⚡ त्वरित कानूनी सारांश (Quick Legal Takeaway)
भारत की निचली अदालतों में लंबित 3.5 करोड़ मुकदमों में से 35 लाख से अधिक मामले अकेले चेक बाउंस (Section 138 NI Act) के हैं। चेक बाउंस का लीगल नोटिस आते ही लोग जेल जाने के डर से घबरा जाते हैं। सच यह है कि धारा 138 एक अर्ध-दीवानी और अर्ध-आपराधिक (Quasi-Criminal) प्रकृति का अपराध है, जिसका मुख्य उद्देश्य पैसे की वसूली है, न कि जेल भेजना। नोटिस मिलने के 15 दिनों के भीतर एक सशक्त और तथ्यों पर आधारित कानूनी जवाब भेजना बचाव की सबसे मजबूत ढाल है। इसके अलावा नेशनल लोक अदालत में बिना किसी सजा या जुर्माने के आसान किस्तों में समझौता करके केस हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।
विषय सूची (Table of Contents)
- 1. धारा 138 NI Act क्या है और चेक बाउंस अपराध कब बनता है?
- 2. सख्त कानूनी समय-सीमाएं: 30 दिन का बैंक मेमो, 15 दिन का नोटिस और 30 दिन की शिकायत
- 3. चेक बाउंस नोटिस के खिलाफ मजबूत कानूनी बचाव: सुरक्षा चेक व अवैध देनदारी
- 4. 15 दिनों के भीतर कानूनी जवाब (Notice Reply) तैयार करने की सटीक रणनीति
- 5. राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat) में समझौता: 100% कोर्ट फीस रिफंड नियम
- 6. दामोदर एस. प्रभु जजमेंट: किस चरण पर समझौते में कितनी कोर्ट पेनल्टी लगती है?
- 7. कोर्ट समन व बेलेबल वारंट आने पर क्या करें: आत्मसमर्पण व जमानत प्रक्रिया
- 8. चेक बाउंस विवाद के विभिन्न चरणों की तुलना सारणी (5-कॉलम)
- 9. झूठे चेक बाउंस लीगल नोटिस का आधिकारिक कानूनी जवाब प्रारूप
- 10. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)
- 11. आधिकारिक सरकारी पोर्टल व क्लस्टर गाइड्स
1. धारा 138 NI Act क्या है और चेक बाउंस अपराध कब बनता है?
व्यापारिक और व्यक्तिगत लेन-देन में चेक की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए संसद ने वर्ष 1988 में परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 में संशोधन करके अध्याय XVII और धारा 138 को जोड़ा था।
धारा 138 के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को किसी कानूनी रूप से वैध कर्ज या देनदारी (Legally Enforceable Debt) (Legally Enforceable Debt or Liability) के भुगतान के लिए चेक जारी करता है, और वह चेक बैंक द्वारा निम्नलिखित दो मुख्य कारणों से बिना भुगतान वापस (Dishonor) कर दिया जाता है:
- खाते में अपर्याप्त राशि (Funds Insufficient), अथवा
- बैंक से तय सीमा से अधिक राशि का चेक होना (Exceeds Arrangement)
तो ऐसा चेक बाउंस होना धारा 138 के तहत एक दंडनीय अपराध बन जाता है। इस अपराध में कानूनन अधिकतम 2 वर्ष तक का कारावास अथवा चेक राशि का दोगुना तक जुर्माना (Double the Cheque Amount) अथवा दोनों की सजा हो सकती है।
परंतु यह याद रखना आवश्यक है कि केवल चेक के बाउंस होने से अपराध नहीं बनता। अपराध तब बनता है जब बैंक से चेक बाउंस होने के बाद कानूनी मांग नोटिस भेजा जाए और 15 दिनों तक भुगतान न किया जाए।
2. सख्त कानूनी समय-सीमाएं: 30 दिन का बैंक मेमो, 15 दिन का नोटिस और 30 दिन की शिकायत
धारा 138 के मुकदमों में समय की पाबंदी (Limitation Period) सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यदि शिकायतकर्ता ने एक दिन की भी देरी कर दी, तो उसका मुकदमा तकनीकी आधार पर खारिज हो सकता है। यह '30-15-30' का स्वर्णिम नियम निम्नलिखित है:
नियम 1: बैंक रिटर्न मेमो की तारीख से 30 दिन
चेक जारी होने की तारीख से 3 महीने के भीतर बैंक में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। जब बैंक चेक को बाउंस (Dishonored) (Bounce) करता है, तो वह एक 'बैंक रिटर्न मेमो' (Bank Return Memo) जारी करता है। शिकायतकर्ता को बैंक मेमो प्राप्त होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर चेक जारीकर्ता को पंजीकृत डाक (Speed Post / Regd AD) या कानूनी माध्यम से लिखित मांग नोटिस (Demand Notice) भेजना अनिवार्य है।
नियम 2: नोटिस प्राप्ति के बाद 15 दिनों का भुगतान समय
जब चेक जारीकर्ता को वह नोटिस प्राप्त होता है (या जब स्पीड पोस्ट ट्रैकिंग रिपोर्ट दर्शाती है कि नोटिस डिलीवर हो गया), तो उस तारीख से उसे 15 दिनों का समय दिया जाता है ताकि वह चेक की राशि का भुगतान कर सके या कानूनी जवाब दे सके। इन 15 दिनों के दौरान शिकायतकर्ता कोई कोर्ट केस दाखिल नहीं कर सकता।
नियम 3: 15 दिन पूरे होने के बाद 30 दिनों में कोर्ट परिवाद
यदि 15 दिन पूरे होने तक चेक जारीकर्ता भुगतान करने में विफल रहता है, तो 16वें दिन 'कार्रवाई का कारण' (Cause of Action) उत्पन्न होता है। इसके बाद शिकायतकर्ता को अगले 30 दिनों के भीतर संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMIC / Metropolitan Magistrate) के समक्ष धारा 138 सहपठित धारा 142 के तहत लिखित आपराधिक परिवाद (Criminal Complaint) दायर करना अनिवार्य होता है।
3. चेक बाउंस नोटिस के खिलाफ मजबूत कानूनी बचाव: सुरक्षा चेक व अवैध देनदारी
यदि आपको किसी व्यक्ति या बैंक/फाइनेंस कंपनी से चेक बाउंस का लीगल नोटिस मिला है, तो बिना तथ्य जाने घबराने की आवश्यकता नहीं है। धारा 138 के तहत आरोपी के पास निम्नलिखित 5 मजबूत कानूनी बचाव होते हैं:
1. कोई कानूनी रूप से वैध कानूनी कर्ज न होना (No Legally Enforceable Debt)
धारा 138 केवल तब लागू होती है जब चेक किसी वैध कर्ज या देनदारी के लिए दिया गया हो। यदि चेक किसी जुए, अवैध सट्टेबाजी, बिना लिखा-पढ़ी के दिए गए काले धन, या बिना किसी वस्तु/सेवा की आपूर्ति के जबरन लिया गया था, तो वह 'वैध ऋण' नहीं माना जाएगा।
2. सुरक्षा चेक का दुरुपयोग (Misuse of Security Cheque)
व्यवसाय में, लोन लेते समय या फ्लैट किराए पर लेते समय लोग अक्सर बिना तारीख भरे खाली साइन किया हुआ चेक (Blank Signed Cheque) सुरक्षा (Security) के तौर पर देते हैं। यदि ऋण चुकता हो चुका है या कोई वास्तविक बकाया नहीं था, फिर भी सामने वाले व्यक्ति ने दुर्भावनापूर्ण ढंग से मनगढ़ंत राशि भरकर चेक बैंक में लगा दिया, तो सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अनुसार यह सुरक्षा चेक का दुरुपयोग है और धारा 138 में दंडनीय नहीं होगा।
3. हस्ताक्षर में हेरफेर या जाली चेक (Signature Dispute / Forgery)
यदि चेक पर आपके मूल हस्ताक्षर नहीं हैं, या चेक की राशि/तारीख में बिना आपकी सहमति के ओवरराइटिंग (Overwriting) की गई है, तो आप बैंक के हस्ताक्षर मिलान और फॉरेंसिक हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की जांच की मांग कर सकते हैं।
4. धारा 139 की उपधारणा का खंडन (Rebuttal of Presumption)
कानून यह मानकर चलता है (Presumption) कि चेक किसी कर्ज के बदले दिया गया था। परंतु आरोपी को यह साबित करने के लिए 'संदेह से परे' सबूत नहीं देना होता, बल्कि केवल 'संभावनाओं की प्रबलता' (Preponderance of Probabilities) के आधार पर अदालत को यह दिखाना होता है कि शिकायतकर्ता के पास उतनी नकदी देने की वित्तीय क्षमता (Financial Capacity) ही नहीं थी।
5. स्टॉप पेमेंट के वैध आधार (Valid Stop Payment Instructions)
यदि आपने बैंक को चेक का भुगतान रोकने (Stop Payment) का निर्देश इसलिए दिया था क्योंकि चेक खो गया था या सामने वाले पक्ष ने अनुबंध के तहत माल की आपूर्ति नहीं की थी, और आपने इस आशय का पत्र बैंक और शिकायतकर्ता को पहले ही भेज दिया था, तो यह एक मजबूत बचाव बनता है।
4. 15 दिनों के भीतर कानूनी जवाब (Notice Reply) तैयार करने की सटीक रणनीति
अनेक लोग यह भारी गलती करते हैं कि लीगल नोटिस आने पर उसे अनदेखा कर देते हैं या कूड़ेदान में फेंक देते हैं। याद रखें, यदि आपने नोटिस का जवाब नहीं दिया, तो अदालत में शिकायतकर्ता यह दलील देगा कि आरोपी के पास कहने को कुछ नहीं था, इसलिए उसने नोटिस स्वीकार कर लिया।
15 दिनों के भीतर अपने वकील के माध्यम से एक बिंदुवार कानूनी उत्तर (Rebuttal Reply) भेजना चाहिए, जिसमें:
- नोटिस में लगाए गए सभी झूठे आरोपों का स्पष्ट और दृढ़तापूर्वक खंडन किया गया हो।
- यह स्पष्ट लिखा गया हो कि चेक किन परिस्थितियों में (जैसे सुरक्षा गारंटी के रूप में) दिया गया था।
- शिकायतकर्ता से मूल हिसाब-किताब, लेजर अकाउंट और आयकर रिटर्न (ITR) का ब्योरा मांगा गया हो।
- नोटिस भेजने वाले को चेतावनी दी गई हो कि यदि उसने झूठा मुकदमा किया तो उसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 227/228 (झूठे साक्ष्य गढ़ना) और मानहानि का मुकदमा किया जाएगा।
5. राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat) में समझौता: 100% कोर्ट फीस रिफंड नियम
यदि चेक वास्तव में किसी व्यापारिक लेन-देन का है और आप विवाद को कोर्ट-कचहरी के चक्कर में वर्षों तक खींचने के बजाय सम्मानजनक ढंग से निपटाना चाहते हैं, तो राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat) सबसे सुरक्षित और किफायती मंच है।
लोक अदालत के असाधारण लाभ:
- 100% कोर्ट फीस वापसी: कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 की धारा 21 के अनुसार, यदि कोई मामला लोक अदालत में सुलझ जाता है, तो शिकायतकर्ता द्वारा अदालत में जमा की गई संपूर्ण कोर्ट फीस सरकारी खजाने से 100% रिफंड (वापस) कर दी जाती है।
- कोई सजा या आपराधिक रिकॉर्ड नहीं: धारा 147 NI Act के तहत चेक बाउंस का अपराध पूरी तरह समझौते योग्य (राजीनामा) (Compoundable) है। लोक अदालत का फैसला सिविल डिक्री के समान अंतिम होता है। आरोपी पर कोई दोषसिद्धि या पुलिस रिकॉर्ड दर्ज नहीं होता।
- आसान किस्तों (EMI) में भुगतान: लोक अदालत में दोनों पक्ष बैठकर आपसी सहमति से 3 से 12 महीने की आसान मासिक किस्तों में भुगतान का समझौता कर सकते हैं।
- अपील का कोई प्रावधान नहीं: लोक अदालत के आदेश के खिलाफ कोई भी पक्ष किसी ऊपरी अदालत में अपील नहीं कर सकता, जिससे मुकदमा उसी दिन हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
6. दामोदर एस. प्रभु जजमेंट: किस चरण पर समझौते में कितनी कोर्ट पेनल्टी लगती है?
सर्वोच्च न्यायालय ने 'दामोदर एस. प्रभु बनाम सैयद बाबालल एच. (2010 5 SCC 663)' में चेक बाउंस मामलों में समझौते को प्रोत्साहित करने के लिए एक राष्ट्रीय स्लैब प्रणाली तय की है:
- ट्रायल कोर्ट में प्रारंभिक स्तर पर समझौता: यदि अभियुक्त समन मिलने के बाद या ट्रायल के शुरुआती चरण में समझौता कर लेता है, तो कानूनी सेवा प्राधिकरण को कोई अतिरिक्त जुर्माना (Zero Penalty) नहीं देना होता।
- सत्र न्यायालय (Sessions Court) में अपील के दौरान: यदि ट्रायल कोर्ट द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद सत्र अदालत में अपील के दौरान समझौता होता है, तो चेक राशि का 10% भाग DLSA कोष में जमा करना पड़ता है।
- उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में: यदि मामला हाईकोर्ट में जाने के बाद सुलझाया जाता है, तो चेक राशि का 15% जुर्माना लगाया जाता है।
अतः कानूनी दृष्टि से यह सबसे बुद्धिमानी भरा निर्णय है कि विवाद को प्रारंभिक स्तर पर या लोक अदालत में ही सुलझा लिया जाए।
7. कोर्ट समन व बेलेबल वारंट आने पर क्या करें: आत्मसमर्पण व जमानत प्रक्रिया
यदि शिकायतकर्ता ने कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया है और आपके पते पर अदालत का समन या जमानती वारंट (Bailable Warrant) आया है, तो कभी भी फरार न हों। प्रक्रिया अत्यंत सरल है:
- समन की तारीख पर कोर्ट में उपस्थित हों: अपने वकील के साथ निर्धारित तारीख पर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश हों।
- जमानत आवेदन (Bail Application) प्रस्तुत करें: धारा 138 एक जमानती अपराध है। अदालत में धारा 480 BNSS (पूर्ववर्ती CrPC 436) के तहत एक साधारण जमानत प्रार्थना पत्र और एक स्थानीय जमानतदार (Surety) या व्यक्तिगत मुचलका (Bail Bond) पेश करें। मजिस्ट्रेट उसी समय जमानत स्वीकार कर लेते हैं।
- मध्यस्थता (Mediation) का अनुरोध करें: जमानत मिलने के तुरंत बाद आप जज साहब से कह सकते हैं कि आप मामले को कोर्ट के 'मीडिएशन सेंटर' (Mediation Centre) में भेजना चाहते हैं। अदालत तुरंत फाइल को मध्यस्थता केंद्र भेज देगी जहां कोई अतिरिक्त खर्चा किए बिना समझौता हो सकता है।
8. चेक बाउंस विवाद के विभिन्न चरणों की तुलना सारणी (5-कॉलम)
| कार्रवाई का चरण | कानूनी समय-सीमा (Limitation Period) (Limitation) | चेक जारीकर्ता (Drawer) का कानूनी जिम्मेदारी | शिकायतकर्ता (Payee) का कानूनी अधिकार | नागरिक परिणाम व वित्तीय प्रभाव |
|---|---|---|---|---|
| बैंक रिटर्न मेमो जारी होना | चेक की 3 माह की वैधता के भीतर प्रस्तुति। | खाते में पर्याप्त बैलेंस रखना या चेक स्टॉप का कारण बताना। | बैंक से मूल चेक व बैंक बाउंस मेमो (Memo) प्राप्त करना। | सिविल दायित्व जारी रहता है; अभी कोई आपराधिक केस नहीं। |
| लीगल डिमांड नोटिस भेजना | बैंक मेमो की तारीख से सख्त 30 दिन। | नोटिस मिलने के 15 दिनों में भुगतान करना या कानूनी जवाब देना। | स्पीड पोस्ट व ईमेल से पूर्ण चेक राशि की लिखित मांग। | यदि 30 दिन में नोटिस न भेजा जाए, तो केस हमेशा के लिए समाप्त। |
| 15-दिवसीय नोटिस अवधि | नोटिस प्राप्ति की तारीख से 15 दिन। | सशक्त कानूनी उत्तर (Rebuttal Reply) भेजना व तथ्य रखना। | 15 दिन तक कोर्ट में जाने पर पूर्ण कानूनी रोक (No Premature Suit). | शांतिपूर्ण समाधान व लेन-देन सुलझाने का सबसे सुरक्षित मौका। |
| मजिस्ट्रेट कोर्ट में परिवाद | 15 दिन बीतने के बाद अगले 30 दिन। | समन आने पर कोर्ट में पेश होकर जमानत लेना व सुरक्षा चेक सिद्ध करना। | धारा 143A के तहत 20% तक अंतरिम मुआवजा मांगने का अधिकार। | आपराधिक मुकदमा शुरू; अधिकतम 2 साल जेल व दोगुना जुर्माने का जोखिम। |
| राष्ट्रीय लोक अदालत में राजीनामा | मुकदमे के किसी भी स्तर पर (वर्ष में 4 बार आयोजित)। | आपसी सहमति से किस्तों में भुगतान व केस का पूर्ण खात्मा। | 100% कोर्ट फीस वापस व तय समय में सुनिश्चित राशि वसूली। | बिना किसी आपराधिक दाग या जेल के मुकदमे का स्थाई अंत। |
9. झूठे चेक बाउंस लीगल नोटिस का आधिकारिक कानूनी जवाब प्रारूप
यदि आपको किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा अनुचित चेक बाउंस नोटिस भेजा गया है, तो आपके वकील द्वारा निम्नलिखित कानूनी ड्राफ्ट में उत्तर प्रेषित किया जाना चाहिए:
सेवा में,
श्रीमान .................... (वकील (Advocate), नोटिस प्रेषक)
पता: .................... जिला: ....................
संदर्भ: आपके द्वारा आपके मुवक्किल श्री .................... की ओर से मेरे मुवक्किल श्री .................... को प्रेषित लीगल नोटिस दिनांक ................ बाबत चेक संख्या ................ राशि ₹................
महोदय,
अपने मुवक्किल श्री .................... पुत्र श्री .................... निवासी .................... के निर्देशानुसार मैं आपके उक्त कानूनी नोटिस का बिंदुवार उत्तर निम्नलिखित प्रस्तुत करता हूं:
1. यह कि आपके नोटिस में उल्लिखित समस्त तथ्य, कथन एवं आरोप मनगढ़ंत, झूठे, भ्रामक एवं दुर्भावनापूर्ण हैं तथा मेरे मुवक्किल द्वारा सिरे से अस्वीकार किए जाते हैं।
2. यह कि मेरे मुवक्किल पर आपके मुवक्किल का किसी भी प्रकार का कोई 'कानूनी रूप से वैध कर्ज या देनदारी (Legally Enforceable Debt)' (Legally Enforceable Debt) बकाया नहीं है। आपके मुवक्किल ने चेक के बाउंस होने का झूठा आधार बनाकर मेरे मुवक्किल को प्रताड़ित करने का कुत्सित प्रयास किया है।
3. यह कि वास्तविक तथ्य यह है कि वर्ष ................ में व्यावसायिक सुरक्षा (Security Purpose) के निमित्त मेरे मुवक्किल ने उक्त चेक संख्या ................ एक बिना तारीख भरा हुआ खाली साइन किया हुआ चेक (Blank Security Cheque) आपके मुवक्किल को सौंपा था / दिया था। उक्त व्यवसाय का पूर्ण हिसाब-किताब चुकता हो जाने के उपरांत भी आपके मुवक्किल ने दुर्भावनापूर्वक वह चेक वापस नहीं किया।
4. यह कि आपके मुवक्किल ने सुरक्षा चेक में मनमानी राशि भरकर बैंक में प्रस्तुत किया है, जो परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 की धारा 138 के दायरे में नहीं आता तथा आपराधिक विश्वासघात की श्रेणी में आता है।
5. यह कि यदि आपके मुवक्किल उक्त अनाधिकृत चेक के आधार पर कोई भी न्यायालयीय परिवाद दायर करने का दुस्साहस करते हैं, तो मेरा मुवक्किल भारतीय न्याय संहिता 2023 की सुसंगत धाराओं तथा दीवानी मानहानि का मुकदमा आपके मुवक्किल के संपूर्ण हर्जे-खर्चे पर दायर करने हेतु बाध्य होगा।
अतः आपसे अनुरोध है कि अपने मुवक्किल को सलाह दें कि वह उक्त अवैध नोटिस को तत्काल वापस लें और मेरे मुवक्किल का सुरक्षा चेक बिना शर्त वापस लौटाएं।
दिनांक: ................
स्थान: ................
मुवक्किल के निर्देशानुसार,
(वकील के हस्ताक्षर व चैंबर पता)
10. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs)
चेक बाउंस होने के कितने दिन बाद लीगल नोटिस भेजना अनिवार्य है?
बैंक से 'चेक रिटर्न मेमो' मिलने की तारीख से ठीक 30 दिनों के भीतर कानूनी नोटिस भेजना अनिवार्य है। यदि 30 दिन की समय-सीमा बीत जाती है, तो धारा 138 के तहत आपराधिक मुकदमा दायर करने का अधिकार समाप्त हो जाता है।
क्या चेक बाउंस होने पर सीधे पुलिस आकर गिरफ्तार कर सकती है?
बिल्कुल नहीं। चेक बाउंस एक गैर-संज्ञेय (Non-Cognizable) अपराध है। पुलिस इसमें सीधे कोई एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती और न ही किसी को गिरफ्तार कर सकती है। शिकायतकर्ता को सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में परिवाद दाखिल करना होता है।
चेक बाउंस का लीगल नोटिस आने पर भुगतान के लिए कितना समय मिलता है?
नोटिस मिलने की तारीख से ठीक 15 दिनों का समय मिलता है। इन 15 दिनों के भीतर चेक जारीकर्ता या तो बकाया राशि का भुगतान कर सकता है या अपने वकील के जरिए लिखित कानूनी जवाब भेज सकता है।
यदि चेक केवल 'सिक्योरिटी' के तौर पर दिया गया था तो क्या सजा होगी?
यदि आप अदालत में यह साबित कर देते हैं कि चेक केवल सुरक्षा (Guarantee) के रूप में दिया गया था और उस तारीख को कोई वास्तविक कानूनी देनदारी नहीं थी, तो धारा 138 के तहत कोई अपराध नहीं बनता और अदालत आरोपी को बरी कर देती है।
नेशनल लोक अदालत में चेक बाउंस केस सुलझाने पर क्या कोर्ट फीस वापस मिलती है?
हां। कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 की धारा 21 के तहत यदि चेक बाउंस का मुकदमा लोक अदालत में आपसी राजीनामे से समाप्त होता है, तो शिकायतकर्ता द्वारा जमा की गई संपूर्ण कोर्ट फीस 100% वापस कर दी जाती है।
क्या चेक बाउंस मामले में आरोपी को जेल जाना ही पड़ता है?
नहीं। धारा 138 एक जमानती अपराध है। कोर्ट समन मिलने पर पेश होने पर तुरंत जमानत मिल जाती है। इसके अलावा मुकदमे के किसी भी स्तर पर दोनों पक्ष आपस में समझौता (Compounding) करके केस को बिना किसी सजा के समाप्त कर सकते हैं।
धारा 143A के तहत 20% अंतरिम मुआवजा क्या होता है?
वर्ष 2018 के संशोधन के अनुसार, न्यायालय ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता के आवेदन पर आरोपी को चेक राशि का अधिकतम 20% तक अंतरिम मुआवजा जमा करने का आदेश दे सकता है। हालांकि यदि आरोपी अंततः मुकदमा जीत जाता है, तो शिकायतकर्ता को वह राशि ब्याज सहित वापस लौटानी होती है।
यदि चेक बाउंस का नोटिस जानबूझकर न लिया जाए (Refusal to Accept) तो क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अनुसार, यदि सही पते पर भेजा गया रजिस्टर्ड नोटिस लेने से मना कर दिया जाता है (Unclaimed / Refused), तो कानूनन यह मान लिया जाता है कि नोटिस वैध रूप से नोटिस डिलीवर होना (Deemed Service) हो चुका है और 15 दिन बाद शिकायतकर्ता कोर्ट केस कर सकता है।
11. आधिकारिक सरकारी पोर्टल व क्लस्टर गाइड्स
- राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) - राष्ट्रीय लोक अदालत पोर्टल
- ई-कोर्ट्स (eCourts) सर्विसेज - चेक बाउंस केस स्टेटस ट्रैकर
- 7 साल से कम सजा में धारा 35 नोटिस व गिरफ्तारी नियम (BNSS 35)
- प्रथम बार विचाराधीन कैदियों की 1/3 अवधि पर अनिवार्य जमानत नियम (BNSS 479)
- झूठी एफआईआर रद्द कराने हेतु हाईकोर्ट में याचिका (BNSS 528)