आपराधिक कानून एवं नागरिक अधिकार ⏱️ 5 मिनट 📅 2026-10-07

BNSS धारा 479 विचाराधीन कैदी अनिवार्य जमानत नियम: प्रथम अपराधी को 1/3 अवधि पर रिहाई की प्रक्रिया

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एडवोकेट राजेश शर्मा
वरिष्ठ आपराधिक विधि सलाहकार एवं बीएनएसएस शोधार्थी

एडवोकेट राजेश शर्मा भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) एवं नागरिक अधिकारों के विशेषज्ञ विधिक सलाहकार हैं।

⚡ त्वरित उत्तर (Quick Answer)

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 479 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति पहली बार अपराध (First-Time Offender) का आरोपी है और उसने अपने ऊपर लगे अपराध की अधिकतम निर्धारित सजा का एक-तिहाई (1/3rd) समय जेल में विचाराधीन कैदी (Undertrial Prisoner) के रूप में काट लिया है, तो अदालत को उसे अनिवार्य रूप से व्यक्तिगत मुचलका (Bail Bond) (Personal Bond) पर जमानत पर रिहा करना होगा। अन्य सामान्य मामलों में यह सीमा आधी (1/2) सजा है। मृत्युदंड या आजीवन कारावास वाले अपराधों को छोड़कर यह नियम सभी कैदियों पर अनिवार्य (कंपलसरी) है।

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📑 विषय सूची (Table of Contents)

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कानूनी धारा व नियम: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (धारा 479 - पूर्ववर्ती CrPC 436A का प्रतिस्थापन) | उच्चतम न्यायालय आदेश: इन री: पॉलिसी स्ट्रैटेजी फॉर ग्रांट ऑफ बेल (2024 SC) - पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव मान्य | संकानूनी संरक्षण: भारत का संविधान (अनुच्छेद 21 - जीने और व्यक्तिगत आजादी का अधिकार)

⚡ त्वरित कानूनी सारांश (Quick Legal Takeaway)

भारत की जेलों में बंद लगभग 76% कैदी दोषी नहीं, बल्कि विचाराधीन (Undertrial) हैं जो मुकदमों के वर्षों तक लंबित रहने के कारण जेलों में सड़ते रहते हैं। BNSS की धारा 479 ने इस मानवीय त्रासदी को हल करने के लिए ऐतिहासिक प्रावधान किया है। यदि किसी आरोपी का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, तो उसे अधिकतम सजा का केवल एक-तिहाई (1/3) समय जेल में बिताने के बाद कानूनी रूप से अनिवार्य जमानत का अधिकार मिल जाता है। जेल अधीक्षक का यह कानूनी कर्तव्य बना दिया गया है कि अवधि पूरी होते ही वह स्वयं न्यायालय को रिहाई का आवेदन भेजे।

विषय सूची (Table of Contents)

1. भारत में विचाराधीन कैदियों का संकट और धारा 479 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

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भारत की जेलों की स्थिति पर नजर डालें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'प्रिजन्स स्टैटिस्टिक्स इंडिया' रिपोर्ट एक भयावह तस्वीर पेश करती है। देश भर की 1,300 से अधिक जेलों में उनकी निर्धारित क्षमता से लगभग 130% अधिक कैदी ठूंसे हुए हैं। इनमें से 4 लाख से अधिक (लगभग 76%) कैदी ऐसे हैं जिनके खिलाफ मुकदमा चल रहा है, लेकिन अदालत ने उन्हें दोषी नहीं ठहराया है।

गरीबी, अशिक्षा, योग्य वकील का अभाव और जमानत राशि (Bail Bond) न भर पाने के कारण ये विचाराधीन कैदी बिना किसी जुर्म के वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे सड़ते रहते हैं। कई मामलों में तो ऐसा देखा गया कि जिस अपराध की अधिकतम सजा 3 साल थी, गरीब कैदी ने मुकदमे की तारीखों के इंतजार में 4 साल जेल में काट दिए।

वर्ष 2005 में पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता में धारा 436A जोड़ी गई थी, जिसमें यह कहा गया था कि यदि कोई विचाराधीन कैदी अधिकतम सजा का आधा (1/2) समय जेल में काट लेता है, तो उसे जमानत पर रिहा किया जा सकता है। लेकिन धारा 436A में कई विसंगतियां थीं:

  • यह पहली बार अपराध करने वाले और आदतन अपराधियों के बीच कोई भेद नहीं करती थी।
  • जेल अधीक्षकों पर कोई समयबद्ध जिम्मेदारी नहीं थी कि वे स्वयं ऐसे कैदियों की सूची न्यायालय को भेजें।
  • अदालतें अक्सर सरकारी वकीलों की आपत्तियों पर कैदियों को 'आगे हिरासत' में रखने का आदेश दे देती थीं।

संसद ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 479 में इन सभी कमियों को दूर करते हुए एक अत्यंत मानवीय और अधिकार-आधारित ढांचा स्थापित किया है।

2. प्रथम अपराधी (First-Time Offender) हेतु 1/3 अवधि का ऐतिहासिक कानूनी नियम

BNSS धारा 479 का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनी पहलू सब-सेक्शन (Sub-section) (1) का खास नियम व शर्त (Proviso) (Proviso) है, जो प्रथम बार अपराध करने वाले विचाराधीन कैदियों के लिए विशेष सुरक्षा प्रदान करता है:

"परंतु जहां कोई व्यक्ति पहली बार का अपराधी है (अर्थात वह पहले कभी किसी अपराध के लिए सिद्धदोष नहीं ठहराया गया है), तो उसे उस अपराध के लिए विनिर्दिष्ट कारावास की अधिकतम अवधि के एक-तिहाई (One-Third) तक की अवधि पूरी करने पर न्यायालय द्वारा जमानत पर रिहा किया जाएगा।"

इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझें:

मान लीजिए कि किसी 22 वर्षीय युवक 'अमित' पर चोरी या गबन का आरोप है, जिसकी अधिकतम सजा भारतीय न्याय संहिता में 3 वर्ष (36 माह) है। अमित का इससे पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है और न ही वह कभी किसी मामले में दोषी सिद्ध हुआ है।

  • पुरानी CrPC 436A के तहत अमित को जमानत का यह अनिवार्य कानूनी हक पाने के लिए कम से कम 18 महीने (आधा समय) जेल में काटना पड़ता था।
  • परंतु BNSS 479 के तहत, क्योंकि अमित एक प्रथम अपराधी (First-Time Offender) है, इसलिए उसे 36 माह का 1/3 भाग यानी मात्र 12 महीने (1 वर्ष) जेल में बिताने के बाद अनिवार्य जमानत मिल जाएगी।
  • अदालत को उसे व्यक्तिगत मुचलका (Bail Bond) (Personal Bond) पर रिहा करना होगा, भले ही उसके पास कोई धनी जमानतदार (Surety) न हो।

3. सामान्य विचाराधीन कैदियों हेतु आधी (1/2) सजा का कानूनी नियम

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यदि कोई व्यक्ति प्रथम अपराधी नहीं है (अर्थात उसके खिलाफ पूर्व में किसी अपराध में दोषसिद्धि हो चुकी है), तो उसके लिए सामान्य नियम लागू होगा। धारा 479(1) के मुख्य भाग के अनुसार:

यदि किसी विचाराधीन कैदी ने उस अपराध के लिए कानून में निर्धारित अधिकतम कारावास की आधी (One-Half) अवधि जांच या विचारण (Trial) के दौरान जेल में काट ली है, तो उसे न्यायालय द्वारा जमानत पर रिहा किया जाएगा।

न्यायालय लोक अभियोजक (Public Prosecutor) की बात सुनने के बाद कारणों को लिखित में दर्ज करके ही हिरासत को आगे बढ़ा सकता है, लेकिन किसी भी परिस्थिति में विचाराधीन कैदी को उस अपराध की अधिकतम सजा से अधिक समय तक जेल में निरुद्ध नहीं रखा जा सकता। यदि अधिकतम सजा की अवधि पूरी हो गई है, तो कैदी को तत्काल रिहा करना अनिवार्य है।

4. धारा 479 के अपवाद: किन मामलों में यह जमानत लागू नहीं होगी?

BNSS की धारा 479 एक कल्याणकारी प्रविधान है, लेकिन यह समाज की सुरक्षा से समझौता नहीं करता। धारा 479 के तहत अनिवार्य जमानत का लाभ निम्नलिखित मामलों में नहीं मिलेगा:

  1. मृत्युदंड वाले अपराध (Offences Punishable with Death): ऐसे जघन्य अपराध जिनमें कानूनन मृत्युदंड (फांसी) की सजा का प्रावधान है (जैसे नृशंस हत्या, आतंकवाद या देशद्रोह से जुड़े अपराध)।
  2. आजीवन कारावास वाले अपराध (Offences Punishable with Life Imprisonment): जिन अपराधों में कानूनन उम्रकैद की सजा निर्धारित की गई है, क्योंकि उम्रकैद का कोई निश्चित गणितीय 1/3 या 1/2 नहीं निकाला जा सकता।
  3. एकाधिक अपराधों की जांच/विचारण (Multiple Offences under Trial): धारा 479(2) के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक अपराधों में या एक से अधिक मुकदमों में एक साथ विचारण चल रहा है, तो उस पर यह स्वतः अनिवार्य जमानत का नियम लागू नहीं होगा। ऐसे मामलों में जमानत का निर्णय न्यायालय के सामान्य विवेकाधिकार पर निर्भर करेगा।

5. सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय: पुराने कैदियों को भी मिलेगा पूर्वव्यापी लाभ

जब 1 जुलाई 2024 को नए आपराधिक कानून लागू हुए, तो जेलों में बंद लाखों कैदियों और निचली अदालतों के वकीलों के मन में यह भारी भ्रम था कि क्या BNSS की धारा 479 केवल 1 जुलाई 2024 के बाद दर्ज मुकदमों पर लागू होगी या उन कैदियों पर भी जो 1 जुलाई 2024 से पहले से जेलों में बंद हैं?

इस ऐतिहासिक गतिरोध को समाप्त करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने अगस्त 2024 में 'इन री: पॉलिसी स्ट्रैटेजी फॉर ग्रांट ऑफ बेल' (In Re: Policy Strategy for Grant of Bail) मामले में एक अत्यंत युगांतकारी निर्णय सुनाया:

  • न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया कि BNSS की धारा 479 का लाभ पूर्वव्यापी (Retrospectively) रूप से लागू होगा।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रक्रियात्मक कानून (Procedural Law) जो आरोपी के जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) की रक्षा करता है, उसे सभी लंबित मामलों पर लागू किया जाना चाहिए।
  • शीर्ष अदालत ने देश भर के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जेल महानिदेशकों (DGs of Prisons) को निर्देश दिया कि वे तुरंत जेलों में बंद सभी विचाराधीन कैदियों की समीक्षा करें और 1/3 या 1/2 अवधि पूरी कर चुके कैदियों की सूची संबंधित अदालतों को भेजकर उनकी तत्काल रिहाई सुनिश्चित कराएं।

6. जेल अधीक्षक (Jail Superintendent) का 30-दिवसीय अनिवार्य कानूनी जिम्मेदारी

पुरानी व्यवस्था में गरीब कैदी को स्वयं वकील करके अर्जी लगानी पड़ती थी। यदि कैदी के पास पैसे नहीं थे, तो वह जेल में ही पड़ा रहता था। BNSS 479(3) ने इस पूरी प्रक्रिया को पलट दिया है और जिम्मेदारी राज्य के अधिकारियों पर डाल दी है:

"धारा 479(3): जेल का जेल अधीक्षक (Jail Superintendent) (Jail Superintendent) किसी विचाराधीन कैदी द्वारा सब-सेक्शन (Sub-section) (1) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि (1/3 या 1/2) पूरी करने की तारीख से तीस दिनों (30 Days) के भीतर संबंधित न्यायालय में एक लिखित आवेदन प्रस्तुत करेगा ताकि उस कैदी की जमानत पर रिहाई की प्रक्रिया शुरू की जा सके।"

यदि जेल अधीक्षक 30 दिनों के भीतर यह आवेदन प्रस्तुत करने में विफल रहता है, तो इसे कानूनी कर्तव्य की अनदेखी या उल्लंघन (Dereliction of Statutory Duty) माना जाएगा और जेल प्रशासन के खिलाफ विभागीय व न्यायिक अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39A के तहत प्रत्येक नागरिक को निःशुल्क कानूनी सहायता (Free Legal Aid) का मौलिक अधिकार प्राप्त है। यदि आपके परिवार का कोई सदस्य या परिचित जेल में बंद है और वह 1/3 अवधि पूरी कर चुका है, तो आप निःशुल्क कानूनी सहायता (लीगल एड) के लिए निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:

  1. जिला न्यायालय में DLSA कार्यालय जाएं: प्रत्येक जिला अदालत परिसर में 'जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण' (DLSA) का फ्रंट ऑफिस होता है। वहां एक साधारण प्रार्थना पत्र दें।
  2. तालुका कानूनी सेवा समिति (TLSC): तहसील स्तर पर मुंसिफ कोर्ट में TLSC सचिव से संपर्क किया जा सकता है।
  3. जेल लीगल एड क्लीनिक (Jail Legal Aid Clinic): प्रत्येक केंद्रीय और जिला जेल के भीतर लीगल एड क्लीनिक संचालित होता है, जहां पैनल एडवोकेट्स और पैरा-लीगल वॉलंटियर्स (PLVs) कैदियों से सीधे मिलकर धारा 479 का फॉर्म भरवाते हैं।
  4. नालसा (NALSA) हेल्पलाइन 15100: राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण की टोल-फ्री हेल्पलाइन 15100 पर कॉल करके किसी भी जेल में बंद कैदी के लिए निःशुल्क वकील की मांग दर्ज कराई जा सकती है।

8. CrPC 436A बनाम BNSS 479 विचाराधीन जमानत तुलना सारणी (5-कॉलम)

कानूनी मानक पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC 436A) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 479) प्रक्रियात्मक अनिवार्यता व समय-सीमा कैदी व उसके परिवार पर प्रभाव
प्रथम अपराधी (First Offender) कोई विशेष प्रावधान नहीं; सभी के लिए आधी (1/2) सजा अनिवार्य थी। मात्र 1/3 (एक-तिहाई) सजा काटने पर अनिवार्य जमानत का अधिकार। पुराने रिकॉर्ड की पुलिस/जेल जांच और तुरंत बेल बॉन्ड स्वीकृति। लाखों युवा और निर्दोष विचाराधीन कैदियों की जेल से बहुत जल्द रिहाई।
जेल अधीक्षक का दायित्व केवल औपचारिक रिपोर्ट; कोई समयबद्ध बाध्यता नहीं थी। अवधि पूरी होने के 30 दिनों के भीतर कोर्ट में अर्जी लगाना अनिवार्य। धारा 479(3) के तहत कानूनी जिम्मेदारी; अनदेखी या उल्लंघन पर कोर्ट कार्रवाई। गरीब कैदियों को अपने खर्चे पर वकील ढूंढने की मजबूरी खत्म।
पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective) लागू करने में भ्रम और विभिन्न उच्च न्यायालयों में मतभेद थे। सर्वोच्च न्यायालय (2024) द्वारा 1 जुलाई 2024 से पहले के कैदियों पर भी लागू। जेल डीजी द्वारा सभी विचाराधीन कैदियों की तत्काल समीक्षा का आदेश। लंबे समय से बंद पुराने कैदियों को तुरंत न्याय व राहत।
जमानतदार (Surety) की अनिवार्यता अदालतें अक्सर भारी मुचलके और दो स्थानीय जमानतदार मांगती थीं। गरीब कैदियों को व्यक्तिगत मुचलका (Bail Bond) (Personal Bond) पर रिहाई का निर्देश। सम्पत्ति दस्तावेज न होने पर भी रिहाई नहीं रोकी जा सकती। बिना पैसे या जमानतदार के भी जेल से बाहर आना संभव हुआ।
अधिकतम हिरासत सीमा अधिकतम सजा तक हिरासत की अनुमति थी, रिहाई स्वतः नहीं होती थी। अधिकतम सजा से एक दिन भी अधिक हिरासत पूरी तरह गैरकानूनी व प्रतिबंधित। अदालत द्वारा केस बंद करने या तत्काल रिहाई का स्पष्ट निर्देश। संकानूनी जीने और व्यक्तिगत आजादी का अधिकार (अनुच्छेद 21) की वास्तविक सुरक्षा।

9. धारा 479 के अंतर्गत कोर्ट में जमानत याचिका का आधिकारिक प्रारूप

यदि जेल अधीक्षक ने अभी तक आवेदन नहीं भेजा है, तो विचाराधीन कैदी का परिवार या निजी/कानूनी सेवा वकील (Advocate) स्वयं निम्नलिखित प्रारूप में संबंधित ट्रायल कोर्ट या सत्र न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर सकता है:

न्यायालय श्रीमान .................... (सत्र न्यायाधीश / मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट महोदय), ....................

जमानत प्रार्थना पत्र संख्या: .................... वर्ष: 2026
थाना: .................... जिला: ....................
मुकदमा अपराध संख्या (FIR No.): .................... धाराएं: ....................

.................... पुत्र श्री .................... (वर्तमान में जेल में निरुद्ध विचाराधीन कैदी)
बनाम
राज्य सरकार (उत्तर प्रदेश / दिल्ली / राजस्थान / आदि)

जमानत प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 479 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023

महोदय,
प्रार्थी/आरोपी की ओर से निम्नलिखित निवेदन सादर प्रस्तुत है:
1. यह कि प्रार्थी उपरोक्त मुकदमे में दिनांक ................ से केंद्रीय/जिला कारागार ................ में न्यायिक हिरासत (कस्टडी) में निरुद्ध है।
2. यह कि प्रार्थी के विरुद्ध आरोपित अपराध भारतीय दंड संहिता / भारतीय न्याय संहिता की धारा ................ के अंतर्गत आता है, जिसमें कानूनन अधिकतम कारावास की सजा ................ वर्ष विनिर्दिष्ट है।
3. यह कि प्रार्थी आज दिनांक ................ तक कुल ................ माह / वर्ष की वास्तविक न्यायिक हिरासत जेल में पूरी कर चुका है।
4. यह कि प्रार्थी 'प्रथम बार का अपराधी' (First-Time Offender) है और उसका पूर्व में किसी भी न्यायालय द्वारा किसी भी आपराधिक मामले में कोई दोषसिद्धि (Conviction) का रिकॉर्ड नहीं है।
5. यह कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 479(1) के खास नियम व शर्त (Proviso) के अनुसार प्रथम अपराधी को अधिकतम सजा के एक-तिहाई (1/3rd) समय की हिरासत पूरी करने पर जमानत पर रिहा किया जाना अनिवार्य कानूनी अधिकार है। प्रार्थी 1/3 अवधि (अर्थात ................ माह) से अधिक समय जेल में जेल में बिता चुका है।
6. यह कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 'इन री: पॉलिसी स्ट्रैटेजी फॉर ग्रांट ऑफ बेल (2024)' में स्पष्ट रूप से आदेशित किया है कि धारा 479 का लाभ सभी विचाराधीन कैदियों पर पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू होगा।
7. यह कि प्रार्थी निर्धन है और न्यायालय द्वारा निर्धारित सभी शर्तों तथा व्यक्तिगत मुचलका (Bail Bond) (Personal Bond) प्रस्तुत करने को तैयार है।

प्रार्थना:
अतः श्रीमान जी से सादर प्रार्थना है कि न्यायहित में प्रार्थी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 479 के अंतर्गत व्यक्तिगत मुचलका (Bail Bond) एवं जमानतदार (Surety) पर जमानत पर रिहा किए जाने का आदेश पारित करने की कृपा करें।

दिनांक: ................
स्थान: ................
प्रार्थी/अभियुक्त द्वारा वकील (Advocate) / DLSA पैनल एडवोकेट
(हस्ताक्षर व मुहर)

10. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)

BNSS की धारा 479 के तहत 1/3 अवधि पर जमानत का हकदार कौन है?

वह व्यक्ति जो 'प्रथम अपराधी' (First-Time Offender) है, अर्थात जिसे पहले कभी किसी अपराध के लिए अदालत द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया है। यदि उसने अपने ऊपर लगे आरोप की अधिकतम निर्धारित सजा का एक-तिहाई समय विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में काट लिया है, तो वह अनिवार्य जमानत का हकदार है।

क्या 1 जुलाई 2024 से पहले जेल में बंद कैदियों को धारा 479 का लाभ मिलेगा?

हां। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2024 में अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि धारा 479 एक प्रक्रियात्मक और कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसका लाभ 1 जुलाई 2024 से पहले के सभी विचाराधीन कैदियों को पूर्वव्यापी (Retrospectively) रूप से मिलेगा।

किन अपराधों में धारा 479 के तहत जमानत नहीं मिल सकती?

मृत्युदंड (Death Penalty) और आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा वाले अपराधों में धारा 479 लागू नहीं होती। इसके अलावा यदि किसी आरोपी के खिलाफ एक से अधिक मामलों में एक साथ अलग-अलग विचारण चल रहे हों, तो भी यह स्वतः अधिकार लागू नहीं होता।

यदि जेल अधीक्षक 30 दिन में कोर्ट को रिपोर्ट न भेजे तो क्या करें?

कैदी का परिवार या निजी वकील सीधे ट्रायल कोर्ट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 479 के तहत स्वयं अर्जी दाखिल कर सकता है। कोर्ट जेल अधीक्षक से तत्काल कस्टडी सर्टिफिकेट और रिपोर्ट तलब करेगा और लापरवाही या कानूनी गलती पर जवाब मांगेगा।

यदि कैदी इतना गरीब है कि उसके पास जमानतदार (Surety) नहीं है, तो क्या वह रिहा हो सकता है?

हां। BNSS 479 के तहत न्यायालय को गरीब कैदियों को बिना किसी भारी वित्तीय जमानतदार के केवल 'व्यक्तिगत मुचलका (Bail Bond)' (Personal Bond) पर रिहा करने का अधिकार और निर्देश है। गरीबी किसी नागरिक को जेल में रखने का कारण नहीं बन सकती।

क्या धारा 479 के तहत रिहा होने के बाद मुकदमा खत्म हो जाता है?

नहीं। यह केवल विचारण (Trial) के दौरान जेल से जमानत पर रिहाई का प्रावधान है। मुकदमा अदालत में अपनी सामान्य गति से चलता रहेगा और आरोपी को तारीखों पर पेश होना होगा। यदि वह अंततः बरी हो जाता है, तो वह पूरी तरह मुक्त होगा।

निःशुल्क कानूनी सहायता (Free Legal Aid) के लिए किससे संपर्क करें?

आप संबंधित जिला अदालत परिसर में स्थित जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) के कार्यालय में जा सकते हैं या राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के राष्ट्रीय टोल-फ्री नंबर 15100 पर संपर्क कर सकते हैं। जेल के भीतर भी कानूनी सहायता (लीगल एड) क्लीनिक में आवेदन दिया जा सकता है।

यदि किसी अपराध में अधिकतम सजा 7 साल है, तो 1/3 अवधि कितनी होगी?

7 साल (84 महीने) का एक-तिहाई भाग 28 महीने (लगभग 2 वर्ष 4 माह) होता है। यदि प्रथम अपराधी 28 महीने तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रह चुका है, तो वह धारा 479 के तहत अनिवार्य जमानत का पात्र हो जाता है।

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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q. BNSS की धारा 479 के तहत 1/3 अवधि पर जमानत का हकदार कौन है?

A. वह व्यक्ति जो 'प्रथम अपराधी' (First-Time Offender) है, अर्थात जिसे पहले कभी किसी अपराध के लिए अदालत द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया है। यदि उसने अपने ऊपर लगे आरोप की अधिकतम निर्धारित सजा का एक-तिहाई समय विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में काट लिया है, तो वह अनिवार्य जमानत का हकदार है।

Q. क्या 1 जुलाई 2024 से पहले जेल में बंद कैदियों को धारा 479 का लाभ मिलेगा?

A. हां। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2024 में अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि धारा 479 एक प्रक्रियात्मक और कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसका लाभ 1 जुलाई 2024 से पहले के सभी विचाराधीन कैदियों को पूर्वव्यापी (Retrospectively) रूप से मिलेगा।

Q. किन अपराधों में धारा 479 के तहत जमानत नहीं मिल सकती?

A. मृत्युदंड (Death Penalty) और आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा वाले अपराधों में धारा 479 लागू नहीं होती। इसके अलावा यदि किसी आरोपी के खिलाफ एक से अधिक मामलों में एक साथ अलग-अलग विचारण चल रहे हों, तो भी यह स्वतः अधिकार लागू नहीं होता।

Q. यदि जेल अधीक्षक 30 दिन में कोर्ट को रिपोर्ट न भेजे तो क्या करें?

A. कैदी का परिवार या निजी वकील सीधे ट्रायल कोर्ट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 479 के तहत स्वयं अर्जी दाखिल कर सकता है। कोर्ट जेल अधीक्षक से तत्काल कस्टडी सर्टिफिकेट और रिपोर्ट तलब करेगा और लापरवाही या कानूनी गलती पर जवाब मांगेगा।

Q. यदि कैदी इतना गरीब है कि उसके पास जमानतदार (Surety) नहीं है, तो क्या वह रिहा हो सकता है?

A. हां। BNSS 479 के तहत न्यायालय को गरीब कैदियों को बिना किसी भारी वित्तीय जमानतदार के केवल 'व्यक्तिगत मुचलका (Bail Bond)' (Personal Bond) पर रिहा करने का अधिकार और निर्देश है। गरीबी किसी नागरिक को जेल में रखने का कारण नहीं बन सकती।

Q. क्या धारा 479 के तहत रिहा होने के बाद मुकदमा खत्म हो जाता है?

A. नहीं। यह केवल विचारण (Trial) के दौरान जेल से जमानत पर रिहाई का प्रावधान है। मुकदमा अदालत में अपनी सामान्य गति से चलता रहेगा और आरोपी को तारीखों पर पेश होना होगा। यदि वह अंततः बरी हो जाता है, तो वह पूरी तरह मुक्त होगा।

Q. निःशुल्क कानूनी सहायता (Free Legal Aid) के लिए किससे संपर्क करें?

A. आप संबंधित जिला अदालत परिसर में स्थित जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) के कार्यालय में जा सकते हैं या राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के राष्ट्रीय टोल-फ्री नंबर 15100 पर संपर्क कर सकते हैं। जेल के भीतर भी कानूनी सहायता (लीगल एड) क्लीनिक में आवेदन दिया जा सकता है।

Q. यदि किसी अपराध में अधिकतम सजा 7 साल है, तो 1/3 अवधि कितनी होगी?

A. 7 साल (84 महीने) का एक-तिहाई भाग 28 महीने (लगभग 2 वर्ष 4 माह) होता है। यदि प्रथम अपराधी 28 महीने तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रह चुका है, तो वह धारा 479 के तहत अनिवार्य जमानत का पात्र हो जाता है।

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