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जमीन का कानूनी बंटवारा (Partition Suit) कैसे करें? धारा 116 राजस्व संहिता, कुर्राबंदी व अलग खतौनी बनवाने के नियम

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राजीव रंजन शर्मा
वरिष्ठ राजस्व व कानूनी सलाहकार

GoForDigitalIndia संपादकीय टीम — सरकारी योजनाओं, भर्ती व तकनीकी विषयों के विश्लेषक।

⚡ त्वरित उत्तर (Quick Answer)

यदि सह-खातेदार या भाई आपस में सहमति से जमीन नहीं बांट रहे हैं, तो उत्तर प्रदेश/बिहार राजस्व संहिता की धारा 116 के तहत उपजिलाधिकारी (SDM) कोर्ट में बंटवारे का मुकदमा (Partition Suit) दायर किया जा सकता है। कोर्ट पहले हिस्से तय करती है (प्रारंभिक डिक्री), फिर लेखपाल द्वारा सड़क व उर्वरता के अनुसार अलग-अलग हिस्से (कुर्राबंदी) कराकर अंतिम डिक्री पारित कर सभी की अलग खतौनी जारी करती है।

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1. जमीन बंटवारा: काम की मुख्य बात (AEO Direct Answer)

यदि संयुक्त खाते की जमीन में हिस्सेदार आपस में लड़ रहे हों या कोई एक भाई सड़क किनारे की कीमती जमीन पर कब्जा जमाए बैठा हो, तो कानूनन उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 116 (या संबंधित राज्य के भू-राजस्व कानून) के तहत उपजिलाधिकारी (SDM) कोर्ट में विभाजन वाद (Partition Suit) दायर करना सबसे ठोस कानूनी रास्ता है। इसमें कोर्ट पहले सभी का हिस्सा (1/2, 1/3, 1/4) तय करती है, फिर लेखपाल से मौके का पैमाइश नक्शा (कुर्राबंदी) बनवाकर हर भाई को अलग रकबा, चौहद्दी और अलग खतौनी आवंटित करती है।

2. आपसी सहमति (रजिस्टर्ड बंटवारा) vs अदालती बंटवारा (धारा 116)

जमीन बांटने के मुख्य रूप से दो ही कानूनी तरीके होते हैं:

तुलना का आधार आपसी सहमति से पारिवारिक बंटवारा (Family Settlement) अदालती बंटवारा (धारा 116 Partition Suit)
सहमति की आवश्यकता सभी जीवित हिस्सेदारों व बहनों की 100% लिखित सहमति अनिवार्य। यदि केवल एक भाई भी तैयार हो, तो बाकी की असहमति पर कोर्ट फैसला करेगी।
कहाँ होता है? सब-रजिस्ट्रार (तहसील निबंधन) कार्यालय में रजिस्टर्ड डीड। उपजिलाधिकारी (SDM / SDO) राजस्व न्यायालय।
खर्च व स्टांप ड्यूटी ₹500 से ₹5,000 का नाममात्र पारिवारिक स्टांप शुल्क। ₹10-₹50 का कोर्ट फीस स्टैम्प + अधिवक्ता फीस।
अंतिम परिणाम रजिस्ट्री के आधार पर सीधे खतौनी में अलग खाता नंबर दर्ज। अंतिम डिक्री (Final Decree) के बाद प्रत्येक का स्वतंत्र खाता।

3. धारा 116 राजस्व संहिता के तहत कानूनी अधिकार

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उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 116 यह स्पष्ट प्रावधान करती है कि संयुक्त जोत (Joint Holding) का कोई भी सह-खातेदार किसी भी समय अपना हिस्सा विभाजित कराने के लिए स्वतंत्र है।

  • सभी को पक्षकार बनाना अनिवार्य: मुकदमे में जमीन के सभी मौजूदा सह-खातेदारों, विवाहित/अविवाहित बहनों (यदि पिता की मृत्यु 2005 के बाद हुई हो) और ग्राम सभा/राज्य सरकार को प्रतिवादी (Opposite Party) बनाना अनिवार्य होता है।
  • एक सह-खातेदार की अर्जी भी पर्याप्त: यदि चार भाइयों में से तीन भाई बंटवारे से मना कर रहे हों, तो भी चौथा भाई अकेले दावा दायर कर सकता है। कोर्ट बाकी भाइयों को नोटिस भेजकर तलब करेगी।

4. प्रारंभिक डिक्री vs अंतिम डिक्री (दो चरणों का फैसला)

कई किसान और जमीन मालिक यह समझते हैं कि कोर्ट में तारीख पड़ते ही एक ही दिन में जमीन बंट जाती है। कानूनन बंटवारा दो चरणों में पूरा होता है:

  1. पहला चरण - प्रारंभिक डिक्री (Preliminary Decree): इसमें कोर्ट यह तय करती है कि खतौनी के अनुसार किस हिस्सेदार का कितना कानूनी अंश (Share) बनता है। उदाहरण के लिए, 4 बीघा जमीन में 2 भाइयों का 1/2-1/2 हिस्सा घोषित करना।
  2. दूसरा चरण - अंतिम डिक्री (Final Decree): अंश घोषित होने के बाद जमीन का भौतिक सीमांकन होता है। राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) मौके पर जाकर जमीन के अलग-अलग टुकड़े (कुर्रा) बनाता है। जब कोई आपत्ति नहीं रहती, तब कोर्ट अंतिम डिक्री पारित कर अमलदरामद का आदेश देती है।

5. कुर्राबंदी (Kurrabandi) क्या है और लेखपाल नक्शा कैसे बनाता है?

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कुर्राबंदी बंटवारे के मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। जब एसडीएम कोर्ट प्रारंभिक डिक्री कर देती है, तो वह तहसीलदार व राजस्व निरीक्षक को आदेश देती है कि जमीन का 'कुर्रा' (अलग-अलग लॉट) तैयार किया जाए।

  • सड़क व रास्ते की समानता: राजस्व नियमों के तहत यह सुनिश्चित किया जाता है कि यदि जमीन मुख्य पक्की सड़क या नहर पर है, तो सड़क का फ्रंट (Frontage) सभी भाइयों को उनके हिस्से के अनुपात में मिले। कोई एक भाई अकेले पूरी सड़क नहीं दबा सकता।
  • जमीन की उर्वरता (Fertility): यदि एक खेत बहुत उपजाऊ है और दूसरा बंजर या गड्ढेदार है, तो दोनों खेतों में से आनुपातिक हिस्सा दिया जाता है ताकि किसी के साथ अन्याय न हो।
  • रंगीन नक्शा (Chitha): लेखपाल नक्शे पर अलग-अलग रंगों (जैसे लाल, हरा, पीला) से हर भाई का कुर्रा चिन्हित कर चौहद्दी लिखता है।

6. बंटवारे के लिए आवश्यक दस्तावेज व कोर्ट फीस

दावा पत्र के साथ निम्नलिखित दस्तावेज लगाना अनिवार्य है:

  • संबंधित जमीन की अद्यतन प्रमाणित डिजिटल खतौनी (Certified Khatauni Copy)।
  • राजस्व शजरा नक्शा (Certified Village Map Trace)।
  • वंशवृक्ष / वंशावली (Family Tree / Pedigree), जिसे ग्राम प्रधान, पार्षद या लेखपाल द्वारा सत्यापित किया गया हो।
  • सभी पक्षकारों के आधार कार्ड व पते का प्रमाण।
  • ₹10 से ₹50 के राजस्व टिकट (Court Fee Stamp)।

7. एसडीएम कोर्ट में बंटवारा वाद दायर करने की स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया

  1. अधिवक्ता के माध्यम से वाद पत्र तैयार करना: धारा 116 के अंतर्गत विभाजन का विधिवत प्रारूप तैयार कराना जिसमें गाटा संख्या, रकबा और प्रत्येक का हिस्सा लिखा हो।
  2. राजस्व न्यायालय (vaad.up.nic.in) पर केस फाइलिंग: अहलमद द्वारा वाद पंजीकृत होकर कंप्यूटरीकृत वाद संख्या (Computerized Case Number) आवंटित होना।
  3. प्रतिवादियों को समन जारी होना: रजिस्टर्ड डाक व मुंसिफ पैरोकार के जरिए अन्य सभी भाइयों को 30 दिन का नोटिस तामील कराना।
  4. लिखित कथन (Written Statement): विपक्षी भाई अपना जवाब दाखिल करते हैं कि क्या उन्हें हिस्से पर कोई विवाद है।
  5. प्रारंभिक डिक्री पारित होना: कोर्ट द्वारा सभी के विधिक अंश तय करना।
  6. कुर्रा आख्या मंगाना: लेखपाल व कानूनगो द्वारा स्थलीय पैमाइश कर कुर्रा कोर्ट में पेश करना।
  7. आपत्ति व निस्तारण: यदि किसी को कुर्रे पर आपत्ति हो तो कोर्ट उसकी सुनवाई करती है।
  8. अंतिम डिक्री व अमलदरामद: कोर्ट अंतिम मुहर लगाकर परवाना जारी करती है और भूलेख पर सभी की अलग खतौनी बन जाती है।

8. यदि कोई भाई सड़क किनारे की जमीन अकेले दबा ले तो क्या करें?

यदि मुकदमे के दौरान कोई भाई जबरन सड़क किनारे निर्माण करने लगे या फसल बोकर कब्जा करने की कोशिश करे, तो तुरंत उसी कोर्ट में Order 39 Rule 1 & 2 CPC या राजस्व संहिता की धारा 116(2) के तहत अंतरिम स्थगन (Stay Order) का प्रार्थना पत्र दें। कोर्ट तुरंत यथास्थिति (Status Quo) का आदेश जारी कर देती है कि जब तक अंतिम कुर्रा तय न हो, कोई भी निर्माण नहीं करेगा।

9. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)

1. क्या जमीन बंटवारे के लिए सभी भाइयों की सहमति होना जरूरी है?

नहीं, यदि कोई एक भाई या सह-खातेदार भी अपना हिस्सा अलग करना चाहता है, तो वह धारा 116 के तहत एसडीएम कोर्ट में बंटवारे का वाद दायर कर सकता है। कोर्ट अन्य भाइयों की असहमति के बावजूद कानूनन हिस्सा अलग करती है।

2. जमीन के बंटवारे में कितना समय लगता है?

राजस्व संहिता के नियमों के अनुसार अविवादित बंटवारा 6 महीने में निस्तारित होना चाहिए, परंतु यदि कुर्रे या हिस्से पर आपत्ति आती है तो इसमें 1 से 2 साल का समय लग सकता है।

3. क्या पुश्तैनी जमीन का बिना कोर्ट जाए आपसी सहमति से बंटवारा वैध है?

आपसी सहमति से पारिवारिक बंटवारा (Family Settlement) मान्य है, परंतु जब तक उसे ₹100 स्टांप पर लिखकर सब-रजिस्ट्रार के यहां पंजीकृत न कराया जाए और खतौनी में अमलदरामद न हो, सरकारी रिकॉर्ड में संयुक्त नाम ही रहता है।

4. यदि किसी भाई ने सड़क किनारे की कीमती जमीन पहले ही बेच दी हो तो क्या होगा?

बंटवारा वाद में कोर्ट यह सिद्धांत लागू करती है कि कोई भी सह-खातेदार अपने हिस्से से अधिक या सर्वोत्तम हिस्सा अकेले नहीं बेच सकता। बिक चुकी जमीन विक्रेता के खाते में समायोजित की जाती है।

5. बंटवारे के मुकदमे में कोर्ट फीस कितनी लगती है?

एसडीएम राजस्व न्यायालय में धारा 116 के मुकदमे में सिविल कोर्ट की तरह जमीन के बाजार मूल्य पर फीस नहीं लगती, बल्कि ₹10 से ₹50 के नाममात्र के रेवेन्यू कोर्ट स्टैम्प लगते हैं।

10. धारा 116 के अंतर्गत बंटवारा वाद का विधिक प्रारूप (Sample Draft Format)

न्यायालय उपजिलाधिकारी (एसडीएम / परगनाधिकारी), तहसील..., जिला...

वाद संख्या: ....... / वर्ष 2026

वादी: रमेश कुमार पुत्र स्व. रामलाल, निवासी ग्राम..., परगना..., जिला...

बनाम

प्रतिवादीगण:
1. सुरेश कुमार पुत्र स्व. रामलाल (सगा भाई)
2. श्रीमती कमला देवी पुत्री स्व. रामलाल (विवाहित बहन)
3. ग्राम सभा मौजा..., द्वारा ग्राम प्रधान / राज्य उत्तर प्रदेश द्वारा कलेक्टर महोदय।

दावा अंतर्गत धारा 116 उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 बाबत विभाजन जोत।

महोदय,
वादी सविनय निवेदन करता है कि मौजा... स्थित गाटा संख्या 142 रकबा 1.200 हेक्टेयर वादी व प्रतिवादीगण सं. 1 व 2 की संयुक्त पुश्तैनी भूमिधरी है। वादी का इसमें 1/3 अंश है। प्रतिवादी सं. 1 सड़क किनारे की कीमती भूमि पर अवैध रूप से अकेला कब्जा करना चाहता है। अतः श्रीमान जी से प्रार्थना है कि विवादित भूमि में वादी का 1/3 अंश घोषित करते हुए लेखपाल से कुर्राबंदी कराकर वादी का अलग खाता (खतौनी) बनाने की कृपा करें।

11. उत्तर प्रदेश, बिहार व अन्य राज्यों में ऑनलाइन पोर्टल लिंक्स व नियम

वर्तमान समय में राजस्व मुकदमों की निगरानी पूरी तरह कम्प्यूटरीकृत हो चुकी है:

  • उत्तर प्रदेश (UP): vaad.up.nic.in (राजस्व न्यायालय कम्प्यूटरीकृत प्रबंधन प्रणाली)। यहाँ आप 16 अंकों की वाद संख्या डालकर घर बैठे अगली तारीख और आदेश की कॉपी देख सकते हैं।
  • बिहार (Bihar): biharbhumi.bihar.gov.in (राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग)।
  • मध्य प्रदेश (MP): rcms.mp.gov.in (राजस्व न्यायालय प्रबंधन प्रणाली)।
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q. क्या जमीन बंटवारे के लिए सभी भाइयों की सहमति होना जरूरी है?

A. नहीं, यदि कोई एक भाई या सह-खातेदार भी अपना हिस्सा अलग करना चाहता है, तो वह धारा 116 के तहत एसडीएम कोर्ट में बंटवारे का वाद दायर कर सकता है। कोर्ट अन्य भाइयों की असहमति के बावजूद कानूनन हिस्सा अलग करती है।

Q. जमीन के बंटवारे में कितना समय लगता है?

A. राजस्व संहिता के नियमों के अनुसार अविवादित बंटवारा 6 महीने में निस्तारित होना चाहिए, परंतु यदि कुर्रे या हिस्से पर आपत्ति आती है तो इसमें 1 से 2 साल का समय लग सकता है।

Q. क्या पुश्तैनी जमीन का बिना कोर्ट जाए आपसी सहमति से बंटवारा वैध है?

A. आपसी सहमति से पारिवारिक बंटवारा (Family Settlement) मान्य है, परंतु जब तक उसे ₹100 स्टांप पर लिखकर सब-रजिस्ट्रार के यहां पंजीकृत न कराया जाए और खतौनी में अमलदरामद न हो, सरकारी रिकॉर्ड में संयुक्त नाम ही रहता है।

Q. यदि किसी भाई ने सड़क किनारे की कीमती जमीन पहले ही बेच दी हो तो क्या होगा?

A. बंटवारा वाद में कोर्ट यह सिद्धांत लागू करती है कि कोई भी सह-खातेदार अपने हिस्से से अधिक या सर्वोत्तम हिस्सा अकेले नहीं बेच सकता। बिक चुकी जमीन विक्रेता के खाते में समायोजित की जाती है।

Q. बंटवारे के मुकदमे में कोर्ट फीस कितनी लगती है?

A. एसडीएम राजस्व न्यायालय में धारा 116 के मुकदमे में सिविल कोर्ट की तरह जमीन के बाजार मूल्य पर फीस नहीं लगती, बल्कि ₹10 से ₹50 के नाममात्र के रेवेन्यू कोर्ट स्टैम्प लगते हैं।

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