विषय सूची (Table of Contents)
- 1. जीरो एफआईआर (Zero FIR) क्या है और इसे 'शून्य' नंबर क्यों दिया जाता है?
- 2. BNSS 2023 की धारा 173 में बड़ा कानूनी बदलाव: CrPC 154 की तुलना में नागरिक को क्या नया अधिकार मिला?
- 3. e-FIR और 3-दिवसीय अनिवार्य हस्ताक्षर नियम का कानूनी सच
- 4. ललिता कुमारी बनाम यूपी राज्य: गंभीर अपराध (Cognizable Offence) में तत्काल एफआईआर दर्ज करने का अनिवार्य सुप्रीम कोर्ट आदेश
- 5. थाने में जीरो एफआईआर दर्ज कराने की स्टेप-बाय-स्टेप कानूनी प्रक्रिया
- 6. यदि थाना प्रभारी (SHO) एफआईआर दर्ज करने से मना करे तो क्या करें? 3 कानूनी रास्ते
- 7. एफआईआर न लिखने वाले पुलिस अधिकारी पर कानूनी डंडा: BNS धारा 199 में 2 साल की जेल
- 8. नियमित एफआईआर बनाम जीरो एफआईआर बनाम e-FIR तुलना सारणी (5-कॉलम)
- 9. पुलिस अधीक्षक (SP) व न्यायिक मजिस्ट्रेट (BNSS 175) हेतु प्रार्थना पत्र प्रारूप
- 10. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)
- 11. आधिकारिक सरकारी पोर्टल व क्लस्टर गाइड्स
जीरो एफआईआर (Zero FIR) क्या है और इसे 'शून्य' नंबर क्यों दिया जाता है?
भारत में जब कोई अपराध होता है, तो पारंपरिक पुलिस व्यवस्था में प्रत्येक पुलिस थाने का एक निश्चित भौगोलिक अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) तय होता है। पुराने समय में जब कोई घायल या असहाय पीड़ित थाने पहुंचता था, तो पुलिसकर्मी प्रायः घंटों तक इस बात पर बहस करते थे कि घटना का खंभा या सड़क किस थाने के अंतर्गत आती है। इस क्षेत्राधिकार के विवाद में 'गोल्डन आवर' (Golden Hour) बर्बाद हो जाता था, घायल व्यक्ति दम तोड़ देता था और अपराधी मौके से फरार हो जाते थे।
इसी अमानवीय स्थिति को समाप्त करने के लिए न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति की सिफारिशों के बाद "जीरो एफआईआर" (Zero FIR) की कानूनी अवधारणा विकसित की गई, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) ने कानूनी संहिताबद्ध रूप दे दिया है।
इसे 'जीरो' नंबर क्यों कहा जाता है?
प्रत्येक पुलिस थाने में दर्ज होने वाली प्राथमिकियों को वर्ष के अनुसार एक क्रमिक क्रम संख्या (Regular Serial Number जैसे FIR No. 12/2026, 13/2026 आदि) दी जाती है। चूंकि घटना उस थाने के अधिकार क्षेत्र में घटित नहीं हुई होती, इसलिए वह थाना उस एफआईआर को कोई नियमित क्रमांक आवंटित नहीं कर सकता। अतः रिकॉर्ड में उस मामले को "क्रमांक 0" (FIR No. 00/2026) के रूप में दर्ज किया जाता है। एफआईआर दर्ज होते ही पुलिस तुरंत प्राथमिक जांच शुरू करती है, मौके से साक्ष्य जुटाती है, पीड़ित का मेडिकल कराती है और फिर केस फाइल को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले थाने को स्थानांतरित कर देती है, जहाँ उसे एक नियमित नंबर मिल जाता है।
BNSS 2023 की धारा 173 में बड़ा कानूनी बदलाव: CrPC 154 की तुलना में नागरिक को क्या नया अधिकार मिला?
1 जुलाई 2024 से लागू हुई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 173 ने पुराने 150 साल पुराने ब्रिटिश कालीन CrPC 1898/1973 की धारा 154 को पूरी तरह बदलकर आम नागरिक को सशक्त बनाया है:
BNSS धारा 173 के प्रमुख कानूनी स्तम्भ:
- क्षेत्राधिकार की बाध्यता का पूर्ण विलोपन: धारा 173(1) में स्पष्ट लिखा है कि गंभीर अपराध (Cognizable Offence) की सूचना किसी भी थाने के जेल अधीक्षक (Jail Superintendent) को दी जा सकती है, "चाहे वह अपराध उस पुलिस थाने की सीमाओं के भीतर हुआ हो या नहीं"। यानी अब देश का कोई भी पुलिसकर्मी क्षेत्राधिकार का बहाना बनाकर नागरिक को बैरंग नहीं लौटा सकता।
- इलेक्ट्रॉनिक संचार (e-FIR) को कानूनी मान्यता: धारा 173(1)(ii) के तहत अपराध की सूचना ईमेल, एसएमएस, व्हाट्सएप या राज्य पुलिस के CCTNS पोर्टल के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक रूप में भी दी जा सकती है।
- निःशुल्क एफआईआर प्रति पाने का अक्षुण्ण अधिकार: धारा 173(2) के अनुसार जैसे ही एफआईआर दर्ज होती है, उसकी एक प्रमाणित प्रति बिना किसी विलंब के सूचना देने वाले (पीड़ित) को तत्काल और निःशुल्क उपलब्ध कराना पुलिस का कानूनी जिम्मेदारी है।
- पीड़ित को 90 दिनों में जांच प्रगति रिपोर्ट (Victim Update): धारा 193(3)(ii) के तहत पुलिस को 90 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता को जांच की अद्यतन प्रगति से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या व्यक्तिगत रूप से अवगत कराना अनिवार्य किया गया है।
e-FIR और 3-दिवसीय अनिवार्य हस्ताक्षर नियम का कानूनी सच
नए कानून में नागरिकों को घर बैठे ऑनलाइन एफआईआर (e-FIR) दर्ज करने की सुविधा दी गई है, लेकिन इसके दुरुपयोग और फर्जी शिकायतों को रोकने के लिए एक कड़ा तकनीकी व कानूनी फिल्टर लगाया गया है जिसे "3-दिवसीय हस्ताक्षर नियम" (Three-Day Signature Rule) कहा जाता है:
- धारा 173(1) का खास नियम व शर्त (Proviso) (Proviso): यदि गंभीर अपराध (Cognizable Offence) की सूचना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (ऑनलाइन पोर्टल या ईमेल) से दी गई है, तो उस सूचना को पुलिस रिकॉर्ड में तभी औपचारिक रूप से दर्ज किया जाएगा जब सूचनाकर्ता 3 दिनों के भीतर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर उस पर अपने भौतिक हस्ताक्षर कर दे।
- नागरिक के लिए इसका व्यावहारिक अर्थ: यदि आपके साथ कोई घटना हुई है और आप तुरंत थाने जाने की स्थिति में नहीं हैं, तो आप उसी क्षण राज्य पुलिस के पोर्टल (जैसे यूपी कॉप, दिल्ली पुलिस ऐप, राजस्थान पुलिस पोर्टल) पर e-FIR दर्ज कर सकते हैं। इसके बाद आपके पास 72 घंटे (3 दिन) का समय होता है। आप 3 दिन के भीतर संबंधित थाने जाएं, अपनी आईडी दिखाएं और अपने आवेदन पर हस्ताक्षर कर दें। हस्ताक्षर होते ही वह ऑनलाइन सूचना आधिकारिक कानूनी एफआईआर बन जाती है।
- यदि 3 दिन में हस्ताक्षर न हों: यदि 3 दिन में हस्ताक्षर नहीं किए जाते, तो वह केवल एक गैर-पुष्ट सूचना (Unverified Information) बनकर रह जाती है और उस पर कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं होता।
ललिता कुमारी बनाम यूपी राज्य: गंभीर अपराध (Cognizable Offence) में तत्काल एफआईआर दर्ज करने का अनिवार्य सुप्रीम कोर्ट आदेश
पुलिस प्रायः नागरिकों को यह कहकर टरका देती है कि "हम पहले मामले की जांच करेंगे, फिर एफआईआर लिखेंगे।" सर्वोच्च न्यायालय की 5 जजों की संकानूनी पीठ ने ऐतिहासिक फैसले ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) 2 SCC 1 में इसे पूरी तरह अवैध घोषित किया है:
- गंभीर अपराध (Cognizable Offence) (Cognizable Offence) में एफआईआर अनिवार्य: यदि दी गई शिकायत से किसी गंभीर अपराध (Cognizable Offence) (जैसे चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार, जालसाजी, गंभीर मारपीट) का घटित होना प्रकट होता है, तो पुलिस अधिकारी के पास कोई विकल्प (Discretion) नहीं है; उसे अनिवार्य रूप से तत्काल एफआईआर दर्ज करनी ही होगी।
- प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) की सीमित छूट: पुलिस केवल 5 विशिष्ट श्रेणियों में ही एफआईआर दर्ज करने से पहले 14 दिन की सीमित प्रारंभिक जांच कर सकती है:
- पारिवारिक/वैवाहिक विवाद (जैसे 498A, घरेलू कलह)।
- व्यावसायिक विवाद (Commercial Disputes)।
- चिकित्सीय लापरवाही (Medical Negligence के मामले)।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के मामले।
- वे मामले जहाँ शिकायत दर्ज कराने में 3 महीने से अधिक का असामान्य विलंब हुआ हो।
- इन 5 मामलों के अलावा किसी भी सामान्य आपराधिक वारदात में पुलिस प्रारंभिक जांच के नाम पर एफआईआर को टाल नहीं सकती।
थाने में जीरो एफआईआर दर्ज कराने की स्टेप-बाय-स्टेप कानूनी प्रक्रिया
जब आप किसी दुर्घटना या अपराध के बाद निकटतम थाने में जीरो एफआईआर दर्ज कराने जाएं, तो निम्नलिखित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन करें:
- चरण 1: ड्यूटी ऑफिसर / थाना प्रभारी से मिलें:
थाने में उपस्थित हेड कॉन्स्टेबल या ड्यूटी ऑफिसर को स्पष्ट बताएं कि आपके साथ एक गंभीर अपराध (Cognizable Offence) हुआ है और आप BNSS 2023 की धारा 173(1) के तहत 'जीरो एफआईआर' दर्ज कराना चाहते हैं। - चरण 2: तथ्यात्मक लिखित शिकायत प्रस्तुत करें:
शिकायत सादे कागज पर लिखें। इसमें घटना का सही समय, तारीख, घटनास्थल का स्पष्ट ब्योरा, आरोपियों का विवरण (यदि ज्ञात हो) और घटना का क्रमबद्ध विवरण दर्ज करें। यदि आप लिख नहीं सकते, तो पुलिसकर्मी का कर्तव्य है कि वह आपके मौखिक बयान को लिखे और आपको पढ़कर सुनाए। - चरण 3: मेडिकल परीक्षण व तात्कालिक साक्ष्य संकलन:
यदि मारपीट या शारीरिक चोट का मामला है, तो ड्यूटी ऑफिसर का कानूनी दायित्व है कि वह तुरंत एक पुलिसकर्मी के साथ आपको सरकारी अस्पताल भेजकर एमएलसी (Medico-Legal Certificate) बनवाए। जीरो एफआईआर का थाना तात्कालिक साक्ष्य (जैसे घटनास्थल की तस्वीरें, खून के नमूने) सुरक्षित करता है। - चरण 4: निशुल्क जीरो एफआईआर की कॉपी प्राप्त करें:
एफआईआर दर्ज होने के बाद कंप्यूटर से जनरेटेड एफआईआर कॉपी पर पुलिस की मुहर और मोहरबंद हस्ताक्षर लें। इस कॉपी पर "FIR No. 00 / 2026" लिखा होगा। इसके लिए कोई शुल्क न दें। - चरण 5: अधिकार क्षेत्र वाले थाने को ट्रांसफर ट्रैकिंग:
थाना प्रभारी उस एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट और साक्ष्यों को एक विशेष वाहक (Special Messenger) के माध्यम से 24 घंटे के भीतर उस थाने को भेजेगा जहाँ वास्तव में घटना घटी थी। वहां पहुंचते ही आपको नया नियमित एफआईआर नंबर जारी कर दिया जाएगा।
यदि थाना प्रभारी (SHO) एफआईआर दर्ज करने से मना करे तो क्या करें? 3 कानूनी रास्ते
यदि कोई भ्रष्ट या लापरवाह पुलिस अधिकारी आपकी एफआईआर दर्ज करने से साफ मना कर दे, तो घबराने या झगड़ने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय कानून नागरिक को तीन अत्यंत शक्तिशाली कानूनी हथियार प्रदान करता है:
एफआईआर से इनकार पर नागरिक के पास उपलब्ध 3 कानूनी उपचार:
रास्ता 1: पुलिस अधीक्षक (SP / DCP) को पंजीकृत डाक से शिकायत (BNSS धारा 173(4)):
यदि एसएचओ एफआईआर नहीं लिखता, तो अपनी लिखित शिकायत की प्रति संलग्न करते हुए अपने जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) या पुलिस उपायुक्त (DCP) को रजिस्टर्ड डाक / स्पीड पोस्ट द्वारा प्रेषित करें। धारा 173(4) (पुराना CrPC 154(3)) के तहत एसपी यदि संतुष्ट होता है कि गंभीर अपराध (Cognizable Offence) हुआ है, तो वह या तो स्वयं जांच करेगा या अपने किसी अधीनस्थ पुलिस अधिकारी को तत्काल एफआईआर दर्ज करने का लिखित आदेश जारी करेगा।
रास्ता 2: न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में अर्जी (BNSS धारा 175(3) - पूर्ववर्ती CrPC 156(3)):
यदि एसपी को पत्र भेजने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती, तो अपने वकील के माध्यम से स्थानीय क्षेत्राधिकार वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMIC / ACJM / MM) की अदालत में BNSS 2023 की धारा 175(3) के तहत एक कानूनी परिवाद दाखिल करें। इस आवेदन के साथ शपथ पत्र और एसपी को भेजी गई स्पीड पोस्ट की रसीद संलग्न करना अनिवार्य है। मजिस्ट्रेट साक्ष्यों को देखकर संतुष्ट होने पर पुलिस को सीधे आदेश (Mandamus) जारी करते हैं: "एफआईआर दर्ज कर 24 घंटे में अदालत को सूचित करें।" पुलिस कोर्ट के इस आदेश को टालने की हिम्मत नहीं कर सकती।
रास्ता 3: राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) व राष्ट्रीय पोर्टल पर शिकायत:
यदि मामला गंभीर उत्पीड़न का है, तो राज्य मानवाधिकार आयोग या गृह मंत्रालय के CPGRAMS (pgportal.gov.in) पोर्टल पर पुलिस अधिकारी की कार्यशैली के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराएं।
एफआईआर न लिखने वाले पुलिस अधिकारी पर कानूनी डंडा: BNS धारा 199 में 2 साल की जेल
अधिकांश नागरिक यह नहीं जानते कि एफआईआर दर्ज करने से मना करना केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि स्वयं एक गंभीर आपराधिक कृत्य (Criminal Offence) है:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) की धारा 199 (पूर्ववर्ती IPC 166A): यदि कोई लोक सेवक (पुलिस अधिकारी) कानून के उस स्पष्ट निर्देश की जानबूझकर अवज्ञा करता है जिसके तहत उसे गंभीर अपराध (Cognizable Offence) की सूचना दर्ज करना अनिवार्य था, तो उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ धारा 199 के तहत मुकदमा चलाया जाएगा।
- सजा का प्रावधान: दोषी पुलिस अधिकारी को न्यूनतम 6 महीने से लेकर 2 वर्ष तक का कठोर कारावास और जुर्माना भुगतना होगा। इसके अलावा उसकी सरकारी नौकरी समाप्त हो सकती है।
- विशेष रूप से महिलाओं के खिलाफ अपराध (जैसे BNS धारा 64, 74, 76 - छेड़छाड़, बलात्कार, दहेज उत्पीड़न) में यदि पुलिसकर्मी तुरंत एफआईआर नहीं लिखता, तो धारा 199 के तहत उसकी गिरफ्तारी अनिवार्य हो जाती है।
नियमित एफआईआर बनाम जीरो एफआईआर बनाम e-FIR तुलना सारणी (5-कॉलम)
नीचे दी गई 5-कॉलम तुलनात्मक सारणी में नियमित एफआईआर, जीरो एफआईआर और e-FIR के कानूनी नियमों, प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों का संपूर्ण ब्योरा प्रस्तुत किया गया है:
| तुलना का मानक | नियमित एफआईआर (Regular FIR) | जीरो एफआईआर (Zero FIR) | ऑनलाइन ई-एफआईआर (e-FIR) | नागरिक का कानूनी हक |
|---|---|---|---|---|
| दर्ज करने का स्थान | केवल क्षेत्राधिकार वाला संबंधित थाना | भारत का कोई भी पुलिस थाना | घर बैठे इंटरनेट / CCTNS पोर्टल से | बिना भटके कहीं से भी न्याय पाना |
| आवंटित क्रमांक | वार्षिक क्रमिक संख्या (उदा. 45/2026) | शून्य क्रमांक (उदा. 00/2026) | डिजिटल रेफरेंस / अस्थायी टोकन संख्या | तुरंत रिकॉर्ड जनरेशन का अधिकार |
| हस्ताक्षर की बाध्यता | दर्ज करते समय तुरंत भौतिक हस्ताक्षर | शिकायत पत्र पर तुरंत भौतिक हस्ताक्षर | 3 दिनों के भीतर थाने जाकर हस्ताक्षर | 72 घंटे में पुष्टि करने का अवसर |
| अनुसंधान (Investigation) | उसी थाने के आईओ द्वारा पूर्ण चार्जशीट तक | केवल तात्कालिक मेडिकल व साक्ष्य संकलन | हस्ताक्षर होने के उपरांत ही शुरू | साक्ष्यों को नष्ट होने से बचाना |
| निःशुल्क प्रमाणित प्रति | तत्काल निःशुल्क प्रति पाना अनिवार्य | तत्काल मुहरबंद प्रति पाना अनिवार्य | पीडीएफ डाउनलोड व डिजिटल पावती | BNSS धारा 173(2) के तहत मुफ्त प्रति |
पुलिस अधीक्षक (SP) व न्यायिक मजिस्ट्रेट (BNSS 175) हेतु प्रार्थना पत्र प्रारूप
यदि थाना प्रभारी आपकी एफआईआर (FIR) दर्ज करने से मना करता है, तो निम्नलिखित आधिकारिक प्रारूप के अनुसार स्पीड पोस्ट से एसपी को पत्र भेजें:
रजिस्टर्ड डाक / स्पीड पोस्ट द्वारा प्रेषित प्रार्थना पत्र सेवा में, श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय / पुलिस उपायुक्त (DCP), जिला: [जिले का नाम, राज्य] विषय: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 173(4) (पूर्ववर्ती CrPC 154(3)) के अंतर्गत गंभीर अपराध (Cognizable Offence) की एफआईआर (FIR) (FIR) दर्ज कराने हेतु प्रार्थना पत्र बाबत थाना प्रभारी [थाने का नाम] द्वारा इनकार किए जाने के विरुद्ध। महोदय, सविनय निवेदन है कि प्रार्थी [आपका नाम, पिता का नाम, निवासी पता एवं मोबाइल नंबर], एक विधिमान्य नागरिक है। 1. यह कि दिनांक [घटना की तारीख] को समय लगभग [समय] बजे प्रार्थी के साथ [घटनास्थल का स्थान] पर विपक्षीगण [आरोपियों के नाम, यदि ज्ञात हों, अथवा अज्ञात व्यक्ति] द्वारा [अपराध का संक्षिप्त विवरण, उदा. रास्ता रोककर लाठी-डंडों से जानलेवा हमला करना, सोने की चेन व नकदी छीनना] का गंभीर गंभीर अपराध (Cognizable Offence) कारित किया गया। 2. यह कि प्रार्थी ने दिनांक [तारीख] को थाना [थाने का नाम] में उपस्थित होकर थाना प्रभारी महोदय को उक्त गंभीर अपराध (Cognizable Offence) के संबंध में लिखित तहरीर प्रस्तुत की थी। 3. यह कि उक्त थाना प्रभारी द्वारा प्रार्थी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया गया और क्षेत्राधिकार का झूठा बहाना बनाकर प्रार्थी को थाने से भगा दिया गया। थाना प्रभारी का यह कृत्य माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'ललिता कुमारी बनाम यूपी राज्य' में पारित संकानूनी पीठ के आदेशों एवं भारतीय न्याय संहिता की धारा 199 का खुला उल्लंघन है। 4. यह कि प्रार्थी के पास घटना के पुख्ता साक्ष्य (जैसे मेडिकल चोट रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज एवं गवाहों के बयान) उपलब्ध हैं जो एक गंभीर गंभीर अपराध (Cognizable Offence) का घटित होना सिद्ध करते हैं। प्रार्थना: अतः श्रीमान से सादर प्रार्थना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 173(4) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए संबंधित थाना प्रभारी [थाने का नाम] को प्रार्थी की मूल तहरीर के आधार पर सुसंगत धाराओं में तत्काल एफआईआर (FIR) (FIR) दर्ज कर निष्पक्ष अनुसंधान कराने हेतु निर्देशित फरमाएं। संलग्नक: 1. मूल लिखित तहरीर की छायाप्रति जो थाने में दी गई थी। 2. प्रार्थी का सरकारी अस्पताल का मेडिकल पर्चा/चोट रिपोर्ट। 3. आधार कार्ड की स्वप्रमाणित प्रति। भवदीय, हस्ताक्षर प्रार्थी: ____________________ नाम: [आपका पूरा नाम] मोबाइल नंबर: [पंजीकृत मोबाइल नंबर] दिनांक: [स्थान एवं तारीख]
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)
Q1: क्या जीरो एफआईआर दर्ज कराने के लिए मुझे थाने में कोई फीस या रिश्वत देनी होती है?
बिल्कुल नहीं! भारत के कानून (BNSS धारा 173) के तहत किसी भी थाने में एफआईआर (FIR) दर्ज कराना और उसकी प्रमाणित प्रति प्राप्त करना शत-प्रतिशत निःशुल्क है। यदि कोई पुलिसकर्मी कागज या मुहर के नाम पर एक रुपया भी मांगता है, तो वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध है।
Q2: क्या केवल गंभीर अपराधों (जैसे मर्डर, रेप) में ही जीरो एफआईआर होती है या चोरी में भी?
प्रत्येक गंभीर अपराध (Cognizable Offence) (Cognizable Offence) में जीरो एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है। चाहे वह पर्स चोरी हो, मोबाइल स्नैचिंग हो, सड़क दुर्घटना (Hit-and-Run) हो, धोखाधड़ी हो या कोई शारीरिक हमला। केवल असंज्ञेय मामलों (Non-Cognizable Offence जैसे सामान्य गाली-गलौज) में पुलिस केवल एनसीआर काटती है।
Q3: यदि पुलिसकर्मी कहे कि "पहले घटना स्थल देखकर आएंगे फिर लिखेंगे" तो क्या करें?
सुप्रीम कोर्ट के 'ललिता कुमारी' फैसले के अनुसार पुलिस का यह बहाना गैर-कानूनी है। गंभीर अपराध (Cognizable Offence) की सूचना मिलते ही पुलिस को पहले कंप्यूटर में एफआईआर दर्ज करनी होती है, उसके बाद ही जांच अधिकारी घटनास्थल के निरीक्षण हेतु रवाना हो सकता है। आप पुलिस को सीधे ललिता कुमारी जजमेंट का हवाला दें।
Q4: क्या दूसरे राज्य का थाना भी जीरो एफआईआर दर्ज करने को बाध्य है?
हाँ। यदि आप दिल्ली के निवासी हैं और आपके साथ मुंबई या गोवा की यात्रा के दौरान कोई अपराध घटित हुआ है, तो आप दिल्ली वापस लौटकर अपने घर के पास वाले थाने में भी जीरो एफआईआर दर्ज करा सकते हैं। दिल्ली पुलिस एफआईआर दर्ज करके केस डायरी मुंबई/गोवा पुलिस को स्थानांतरित करेगी।
Q5: क्या ऑनलाइन e-FIR दर्ज करने के बाद मुझे खुद थाने जाना पड़ेगा?
हाँ, BNSS की धारा 173(1) के अनुसार ऑनलाइन दर्ज कराई गई शिकायत पर 3 दिन के भीतर संबंधित थाने जाकर हस्ताक्षर करना अनिवार्य है। यदि आप गंभीर रूप से घायल या अस्पताल में भर्ती हैं, तो पुलिस अधिकारी स्वयं अस्पताल आकर आपके हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लेने को बाध्य है।
Q6: क्या जीरो एफआईआर दर्ज कराने के बाद मुझे बार-बार दूसरे थाने के चक्कर लगाने पड़ेंगे?
केस ट्रांसफर होने के बाद मुख्य जांच वही थाना करेगा जहाँ घटना हुई थी। हालांकि, BNSS 2023 की नई धाराओं के तहत गवाहों के बयान और शिनाख्त परेड आदि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (डिजिटल माध्यम) से दर्ज करने की कानूनी अनुमति दी गई है, जिससे पीड़ित को बार-बार दूर जाने की परेशानी से राहत मिलती है।
Q7: क्या कोई महिला या नाबालिग अपनी पहचान गोपनीय रखकर एफआईआर दर्ज करा सकती है?
हाँ। भारतीय न्याय संहिता की धारा 72 और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत यौन अपराधों की पीड़िता या नाबालिग बच्चों का नाम, पता या पहचान सार्वजनिक करना गैर-कानूनी है। एफआईआर में उनका नाम गोपनीय रखकर कोड नाम (जैसे पीड़िता 'X') लिखा जाता है और एफआईआर की कॉपी सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड नहीं की जाती।
Q8: यदि एसपी भी शिकायत पर कोई कार्रवाई न करे तो अंतिम उपाय क्या है?
यदि एसपी को स्पीड पोस्ट भेजने के 15 दिनों में कोई कार्रवाई नहीं होती, तो सीधे अपने वकील के माध्यम से स्थानीय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में BNSS की धारा 175(3) के तहत आवेदन लगाएं। मजिस्ट्रेट के पास पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करने और अदालत में स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का कानूनी आदेश देने का पूर्ण अधिकार है।
आधिकारिक सरकारी पोर्टल व क्लस्टर गाइड्स
- Digital Police Citizen Services Portal (MHA CCTNS)
- National Cyber Crime Reporting Portal
- पुलिस अरेस्ट रूल्स 2026: BNSS धारा 35 नोटिस, बिना गिरफ्तारी पूछताछ व कानूनी अधिकार
- तलाशी व जब्ती में अनिवार्य वीडियो रिकॉर्डिंग: BNSS 105 व BSA धारा 61 नियम
- पहली बार अपराध विचाराधीन कैदियों की अनिवार्य जमानत: BNSS धारा 479 SOP
- हिट एंड रन नया कानून (BNS 106(2)): 10 साल जेल का सच व कानूनी बचाव
- चेक बाउंस धारा 138 NI Act: 15-दिवसीय लीगल नोटिस का जवाब व लोक अदालत समझौता
- झूठी एफआईआर रद्द कराने हाईकोर्ट रिट याचिका: BNSS 528 (CrPC 482) गाइड
- पुलिस कस्टडी vs न्यायिक कस्टडी: BNSS 187 रिमांड व 90-दिन डिफॉल्ट जमानत नियम