⚡ त्वरित कानूनी सारांश (Quick Legal Takeaway)
जब पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है, तो आम जनता को 'पुलिस कस्टडी' (थाने का लॉकअप) और 'ज्यूडिशियल कस्टडी' (जेल) के बीच का कानूनी अंतर समझ नहीं आता। BNSS की धारा 187 के तहत पुलिस कस्टडी केवल पूछताछ और सुबूतों की बरामदगी हेतु मजिस्ट्रेट की विशेष अनुमति से ही मिलती है। नए कानून ने पुलिस को यह सुविधा दी है कि वह 15 दिन का रिमांड पहले 40 या 60 दिनों में टुकड़ों में मांग सकती है, परंतु इसके साथ ही हर 48 घंटे में मेडिकल जांच और वकील से मिलने के अधिकार को अनिवार्य किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण, यदि पुलिस तय समय (60 या 90 दिन) में जांच पूरी नहीं करती, तो आरोपी को डिफॉल्ट बेल पर जेल से बाहर आना उसका कानूनी हक बन जाता है।
विषय सूची (Table of Contents)
- 1. पुलिस कस्टडी (थाना लॉकअप) बनाम न्यायिक हिरासत (जेल): मूलभूत कानूनी अंतर
- 2. BNSS धारा 187 का 15-दिवसीय रिमांड नियम: 40 व 60 दिनों में टुकड़ों में रिमांड की हकीकत
- 3. 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी का संकानूनी व कानूनी नियम (Article 22(2))
- 4. हिरासत में नागरिक के अधिकार: हर 48 घंटे में मेडिकल जांच व वकील से परामर्श
- 5. हथकड़ी लगाने के नए नियम (BNSS धारा 43(3)): कब हथकड़ी लगाना गैरकानूनी है?
- 6. डिफॉल्ट जमानत (Statutory Default Bail): 60/90 दिन में चार्जशीट न आने पर रिहाई SOP
- 7. सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: डिफॉल्ट बेल एक पक्का व अनिवार्य मौलिक अधिकार (Indefeasible Right)
- 8. पुलिस कस्टडी बनाम न्यायिक हिरासत बनाम डिफॉल्ट बेल तुलना सारणी (5-कॉलम)
- 9. धारा 187 के तहत कोर्ट में डिफॉल्ट जमानत आवेदन का आधिकारिक कानूनी ड्राफ्ट
- 10. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)
- 11. आधिकारिक सरकारी पोर्टल व क्लस्टर गाइड्स
1. पुलिस कस्टडी (थाना लॉकअप) बनाम न्यायिक हिरासत (जेल): मूलभूत कानूनी अंतर
जब कोई व्यक्ति किसी अपराध में गिरफ्तार होता है, तो वह राज्य की हिरासत (कस्टडी) (Custody) में चला जाता है। भारतीय न्याय प्रणाली में हिरासत के दो अलग-अलग प्रकार होते हैं:
1. पुलिस कस्टडी (Police Custody / रिमांड):
- स्थान: पुलिस थाने का हवालात (Lockup) या जांच एजेंसी (जैसे CBI, ED, Crime Branch) का पूछताछ कक्ष।
- नियंत्रण: अभियुक्त सीधे जांच अधिकारी (IO) और थाना पुलिस के भौतिक नियंत्रण में होता है।
- उद्देश्य: अपराध के संबंध में गहन पूछताछ करना, जुर्म में इस्तेमाल हथियार, वाहन, दस्तावेज या लूटा गया माल बरामद करना (धारा 23 भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 - पूर्ववर्ती धारा 27 IEA).
- जोखिम: पुलिस कस्टडी में प्रताड़ना (Third Degree) और दबाव का सबसे अधिक खतरा होता है, इसलिए कानून इस पर सबसे कड़ा न्यायिक नियंत्रण रखता है।
2. न्यायिक हिरासत (Judicial Custody / जेल):
- स्थान: राज्य सरकार का केंद्रीय या जिला कारागार (Central/District Jail).
- नियंत्रण: अभियुक्त जेल अधीक्षक (Jail Superintendent) और सीधे संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में होता है। पुलिस का उस पर कोई सीधा नियंत्रण नहीं होता।
- उद्देश्य: समाज को सुरक्षित रखना और यह सुनिश्चित करना कि अभियुक्त फरार न हो या गवाहों को डराए-धमकाए नहीं।
- नियम: न्यायिक हिरासत में बंद कैदी से पुलिस बिना मजिस्ट्रेट की पूर्व लिखित अनुमति के पूछताछ नहीं कर सकती।
2. BNSS धारा 187 का 15-दिवसीय रिमांड नियम: 40 व 60 दिनों में टुकड़ों में रिमांड की हकीकत
पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC 1973) की धारा 167 के तहत एक बहुत सख्त नियम था: "पुलिस कस्टडी केवल और केवल गिरफ्तारी की तारीख से पहले 15 दिनों के भीतर ही दी जा सकती थी।" 15 दिन बीतने के बाद अदालत केवल न्यायिक हिरासत (जेल) में ही भेज सकती थी। यदि कोई अभियुक्त पहले 15 दिनों में बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हो जाता था, तो पुलिस उसकी कस्टडी पाने से हमेशा के लिए वंचित हो जाती थी।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 187(2) एवं 187(3) ने इस नियम में एक बड़ा बदलाव किया है:
"मजिस्ट्रेट आरोपी को पुलिस हिरासत (कस्टडी) में कुल मिलाकर पंद्रह दिनों (15 Days in the Whole) से अनधिक ऐसी अवधि के लिए, जो वह ठीक समझे, उस अवधि के दौरान प्राधिकृत कर सकता है जो साठ दिन (60 Days) या नब्बे दिन (90 Days) की कुल अवधि के पहले चालीस दिनों (First 40 Days) या साठ दिनों (First 60 Days) में फैले हुए भागों (Tranches / Parts) में हो।"
नागरिकों और वकीलों के लिए इसका व्यावहारिक अर्थ:
- कुल पुलिस रिमांड अब भी अधिकतम 15 दिन ही है: पुलिस किसी भी स्थिति में 15 दिन से अधिक की पुलिस कस्टडी नहीं ले सकती।
- टुकड़ों में रिमांड (Intermittent Remand): पुलिस चाहे तो पहले 5 दिन की पुलिस कस्टडी ले, फिर आरोपी को 15 दिन के लिए जेल भेज दे, और फिर नए सुबूत मिलने पर 25वें दिन आकर मजिस्ट्रेट से शेष 10 दिन की पुलिस कस्टडी मांग ले।
- समय-सीमा: 10 वर्ष तक की सजा वाले मामलों में यह 15 दिन का कोटा पहले 40 दिनों के भीतर पूरा करना होगा। 10 वर्ष से अधिक सजा वाले गंभीर मामलों में यह पहले 60 दिनों के भीतर पूरा करना होगा।
3. 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी का संकानूनी व कानूनी नियम (Article 22(2))
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58 यह स्पष्ट घोषणा करते हैं कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने के 24 घंटे के भीतर (यात्रा के समय को छोड़कर) निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष शारीरिक रूप से पेश करना अनिवार्य है।
यदि पुलिस किसी नागरिक को 24 घंटे से अधिक समय तक थाने में बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के बंद रखती है, तो यह अवैध निरोध (Illegal Detention) की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में पीड़ित परिवार उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के तहत तुरंत 'बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका' (Habeas Corpus Petition) दाखिल कर सकता है, जिस पर हाईकोर्ट पुलिस के खिलाफ वारंट जारी करके नागरिक को तुरंत रिहा कराता है और दोषी पुलिसकर्मियों पर जुर्माना लगाता है।
4. हिरासत में नागरिक के अधिकार: हर 48 घंटे में मेडिकल जांच व वकील से परामर्श
पुलिस हिरासत के दौरान नागरिक के बुनियादी मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कानून ने निम्नलिखित सुरक्षा कवच दिए हैं:
- हर 48 घंटे में अनिवार्य चिकित्सकीय जांच (BNSS धारा 53): पुलिस कस्टडी में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का हर 48 घंटे में किसी सरकारी डॉक्टर द्वारा मेडिकल परीक्षण कराया जाना अनिवार्य है। डॉक्टर शरीर पर लगी किसी भी नई चोट, खरोंच या प्रताड़ना के निशान को मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज करता है।
- वकील से परामर्श का अधिकार (BNSS धारा 38): पूछताछ के दौरान आरोपी को अपने वकील से मिलने और परामर्श करने का कानूनी हक है, हालांकि वकील पूरी पूछताछ के दौरान लगातार साथ नहीं बैठेगा लेकिन वह दृश्य सीमा (Within Sight) में उपस्थित रह सकता है।
- परिवार को सूचना (BNSS धारा 48): गिरफ्तारी के तुरंत बाद आरोपी द्वारा नामित किसी एक परिजन या मित्र को उसकी गिरफ्तारी और थाने के स्थान की लिखित या टेलीफोनिक सूचना देना पुलिस का अनिवार्य दायित्व है।
5. हथकड़ी लगाने के नए नियम (BNSS धारा 43(3)): कब हथकड़ी लगाना गैरकानूनी है?
उच्चतम न्यायालय ने प्रेम शंकर शुक्ला (1980) और डी.के. बसु (1997) में स्पष्ट कहा था कि सामान्य नागरिकों और आरोपियों को हथकड़ी लगाना मानव गरिमा (Human Dignity) का हनन है।
BNSS की धारा 43(3) ने हथकड़ी के नियमों को अत्यंत विशिष्ट बना दिया है। पुलिस केवल निम्नलिखित परिस्थितियों में ही हथकड़ी का प्रयोग कर सकती है:
- जब आरोपी आदतन अपराधी (Habitual Offender) हो या पूर्व में जेल से फरार हो चुका हो।
- जब अपराध अत्यंत जघन्य हो (जैसे संगठित अपराध, आतंकवाद, हत्या, बलात्कार, बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध, या राज्य के विरुद्ध अपराध)।
- सामान्य मामलों में, वित्तीय अपराधों में, या 7 साल से कम सजा वाले मामलों में किसी भी नागरिक को हथकड़ी लगाना पूर्णतः गैरकानूनी है। यदि पुलिस ऐसा करती है, तो संबंधित पुलिस अधिकारी मानवाधिकार आयोग और अदालत में अवमानना के दोषी होंगे।
6. डिफॉल्ट जमानत (Statutory Default Bail): 60/90 दिन में चार्जशीट न आने पर रिहाई SOP
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में जांच पूरी करने के लिए पुलिस को असीमित समय नहीं दिया गया है। यदि जांच एजेंसियां समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं करतीं, तो कानून आरोपी को स्वतंत्रता का उपहार देता है जिसे डिफॉल्ट जमानत (Default Bail / Statutory Bail) कहा जाता है।
डिफॉल्ट जमानत की कानूनी समय-सीमा (Limitation Period)एं (BNSS 187(3)):
- 90 दिनों का नियम: यदि अपराध ऐसा है जिसमें मृत्युदंड, आजीवन कारावास, या 10 वर्ष से अधिक की सजा का प्रावधान है, तो पुलिस को गिरफ्तारी की तारीख से 90 दिनों के भीतर अदालत में चार्जशीट (Challan / Police Report) दाखिल करनी होती है।
- 60 दिनों का नियम: अन्य सभी अपराधों में (जिनमें सजा 10 वर्ष या उससे कम है), पुलिस को 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करना अनिवार्य है।
डिफॉल्ट जमानत पाने की चरणबद्ध SOP:
- दिनों की सटीक गणना करें: जिस दिन आरोपी को मजिस्ट्रेट द्वारा पहली बार रिमांड पर भेजा गया था, उसके अगले दिन से दिनों की गिनती शुरू करें।
- 61वें या 91वें दिन सुबह कोर्ट में अर्जी लगाएं: जैसे ही 60 या 90 दिन पूरे हों और पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट पेश न की हो, तो 61वें या 91वें दिन सुबह अदालत खुलते ही धारा 187(3) के तहत डिफॉल्ट जमानत की अर्जी दाखिल कर दें।
- बेल बॉन्ड प्रस्तुत करने की तत्परता दिखाएं: अर्जी में स्पष्ट लिखें कि "प्रार्थी न्यायालय द्वारा निर्धारित मुचलका व जमानतदार प्रस्तुत करने हेतु पूरी तरह तैयार है।"
- अदालत का अनिवार्य कर्तव्य: जैसे ही अर्जी दाखिल होती है, कोर्ट का यह दायित्व बन जाता है कि वह उसी दिन फैसला करे। यदि पुलिस दोपहर में चार्जशीट लेकर आती है, तब भी आरोपी का डिफॉल्ट बेल का अधिकार खत्म नहीं होता क्योंकि उसने चार्जशीट से पहले अर्जी दाखिल कर दी थी।
7. सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: डिफॉल्ट बेल एक पक्का व अनिवार्य मौलिक अधिकार (Indefeasible Right)
माननीय उच्चतम न्यायालय ने 'बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य (2020 10 SCC 616)' और 'एम. रविंद्रन बनाम इंटेलिजेंस ऑफिसर (2021 2 SCC 485)' में स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि:
"धारा 167(2) [वर्तमान BNSS 187(3)] के तहत डिफॉल्ट जमानत केवल एक कानूनी अधिकार नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने और व्यक्तिगत आजादी का अधिकार के मौलिक अधिकार का सीधा विस्तार है। एक बार जब 60 या 90 दिन की कानूनी तय समय समाप्त हो जाती है और आरोपी जमानत का आवेदन कर देता है, तो उसका यह अधिकार पक्का व अनिवार्य (Indefeasible) बन जाता है जिसे अदालत के विवेक से भी नहीं छीना जा सकता।"
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया है कि मजिस्ट्रेट का यह कर्तव्य है कि अवधि पूरी होते ही वह जेल में बंद कैदी को सूचित करे कि उसे डिफॉल्ट जमानत पाने का कानूनी अधिकार मिल चुका है।
8. पुलिस कस्टडी बनाम न्यायिक हिरासत बनाम डिफॉल्ट बेल तुलना सारणी (5-कॉलम)
| कानूनी मानक | पुलिस कस्टडी (Police Custody) | न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) | डिफॉल्ट जमानत (Default Bail) | संकानूनी व नागरिक सुरक्षा प्रभाव |
|---|---|---|---|---|
| हिरासत का स्थान | थाने का हवालात या जांच एजेंसी कार्यालय। | जिला अथवा केंद्रीय कारागार (Jail). | जेल से पूर्ण रिहाई (अपने घर पर). | नागरिक को थाने के दबाव और जेल की चहारदीवारी से पूर्ण मुक्ति। |
| अधिकतम कानूनी तय समय | कुल मिलाकर अधिकतम 15 दिन (40/60 दिन के भीतर). | चार्जशीट तक 60 या 90 दिन; ट्रायल तक बढ़ सकती है। | मुकदमे के अंतिम निर्णय तक स्थाई जमानत। | पुलिसिया रिमांड को असीमित समय तक खींचने पर पूर्ण कानूनी रोक। |
| पूछताछ व साक्ष्य नियम | सीधी पुलिस पूछताछ व बरामदगी हेतु ले जाना। | कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना पूछताछ पूर्णतः प्रतिबंधित। | केवल तारीखों पर कोर्ट में पेशी; कोई कस्टडी नहीं। | हिरासत में टॉर्चर और जबरन इकबालिया बयान पर न्यायिक रोक। |
| चिकित्सकीय जांच अनिवार्यता | प्रत्येक 48 घंटे में अनिवार्य सरकारी डॉक्टर जांच। | जेल प्रवेश के समय व अस्वस्थ होने पर जेल अस्पताल। | लागू नहीं; नागरिक स्वतंत्र है। | पुलिस कस्टडी में मारपीट सिद्ध करने हेतु आधिकारिक डॉक्टर रिपोर्ट। |
| अदालत का विवेकाधिकार | कारणों की समीक्षा के बाद अत्यंत सीमित आधार पर। | जमानत खारिज होने पर सामान्य प्रक्रिया। | शून्य विवेकाधिकार (No Discretion); जमानत देना अनिवार्य। | सरकारी वकीलों के विरोध के बावजूद जज को जमानत देनी ही पड़ती है। |
9. धारा 187 के तहत कोर्ट में डिफॉल्ट जमानत आवेदन का आधिकारिक कानूनी ड्राफ्ट
यदि 60 या 90 दिन पूरे होने पर भी पुलिस ने चार्जशीट दाखिल नहीं की है, तो विचाराधीन कैदी के वकील द्वारा ट्रायल कोर्ट में निम्नलिखित प्रारूप में अर्जी दायर की जानी चाहिए:
प्रकरण संख्या: .................... वर्ष: 2026
थाना: .................... जिला: ....................
मुकदमा अपराध संख्या (FIR No.): .................... धाराएं: ....................
राज्य बनाम .................... (अभियुक्त/प्रार्थी, वर्तमान में जेल में निरुद्ध)
विषय: पुलिस द्वारा कानूनी मियाद (60/90 दिन) के भीतर आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल न किए जाने के कारण कानूनी डिफॉल्ट जमानत स्वीकार किए जाने बाबत।
महोदय,
प्रार्थी/आरोपी की ओर से निम्नलिखित निवेदन सादर प्रस्तुत है:
1. यह कि प्रार्थी को उपरोक्त मुकदमे में पुलिस द्वारा दिनांक ................ को गिरफ्तार किया गया था और इस न्यायालय द्वारा पहली बार दिनांक ................ को न्यायिक हिरासत (कस्टडी) में भेजा गया था।
2. यह कि प्रार्थी आज दिनांक ................ तक लगातार ................ दिनों से न्यायिक हिरासत में जिला कारागार में बंद है।
3. यह कि प्रार्थी के विरुद्ध आरोपित अपराध में कानूनन अधिकतम ................ वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है, जिसके तहत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187(3) के अनुसार जांच एजेंसी को ठीक 60 दिन (अथवा 90 दिन) के भीतर अंतिम आरोप पत्र दाखिल करना अनिवार्य था।
4. यह कि आज दिनांक ................ को उक्त कानूनी तय समय समाप्त हो चुकी है और अभियोजन / जांच एजेंसी द्वारा न्यायालय के समक्ष कोई आरोप पत्र (Charge Sheet) प्रस्तुत नहीं किया गया है।
5. यह कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 'बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य' एवं 'संजय दत्त बनाम राज्य' में स्पष्ट रूप से फैसले में साफ कहा है कि निर्धारित अवधि में चार्जशीट न आने पर डिफॉल्ट जमानत प्राप्त करना आरोपी का एक पक्का संकानूनी मौलिक अधिकार (Indefeasible Fundamental Right) बन जाता है।
6. यह कि प्रार्थी न्यायालय द्वारा निर्धारित किसी भी राशि का व्यक्तिगत मुचलका (Bail Bond) (Personal Bond) एवं उचित जमानतदार (Surety) (Surety) प्रस्तुत करने को तत्पर एवं तैयार है।
प्रार्थना:
अतः श्रीमान जी से सादर प्रार्थना है कि न्यायहित में प्रार्थी/आरोपी को BNSS 2023 की धारा 187(3) के अंतर्गत डिफॉल्ट जमानत पर रिहा किए जाने का आदेश पारित करने की कृपा करें।
दिनांक: ................
समय: ................ (पूर्वाह्न 10:30 बजे)
स्थान: ................
प्रार्थी अभियुक्त द्वारा वकील (Advocate)
(हस्ताक्षर व मुहर)
10. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)
BNSS 187 के तहत पुलिस को अधिकतम कितने दिन का रिमांड मिल सकता है?
पुलिस कस्टडी (रिमांड) की कुल अधिकतम अवधि अब भी 15 दिन ही है। फर्क केवल इतना है कि नए कानून में पुलिस इन 15 दिनों को जांच के पहले 40 दिनों (60 दिन वाले मामलों में) या पहले 60 दिनों (90 दिन वाले मामलों में) के दौरान अलग-अलग किस्तों में मांग सकती है।
पुलिस कस्टडी और न्यायिक हिरासत में सुरक्षित कौन सा है?
न्यायिक हिरासत (जेल) अधिक सुरक्षित होती है क्योंकि अभियुक्त सीधे जेल अधीक्षक और न्यायालय की निगरानी में होता है। पुलिस वहां बिना मजिस्ट्रेट की लिखित अनुमति के न तो पूछताछ कर सकती है और न ही कैदी को जेल से बाहर ले जा सकती है।
डिफॉल्ट जमानत (Default Bail) कब मिलती है?
यदि 10 वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में पुलिस 60 दिनों के भीतर और 10 वर्ष से अधिक सजा वाले गंभीर अपराधों में 90 दिनों के भीतर कोर्ट में चार्जशीट पेश नहीं करती है, तो आरोपी को 61वें या 91वें दिन स्वतः डिफॉल्ट जमानत पाने का कानूनी अधिकार मिल जाता है।
यदि 60 दिन पूरे होने के बाद पुलिस उसी दिन दोपहर में चार्जशीट ले आए तो क्या बेल मिलेगी?
यदि आरोपी के वकील ने चार्जशीट पेश होने से पहले सुबह कोर्ट में डिफॉल्ट जमानत की अर्जी दाखिल कर दी थी, तो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार आरोपी का अधिकार सुरक्षित हो जाता है। बाद में चार्जशीट आने पर भी अदालत को डिफॉल्ट जमानत देनी ही होगी।
क्या पुलिस कस्टडी के दौरान मारपीट होने पर शिकायत की जा सकती है?
हां। BNSS धारा 53 के तहत हर 48 घंटे में होने वाले मेडिकल परीक्षण में डॉक्टर को चोटें दिखाएं। जब पुलिस आपको दोबारा मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करे, तो तुरंत जज साहब को चोटें दिखाकर पुलिस के खिलाफ टॉर्चर की शिकायत और मेडिकल बोर्ड गठन की मांग करें।
क्या पुलिस पूछताछ के समय वकील मौजूद रह सकता है?
हां। BNSS की धारा 38 के तहत आरोपी को पूछताछ के दौरान अपने पसंद के वकील से मिलने का अधिकार है। वकील पूछताछ के समय दृष्टि सीमा (Within Sight) में बैठ सकता है, हालांकि वह पूछताछ प्रक्रिया में सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
क्या गंभीर अपराधों जैसे हत्या या डकैती में भी डिफॉल्ट बेल मिलती है?
हां। हत्या या डकैती जैसे जघन्य अपराधों में भी यदि पुलिस 90 दिनों के भीतर चालान पेश नहीं कर पाती, तो आरोपी को डिफॉल्ट जमानत पाने का निरपेक्ष अधिकार मिल जाता है। अदालत अपराध की गंभीरता का हवाला देकर डिफॉल्ट बेल से मना नहीं कर सकती।
डिफॉल्ट जमानत पर रिहा होने के बाद क्या पुलिस दोबारा गिरफ्तार कर सकती है?
नहीं। डिफॉल्ट जमानत को सामान्य नियमित जमानत के समान ही माना जाता है। जब तक अभियुक्त जमानत की शर्तों का उल्लंघन न करे या गवाहों को धमकाने का कोई नया ठोस मामला सामने न आए, तब तक केवल चार्जशीट आने के आधार पर डिफॉल्ट जमानत रद्द नहीं की जा सकती।
11. आधिकारिक सरकारी पोर्टल व क्लस्टर गाइड्स
- माननीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) - बेल गाइडलाइंस
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) - कस्टोडियल राइट्स पोर्टल
- 7 साल से कम सजा में धारा 35 नोटिस व गिरफ्तारी नियम (BNSS 35)
- प्रथम बार विचाराधीन कैदियों की 1/3 अवधि पर अनिवार्य जमानत नियम (BNSS 479)
- झूठी एफआईआर रद्द कराने हेतु हाईकोर्ट में याचिका (BNSS 528)