूनी सुरक्षा प्राप्त है।
यदि मेरी गाड़ी से कोई जानवर टकरा जाए तो क्या यह हिट एंड रन है?
नहीं। BNS धारा 106 केवल किसी मानव (व्यक्ति) की मृत्यु पर लागू होती है। हालांकि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत घायल पशु को तड़पता छोड़ना गैरकानूनी है, लेकिन धारा 106 का हिट एंड रन इस पर लागू नहीं होता।
दुर्घटना के बाद बीमा कंपनी को कितने समय में सूचित करना चाहिए?
दुर्घटना के 48 से 72 घंटे के भीतर बीमा कंपनी के टोल-फ्री नंबर या ऐप पर क्लेम इंटिमेशन दर्ज कराना अनिवार्य होता है ताकि थर्ड पार्टी क्लेम और वाहन क्षति का विधिवत सर्वे किया जा सके।
डैशकैम (Dashcam) फुटेज अदालत में कैसे मान्य होता है?
भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA 2023) की धारा 61 व 63 के तहत डैशकैम वीडियो एक वैध इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य है। इसके लिए आपको उपकरण और मेमोरी कार्ड की अखंडता का एक कानूनी प्रमाण पत्र संलग्न करना होता है, जो साबित करता है कि दुर्घटना में गलती किसकी थी।