digital ⏱️ 17 मिनट पढ़ें 📅 2026-10-13 10:30:00

"डिजिटल अरेस्ट" क्या है? CBI व पुलिस का फर्जी वीडियो कॉल, 1930 गोल्डन ऑवर और चक्षु पोर्टल से शिकायत का तरीका

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राजेश कुमार वर्मा
वरिष्ठ साइबर सुरक्षा शोधकर्ता एवं डिजिटल अपराध विश्लेषक

साइबर फ्रॉड रोकथाम, गृह मंत्रालय I4C पोर्टल फ्रेमवर्क, डिजिटल फॉरेंसिक्स और बैंकिंग फ्रॉड रिकवरी पर 11 वर्षों का व्यावहारिक अनुभव।

⚡ त्वरित उत्तर (Quick Answer)

भारतीय कानून (CrPC या BNSS) में किसी भी नागरिक को WhatsApp या Skype वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' करने का कोई प्रावधान नहीं है। यदि कोई खुद को CBI, नारकोटिक्स या पुलिस अधिकारी बताकर ड्रग्स पार्सल के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने को कहे, तो तुरंत कॉल काटें और 1 घंटे के भीतर 1930 हेल्पलाइन व 'चक्षु' पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं।

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📌 मुख्य विशेषताएं व आवश्यक बिंदु

  • कानूनी हकीकत: भारत में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है; पुलिस कभी भी वीडियो कॉल पर पूछताछ या वसूली नहीं करती
  • फर्जी सेटअप का सच: साइबर अपराधी किराए के कमरों में नकली पुलिस स्टेशन, बैकड्रॉप और डीपफेक पुलिस वर्दी पहनकर डराते हैं
  • गोल्डन ऑवर (1 घंटा): पैसे ट्रांसफर होने के तुरंत बाद 1930 पर कॉल करने से म्यूल बैंक अकाउंट्स फ्रीज हो जाते हैं और पैसा वापस मिलता है
  • चक्षु (Chakshu) पोर्टल: संदिग्ध व्हाट्सएप कॉल और मैसेज आते ही तुरंत sancharsaathi.gov.in पर रिपोर्ट करने से नंबर ब्लॉक हो जाते हैं
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गृह मंत्रालय (I4C) की सार्वजनिक चेतावनी: भारत के किसी भी कानून में फोन, स्काइप या व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' करने का कोई प्रावधान नहीं है। कोई भी सरकारी जांच एजेंसी (CBI, ED, NIA, कस्टम्स या दिल्ली/मुंबई पुलिस) कभी भी वीडियो कॉल पर पैसे का वेरिफिकेशन नहीं मांगती और न ही किसी को कमरे में बंद रहने का आदेश देती है। ऐसा कॉल आते ही सीधे फोन काटें!

1. 'डिजिटल अरेस्ट' क्या है और ठग इसका जाल कैसे बिछाते हैं?

'डिजिटल अरेस्ट' एक बेहद खतरनाक मनोवैज्ञानिक साइबर फ्रॉड है, जिसमें अपराधी किसी आम नागरिक, रिटायर्ड कर्मचारी, डॉक्टर या व्यवसायी को निशाना बनाते हैं। ठग इस पूरे खेल को 4 चरणों में अंजाम देते हैं:

  • चरण 1: डराने वाला पहला फोन कॉल: पहले एक आईवीआर (कंप्यूटराइज्ड) कॉल आता है, जिसमें कहा जाता है कि "आपके आधार कार्ड से भेजा गया ताइवान/कंबोडिया का कूरियर पकड़ा गया है, जिसमें 5 फर्जी पासपोर्ट, 140 ग्राम एमडीएमए (ड्रग्स) और गैर-कानूनी सिम कार्ड मिले हैं। आपका फोन 2 घंटे में बंद हो जाएगा।"
  • चरण 2: फर्जी पुलिस अफसर से ट्रांसफर: फोन को तुरंत तथाकथित 'मुंबई क्राइम ब्रांच' या 'सीबीआई हेडक्वार्टर' में ट्रांसफर किया जाता है। सामने वाला व्यक्ति भारी आवाज में बात करता है और आपको स्काइप या व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल से जुड़ने को कहता है।
  • चरण 3: नकली पुलिस स्टेशन और कोर्ट का माहौल: वीडियो कॉल पर स्क्रीन के पीछे पुलिस का लोगो, वायरलेस सेट की आवाजें और खाकी वर्दी पहने लोग दिखाई देते हैं। वे सुप्रीम कोर्ट या आरबीआई के फर्जी लेटरहेड पर आपके नाम का 'गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट' दिखाते हैं।
  • चरण 4: डिजिटल निगरानी और वसूली: वे कहते हैं, "मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का है। आप 24 घंटे तक वीडियो कैमरा चालू रखेंगे और किसी से बात नहीं करेंगे। अपने बैंक खातों का पैसा जांच के लिए 'सरकारी सेफ कस्टडी खाते' में ट्रांसफर करें। निर्दोष पाए जाने पर 15 मिनट में पैसा वापस आ जाएगा।" डर के मारे पीड़ित अपने जीवनभर की जमा पूंजी ट्रांसफर कर देता है।

2. कानूनी हकीकत: क्या पुलिस कभी वीडियो कॉल पर अरेस्ट कर सकती है?

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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय संविधान के तहत किसी भी नागरिक के अधिकार सुरक्षित हैं। कानूनी तौर पर:

  • फिजिकल वारंट अनिवार्य: पुलिस को किसी को गिरफ्तार करने के लिए अधिकृत अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित वास्तविक कानूनी वारंट दिखाना होता है। वीडियो कॉल पर वारंट नहीं भेजा जाता।
  • वर्दी और पहचान: पुलिस अधिकारी को अपनी नेमप्लेट और पहचान पत्र दिखाना अनिवार्य है और गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है।
  • पैसे मांगने का कोई नियम नहीं: भारत का कोई भी विभाग (आरबीआई, सीबीआई या इनकम टैक्स) किसी भी जांच के लिए नागरिक के पैसे किसी 'सरकारी खाते' या अज्ञात बैंक खाते में नहीं मंगवाता। बैंक खाता फ्रीज करने का आदेश सीधे बैंक प्रबंधन को लिखित में दिया जाता है, ग्राहक से पैसे ट्रांसफर नहीं करवाए जाते।

3. 5-कॉलम तुलना तालिका: ठगों के झूठे दावे बनाम भारत का वास्तविक कानून

अपराधियों का फर्जी दावा साइबर ठगों की कार्यप्रणाली भारतीय कानून का वास्तविक नियम नागरिक का कानूनी अधिकार तुरंत करने योग्य कार्रवाई
"आपको डिजिटल अरेस्ट किया गया है" स्काइप पर 24 घंटे कैमरा ऑन रखने और कमरे में कैद रहने का दबाव भारतीय कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसा कोई शब्द अस्तित्व में नहीं है कॉल तुरंत काटने और किसी भी समय ऑफलाइन होने का पूरा अधिकार बिना डरे तुरंत लाल बटन दबाकर कॉल डिस्कनेक्ट करें
"आपके नाम से ड्रग्स पार्सल पकड़ा गया है" फेडएक्स/डीएचएल कूरियर कंपनी का कर्मचारी बनकर धमकाना कूरियर में अवैध सामान मिलने पर कस्टम्स विधिवत लिखित समन भेजती है कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट से ट्रैकिंग नंबर की स्वतंत्र जांच का अधिकार सीधे नजदीकी थाने में जाकर लिखित सूचना दें
"आरबीआई खाते में पैसा ट्रांसफर करें" जांच के नाम पर बचत और एफडी तोड़कर पैसे ट्रांसफर करवाना आरबीआई किसी भी व्यक्तिगत जांच के लिए पैसे डिपॉजिट नहीं करवाता अपनी मेहनत की कमाई को किसी अज्ञात खाते में न भेजने का अधिकार 1 रुपया भी ट्रांसफर न करें, तुरंत बैंक ऐप लॉक करें
"मामला सीक्रेट है, परिवार को न बताएं" पीड़ित को अकेला करना ताकि वह किसी समझदार व्यक्ति से सलाह न ले सके गिरफ्तारी के समय परिजन और वकील को सूचित करना कानूनी अधिकार है अनुच्छेद 22(1): अपनी पसंद के वकील से परामर्श लेने का मौलिक अधिकार तुरंत परिवार के सदस्यों और दोस्तों को कॉल करके बात बताएं
"सुप्रीम कोर्ट का अरेस्ट वारंट भेजा है" व्हाट्सएप पर फर्जी मुहर और लोगो वाला पीडीएफ भेजना अदालती आदेश केवल पंजीकृत डाक या पुलिस प्रक्रिया से सर्व होते हैं फर्जी दस्तावेजों को चुनौती देने और रिपोर्ट करने का अधिकार राष्ट्रीय साइबर पोर्टल cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें

4. यदि आप फंस जाएं तो तुरंत क्या करें? 'Stop, Think, Act' फॉर्मूला

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माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 'मन की बात' में सुझाए गए तीन-चरणीय फॉर्मूले का सख्ती से पालन करें:

  1. रुकें (Stop): जैसे ही कोई वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी की बात करे, एक सेकंड भी न सोचें। कॉल सीधे काट दें। स्क्रीन पर वर्दी देखकर बिल्कुल घबराएं नहीं—यह 100% फर्जी है।
  2. सोचें (Think): शांत दिमाग से विचार करें: क्या आपने कोई पार्सल भेजा था? क्या कोई जांच एजेंसी बिना आपके पास आए फोन पर अरेस्ट कर सकती है? क्या किसी सरकारी खाते में पैसे ट्रांसफर करने का कोई नियम है? जवाब है 'नहीं'।
  3. कार्रवाई करें (Action): तुरंत अपने परिवार को सूचित करें और बिना देरी किए नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें।

5. 1930 हेल्पलाइन और चक्षु पोर्टल पर रिपोर्टिंग के 5 अनिवार्य स्टेप्स

  1. स्टेप 1: 'गोल्डन ऑवर' (पहले 60 मिनट) में 1930 डायल करें: यदि डर के मारे आपने पैसे ट्रांसफर कर दिए हैं, तो पहले 1 घंटे के भीतर 1930 पर कॉल करें। बैंक का नाम, ट्रांजैक्शन आईडी (UTR) और ट्रांसफर की गई राशि बताएं। गृह मंत्रालय का ऑटोमेटेड सिस्टम तुरंत उस म्यूल बैंक खाते को फ्रीज कर देता है, जिससे ठग पैसे एटीएम से नहीं निकाल पाते।
  2. स्टेप 2: चक्षु (Chakshu) पोर्टल पर नंबर रिपोर्ट करें: दूरसंचार विभाग के sancharsaathi.gov.in पोर्टल पर जाएं और 'Chakshu' विकल्प चुनें। जिस नंबर से धमकी भरा कॉल या व्हाट्सएप मैसेज आया था, उसका स्क्रीनशॉट और नंबर दर्ज करें। दूरसंचार विभाग उस मोबाइल नंबर और उसके हैंडसेट आईएमईआई (IMEI) को पूरे देश में ब्लॉक कर देता है।
  3. स्टेप 3: नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर एफआईआर दर्ज करें: cybercrime.gov.in पर जाएं। 'Report Financial Fraud' पर क्लिक करें। कॉल रिकॉर्डिंग, व्हाट्सएप चैट और बैंक ट्रांसफर की रसीद अपलोड करके डिजिटल कंप्लेंट दर्ज करें। इसकी पावती (Acknowledgement Receipt) अपने पास रखें।
  4. स्टेप 4: अपने बैंक की शाखा में लिखित आपत्ति दें: अपनी बैंक शाखा में तुरंत जाएं और 'Cyber Fraud Intimation Letter' जमा करें। यदि धोखाधड़ी यूपीआई के जरिए हुई है, तो एनपीसीआई (NPCI) पोर्टल पर भी विवाद दर्ज करवाएं।
  5. स्टेप 5: सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर नंबर ब्लॉक करें: धोखेबाजों के नंबर को तुरंत ब्लॉक और रिपोर्ट करें। उनके द्वारा भेजे गए किसी भी लिंक या एपीके (APK) फाइल को कभी डाउनलोड न करें, क्योंकि इससे आपका मोबाइल हैक हो सकता है।

6. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. क्या 1930 पर कॉल करने से ठगी का पैसा वापस मिल जाता है?

जवाब: यदि आपने पैसे कटने के 1 से 2 घंटे के भीतर 1930 पर सूचना दे दी है, तो रिकवरी की संभावना 80% से अधिक होती है। गृह मंत्रालय का पोर्टल संबंधित बैंकों को तुरंत अलर्ट भेजकर पैसे को दूसरे-तीसरे खाते में ट्रांसफर होने से पहले ही फ्रीज कर देता है। इसके बाद कोर्ट के ऑर्डर से पैसा आपके खाते में वापस आ जाता है।

Q2. क्या ठग वास्तव में मेरा फोन या इंटरनेट बंद कर सकते हैं?

जवाब: बिल्कुल नहीं! किसी भी नागरिक का मोबाइल नंबर केवल दूरसंचार विभाग (DoT) या टेलीकॉम ऑपरेटर (Jio, Airtel, Vi) द्वारा कानूनी नोटिस के बाद ही बंद किया जा सकता है। कोई भी कूरियर कंपनी या फर्जी पुलिस अधिकारी आपका नंबर बंद नहीं कर सकता।

Q3. अगर उन्होंने मेरा आधार कार्ड नंबर और पता सही बता दिया, तो क्या वे असली पुलिस हैं?

जवाब: नहीं! आजकल कई डार्क वेब लीक्स और फर्जी लोन ऐप्स से लोगों का नाम, आधार नंबर और पता साइबर अपराधियों के हाथ लग जाता है। वे इसी डेटा का इस्तेमाल करके आपको विश्वास दिलाते हैं कि वे असली अधिकारी हैं। निजी डेटा बताने से कोई भी पुलिस नहीं बन जाता।

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