documents ⏱️ 5 मिनट 📅 31 अक्टूबर 2026

ऑनलाइन एफआईआर (e-FIR) vs जीरो एफआईआर (Zero FIR) में क्या अंतर है? थानेदार मना करे तो धारा 173(4) BNSS में शिकायत नियम

VS
एडवोकेट विवेक शर्मा
आपराधिक विधि विशेषज्ञ

आपराधिक मामलों, साइबर अपराध व संवैधानिक अधिकारों के मामलों में 14 वर्षों से जिला एवं उच्च न्यायालय में वकालत कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता।

⚡ त्वरित उत्तर (Quick Answer)

सामान्य FIR केवल उसी संबंधित थाने में दर्ज होती है जिसके अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) में अपराध हुआ हो। इसके विपरीत, 'जीरो एफआईआर (Zero FIR)' एक ऐसा वैधानिक अधिकार है जिसके तहत कोई भी नागरिक किसी भी थाने में जाकर अपराध की पहली सूचना दर्ज करा सकता है, भले ही अपराध किसी अन्य क्षेत्र या राज्य में हुआ हो। नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 173(1) के तहत इलेक्ट्रॉनिक एफआईआर (e-FIR) को पूर्ण मान्यता मिल गई है, बशर्ते 3 दिनों के भीतर संबंधित थाने जाकर उस पर हस्ताक्षर कर दिए जाएं। यदि थाना प्रभारी FIR दर्ज करने से मना करे, तो धारा 173(4) BNSS के तहत एसपी (SP/SSP) को और धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट को आवेदन दिया जाता है।

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📑 विषय सूची (Table of Contents)

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🚨 पुलिस एफआईआर के नए अधिकार (Quick Summary)

  • जीरो एफआईआर (Zero FIR): घटना स्थल कोई भी हो, पुलिस यह कहकर भगा नहीं सकती कि 'यह हमारा इलाका नहीं है'। किसी भी थाने में शून्य नंबर (00/Year) से एफआईआर दर्ज होगी।
  • ई-एफआईआर (e-FIR): वाहन चोरी, गुमशुदगी या अज्ञात आरोपी के मामलों में घर बैठे पुलिस ऐप (जैसे UP COP, Delhi Police) से दर्ज कराई जा सकती है।
  • 3 दिन का नियम (धारा 173(1) BNSS): यदि आपने ईमेल या ऑनलाइन पोर्टल से शिकायत भेजी है, तो 3 दिनों के भीतर थाने जाकर हस्ताक्षर करना अनिवार्य है, तभी वह औपचारिक एफआईआर बनेगी।
  • थानेदार मना करे तो एसपी को शिकायत: धारा 173(4) BNSS के तहत पुलिस अधीक्षक को रजिस्टर्ड डाक से भेजें। इसके बाद भी कार्रवाई न होने पर धारा 175(3) BNSS में मजिस्ट्रेट कोर्ट आदेश देता है।

1. सीधा उत्तर: सामान्य FIR, ई-एफआईआर (e-FIR) और जीरो एफआईआर में बुनियादी अंतर

जब भी किसी नागरिक के साथ कोई अप्रिय घटना या अपराध घटित होता है, तो न्याय पाने की पहली सीढ़ी होती है—प्रथम सूचना रिपोर्ट (First Information Report - FIR)। भारत में 1 जुलाई 2024 से लागू हुए नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 ने नागरिकों को पुलिस प्रणाली में पारदर्शिता और त्वरित न्याय दिलाने के लिए कई बड़े अधिकार दिए हैं।

नागरिकों को अक्सर यह समझ नहीं आता कि उन्हें थाने जाकर सामान्य एफआईआर करानी चाहिए, घर बैठे ऑनलाइन ई-एफआईआर दर्ज करनी चाहिए, या किसी दूसरे थाने में जाकर जीरो एफआईआर लिखवानी चाहिए। आइए तीनों के मूलभूत अंतर को समझें:

पैमाना (Feature) सामान्य एफआईआर (Regular FIR) ई-एफआईआर (e-FIR) जीरो एफआईआर (Zero FIR)
क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) केवल उसी थाने में जहाँ अपराध घटित हुआ राज्य पुलिस के केंद्रीय वेब पोर्टल/मोबाइल ऐप पर देश के किसी भी पुलिस थाने में, बिना क्षेत्राधिकार की परवाह किए
एफआईआर नंबर आवंटन थाने की नियमित डायरी का क्रमिक नंबर (उदा. 154/2026) सिस्टम जनरेटेड ऑनलाइन एक्नॉलेजमेंट नंबर शून्य नंबर (00/2026) से दर्ज होता है
हस्ताक्षर की आवश्यकता मौके पर थानेदार के सामने भौतिक हस्ताक्षर 3 दिनों के भीतर संबंधित थाने जाकर हस्ताक्षर अनिवार्य दर्ज कराने वाले थाने में तत्काल हस्ताक्षर
अनुसंधान (Investigation) उसी थाने के विवेचक (IO) द्वारा तुरंत शुरू सत्यापन के बाद संबंधित थाने को प्रेषित प्रारंभिक साक्ष्य जुटाकर संबंधित क्षेत्राधिकार के थाने को ट्रांसफर

2. संज्ञेय (Cognizable) बनाम असंज्ञेय (Non-Cognizable) अपराध की तुलना तालिका

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पुलिस कानून का सबसे बुनियादी नियम यह है कि पुलिस केवल संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) में ही एफआईआर दर्ज करती है। असंज्ञेय अपराध में केवल एनसीआर (NCR) काटी जाती है।

पैमाना (Feature) संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable Offense)
परिभाषा एवं गंभीरता गंभीर अपराध जैसे हत्या, डकैती, बलात्कार, अपहरण, चोरी, गंभीर मारपीट मामूली विवाद जैसे साधारण गाली-गलौज, मामूली धक्का-मुक्की, दस्तावेज गुम होना
पुलिस कार्रवाई का स्वरूप प्राथमिकी (FIR) दर्ज करना पुलिस की कानूनी बाध्यता है केवल एनसीआर (NCR) दर्ज कर पीड़ित को अदालत जाने की सलाह
बिना वारंट गिरफ्तारी पुलिस को बिना मजिस्ट्रेट वारंट के अभियुक्त को गिरफ्तार करने का अधिकार बिना कोर्ट वारंट के पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती
जांच शुरू करने की शक्ति एफआईआर दर्ज होते ही पुलिस स्वतः अनुसंधान (Investigation) शुरू करती है जब तक मजिस्ट्रेट धारा 174(2) BNSS के तहत आदेश न दे, पुलिस जांच नहीं कर सकती

3. जीरो एफआईआर का नया कानून (धारा 173(1) BNSS): किसी भी थाने में FIR दर्ज कराने का अधिकार

पुराने समय में अक्सर ऐसा होता था कि यदि किसी नागरिक के साथ राजमार्ग पर या किसी अन्य जिले में लूटपाट या दुर्घटना हो जाती थी, और वह पास के थाने पहुंचता था, तो पुलिस उसे यह कहकर भगा देती थी कि "यह इलाका हमारे थाने का नहीं है, आप फलानी जगह के थाने जाइए।" इससे महत्वपूर्ण समय नष्ट होता था और साक्ष्य मिट जाते थे।

नए कानून की धारा 173(1) BNSS में वैधानिक दर्जा:

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 173(1) में अब स्पष्ट प्रावधान कर दिया गया है कि संज्ञेय अपराध की सूचना किसी भी पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को दी जा सकती है, चाहे वह अपराध उस थाने की सीमाओं के भीतर हुआ हो या नहीं।

  • थानेदार ऐसी सूचना को दर्ज करने से कतई इंकार नहीं कर सकता।
  • उस थाने में अपराध को एक अस्थायी 'शून्य क्रमांक (Zero Number)' देकर एफआईआर दर्ज की जाएगी।
  • दर्ज करने वाला थाना पीड़ित का चिकित्सीय परीक्षण (Medical Examination) कराएगा, प्राथमिक साक्ष्य जब्त करेगा और यदि अभियुक्त मौके पर है तो उसे हिरासत में लेगा।
  • इसके बाद पूरी केस डायरी संबंधित सक्षम थाने को डाक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से स्थानांतरित (Transfer) कर दी जाएगी।

4. घर बैठे ऑनलाइन e-FIR कैसे दर्ज करें? (5-चरणीय प्रक्रिया)

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यदि आपके साथ वाहन चोरी, साइबर फ्रॉड, मोबाइल चोरी अथवा कोई ऐसा संज्ञेय अपराध हुआ है जिसमें आरोपी अज्ञात है, तो आपको थाने के चक्कर काटने की आवश्यकता नहीं है। निम्नलिखित 5 चरणों में अपने स्मार्टफोन से ई-एफआईआर दर्ज करें:

  1. पहला चरण (राज्य पुलिस ऐप/पोर्टल खोलें): अपने राज्य की आधिकारिक पुलिस सेवा ऐप डाउनलोड करें (जैसे उत्तर प्रदेश में UP COP, दिल्ली में Delhi Police Tatpar, मध्य प्रदेश में MP Citizen Portal, या महाराष्ट्र में MahaPolice Citizen Portal)।
  2. दूसरा चरण (पंजीकरण व सत्यापन): अपने वैध मोबाइल नंबर और आधार विवरण से नागरिक खाता बनाएं तथा प्राप्त ओटीपी दर्ज करके लॉगिन करें।
  3. तीसरा चरण ('e-FIR दर्ज करें' विकल्प चुनें): सेवा सूची में से 'e-FIR (ई-प्राथमिकी)' पर क्लिक करें। अपराध की श्रेणी चुनें (उदा. वाहन चोरी, साइबर फ्रॉड, सामान्य चोरी आदि)।
  4. चौथा चरण (घटना स्थल, समय व विवरण भरें): घटना की सटीक तारीख, समय, स्थान का पता और घटना का पूरा क्रमवार विवरण लिखें। यदि कोई बिल, फोटो या सीसीटीवी फुटेज हो तो उसे संलग्न (Upload) करें।
  5. पांचवां चरण (सबमिट व एक्नॉलेजमेंट रसीद): आवेदन सबमिट करते ही स्क्रीन पर डिजिटल रसीद और संदर्भ संख्या (Reference / Crime ID) प्रदर्शित होगी। इसे भविष्य की जांच और ट्रैकिंग हेतु सुरक्षित डाउनलोड कर लें।

5. इलेक्ट्रॉनिक एफआईआर का '3 दिन का अनिवार्य हस्ताक्षर नियम' (धारा 173(1) BNSS)

यह नए कानून BNSS का वह सबसे अहम बिंदु है जिसके बारे में 99% नागरिकों को जानकारी नहीं है, और जिसके अभाव में उनकी ऑनलाइन शिकायतें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।

धारा 173(1) का द्वितीय परंतुक (Second Proviso):

कानूनन स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी संज्ञेय अपराध की सूचना इलेक्ट्रॉनिक संचार (Electronic Communication - जैसे ईमेल, ऑनलाइन पोर्टल या व्हाट्सएप) द्वारा दी जाती है, तो वह तब तक रिकॉर्ड पर नहीं ली जाएगी जब तक कि सूचना देने वाला व्यक्ति सूचना प्रेषित करने के तीन दिनों के भीतर (Within Three Days) संबंधित थाने में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर उस पर अपने भौतिक हस्ताक्षर न कर दे!

नागरिकों के लिए चेतावनी: केवल पोर्टल पर फॉर्म भरकर निश्चिंत न बैठें। आवेदन की प्रति का प्रिंट निकालें और 72 घंटे के भीतर संबंधित थाने के ड्यूटी ऑफिसर के पास जाकर उस पर अपने हस्ताक्षर अवश्य सत्यापित कराएं।

6. महिला पीड़ितों के लिए विशेष कानूनी सुरक्षा: घर पर बयान व वीडियोग्राफी नियम

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 में महिला सुरक्षा और संवेदनशील अपराधों की रिपोर्टिंग हेतु अत्यंत कड़े सुरक्षात्मक नियम बनाए गए हैं:

  • महिला पुलिस अधिकारी द्वारा बयान: धारा 173(1) के प्रथम परंतुक के अनुसार, यदि संज्ञेय अपराध किसी महिला के विरुद्ध लैंगिक उत्पीड़न, तेजाब हमला, शीलभंग या बलात्कार से संबंधित है, तो ऐसी सूचना केवल और केवल किसी महिला पुलिस अधिकारी या महिला लोक सेवक द्वारा ही दर्ज की जाएगी।
  • थाने आने की मजबूरी नहीं: यदि पीड़िता शारीरिक या मानसिक रूप से अस्वस्थ है अथवा थाने जाने में असहज है, तो पुलिस अधिकारी पीड़िता के निवास स्थान पर या उसकी पसंद के किसी सुविधाजनक स्थान पर जाकर परिवार या विशेष परामर्शदाता की उपस्थिति में सूचना दर्ज करेंगे।
  • अनिवार्य वीडियोग्राफी (Videography): नए कानून के तहत ऐसे संवेदनशील बयानों की इलेक्ट्रॉनिक वीडियो रिकॉर्डिंग करना पुलिस के लिए बाध्यकारी कर दिया गया है ताकि विवेचना में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ न हो सके।

7. जीरो एफआईआर दर्ज होने के बाद संबंधित थाने में कैसे ट्रांसफर होती है?

जब किसी थाने में जीरो एफआईआर दर्ज हो जाती है, तो कानूनन उसकी आगे की प्रक्रिया इस प्रकार आगे बढ़ती है:

  • शून्य क्रमांक से नियमित क्रमांक: जिस थाने में अपराध हुआ था (क्षेत्राधिकार वाला थाना), जैसे ही उसे जीरो एफआईआर की प्रति और केस डायरी प्राप्त होती है, वह थाना अपने सामान्य रजिस्टर में उस केस को एक नियमित नंबर (Regular FIR Number) आवंटित करता है।
  • फरियादी को एसएमएस व सूचना: CCTNS (Crime and Criminal Tracking Network and Systems) पोर्टल के माध्यम से फरियादी के मोबाइल पर एसएमएस द्वारा नए नियमित थाने का नाम, नया एफआईआर नंबर और जांच अधिकारी (IO) का मोबाइल नंबर प्रेषित किया जाता है।
  • मुफ्त प्रति का अधिकार: धारा 173(2) BNSS के तहत सूचना देने वाले को एफआईआर की एक प्रति तत्काल और बिल्कुल निःशुल्क पाने का वैधानिक अधिकार है।

8. CCTNS पोर्टल पर एफआईआर की स्थिति (Status) ऑनलाइन कैसे ट्रैक करें?

गृह मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) तथा राज्य पुलिस पोर्टलों पर नागरिक अपनी एफआईआर की वर्तमान स्थिति 24 घंटे ट्रैक कर सकते हैं:

ट्रैकिंग के 4 आसान चरण:

  1. संबंधित राज्य पुलिस के आधिकारिक CCTNS वेब पोर्टल (जैसे uppolice.gov.in या delhipolice.gov.in) पर जाएं और 'View FIR' या 'Track Case Status' पर क्लिक करें।
  2. अपना जिला, पुलिस स्टेशन का नाम, वर्ष और एफआईआर संख्या दर्ज करें।
  3. पंजीकृत मोबाइल नंबर पर प्राप्त ओटीपी दर्ज करके सबमिट करें।
  4. स्क्रीन पर विवेचना अधिकारी (Investigating Officer - IO) का नाम, संपर्क नंबर, चार्जशीट दाखिल हुई या फाइनल रिपोर्ट (FR) लगी, इसका संपूर्ण आधिकारिक विवरण प्रदर्शित हो जाएगा।

9. यदि थाना प्रभारी (SHO) FIR लिखने से मना करे तो क्या करें? (3 विधिक रास्ते)

यदि स्थानीय थाने का पुलिसकर्मी या एसएचओ आपकी शिकायत सुनने या संज्ञेय अपराध में एफआईआर लिखने से साफ इंकार कर देता है, तो कानून आपको 3 बेहद शक्तिशाली विधिक विकल्प प्रदान करता है:

रास्ता 1: धारा 173(4) BNSS - पुलिस अधीक्षक (SP/SSP) को शिकायत

यदि थानेदार मना करे, तो आप अपनी लिखित शिकायत को रजिस्टर्ड डाक (Registered Post with AD) अथवा ईमेल के माध्यम से जिले के पुलिस अधीक्षक (SP), वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) या पुलिस कमिश्नर को भेजें। यदि एसपी संतुष्ट होते हैं कि संज्ञेय अपराध हुआ है, तो वे स्वयं जांच करेंगे या किसी अधीनस्थ पुलिस अधिकारी को एफआईआर दर्ज कर जांच करने का लिखित निर्देश देंगे।

रास्ता 2: धारा 175(3) BNSS - न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद

पुराने कानून में इसे धारा 156(3) CrPC कहा जाता था। अब नए कानून में धारा 175(3) BNSS के तहत यदि एसपी को डाक से शिकायत भेजने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती, तो आप अपने अधिवक्ता के माध्यम से संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM / ACJM) की अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल कर सकते हैं। मजिस्ट्रेट पुलिस को केस दर्ज करने का बाध्यकारी न्यायिक आदेश (Directions to register FIR) जारी करता है।

रास्ता 3: धारा 199 भारतीय न्याय संहिता (BNS) - पुलिस पर आपराधिक कार्रवाई

भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 199 (पूर्व में IPC 166A) के तहत यदि कोई लोक सेवक (पुलिस अधिकारी) कानून के आदेश की जानबूझकर अवज्ञा करता है या संज्ञेय अपराध (विशेष रूप से महिलाओं व बच्चों के विरुद्ध अपराधों) में एफआईआर दर्ज करने में विफल रहता है, तो उस पुलिस अधिकारी के विरुद्ध अदालत में आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है जिसमें कम से कम 6 माह से लेकर 2 वर्ष तक के कठोर कारावास और जुर्माने का स्पष्ट प्रावधान है।

10. एसपी (SP/SSP) को भेजी जाने वाली शिकायत का कानूनी प्रारूप (Draft Format)

नागरिकों की सुविधा के लिए पुलिस अधीक्षक को रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेजे जाने वाले प्रार्थना पत्र का सटीक प्रारूप नीचे दिया गया है:

सेवा में,
श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय (SP / SSP / Commissioner of Police),
जिला: [जिले का नाम], [राज्य का नाम]

विषय: अंतर्गत धारा 173(4) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 संज्ञेय अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराने हेतु प्रार्थना पत्र।

महोदय,
प्रार्थी [आपका पूरा नाम], पुत्र श्री [पिता का नाम], निवासी [पूरा पता, मोबाइल नंबर] सादर निवेदन करता है कि:

1. यह कि दिनांक [घटना की तारीख] को समय लगभग [समय] बजे प्रार्थी के साथ स्थान [घटना स्थल का सटीक पता] पर विपक्षीगण [आरोपी का नाम, पता या अज्ञात] द्वारा [घटना का संक्षिप्त विवरण जैसे मारपीट, हथियार से हमला, लूटपाट या धमकी] का गंभीर संज्ञेय अपराध कारित किया गया।

2. यह कि प्रार्थी उक्त घटना की लिखित सूचना लेकर दिनांक [तारीख] को स्थानीय थाना [थाने का नाम] गया और थाना प्रभारी महोदय से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का करबद्ध निवेदन किया।

3. यह कि अत्यंत क्षोभ का विषय है कि थाना प्रभारी महोदय द्वारा प्रार्थी की संज्ञेय अपराध की लिखित तहरीर लेने और एफआईआर दर्ज करने से साफ इंकार कर दिया गया और प्रार्थी को थाने से डांटकर भगा दिया गया।

4. अतः माननीय सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ के निर्णय (ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार) एवं धारा 173(4) BNSS के आलोक में प्रार्थी यह प्रार्थना पत्र आपकी सेवा में रजिस्टर्ड डाक द्वारा प्रेषित कर रहा है।

प्रार्थना: श्रीमान जी से विनम्र निवेदन है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित थाना प्रभारी को तत्काल संज्ञेय धाराओं में एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष विवेचना करने का आदेश पारित करने की कृपा करें।

संलग्नक: थाने में दी गई तहरीर की प्रति व डाक रसीद।

भवदीय,
हस्ताक्षर: _______________
नाम: _______________
दिनांक: _______________

11. ललिता कुमारी बनाम यूपी सरकार: सुप्रीम कोर्ट की बाध्यकारी गाइडलाइन

एफआईआर दर्ज कराने के संबंध में देश का सबसे बड़ा कानूनी नजीर सर्वोच्च न्यायालय का ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) 2 SCC 1 का संविधान पीठ का फैसला है:

सुप्रीम कोर्ट के 4 ऐतिहासिक आदेश:

  • अनिवार्य पंजीकरण: यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो पुलिस अधिकारी के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है; एफआईआर दर्ज करना 100% अनिवार्य है।
  • प्रारंभिक जांच का सीमित दायरा: केवल पारिवारिक विवाद, व्यावसायिक विवाद, चिकित्सा लापरवाही या भ्रष्टाचार के मामलों में ही प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) की अनुमति है, और वह जांच भी अधिकतम 14 दिनों (नए कानून में 14 दिन) के भीतर पूरी होनी चाहिए।
  • डायरी में एंट्री बाध्यकारी: यदि पुलिस प्रारंभिक जांच करती है या केस बंद करती है, तो उसका कारण जनरल डायरी (GD) में दर्ज कर फरियादी को लिखित में सूचित करना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

12. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)

Q1: क्या जीरो एफआईआर दर्ज कराने के लिए कोई सरकारी फीस लगती है?

उत्तर: कतई नहीं। भारतीय कानून के तहत किसी भी थाने में सामान्य एफआईआर, ई-एफआईआर या जीरो एफआईआर दर्ज कराने के लिए शून्य शुल्क है। यदि कोई पुलिसकर्मी एफआईआर दर्ज करने के बदले पैसे मांगता है, तो यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर अपराध है।

Q2: क्या ऑनलाइन ई-एफआईआर से पासपोर्ट वेरिफिकेशन में कोई समस्या आती है?

उत्तर: यदि आप पीड़ित (शिकायतकर्ता) हैं और आपने अपने साथ हुए अपराध या चोरी की ई-एफआईआर दर्ज कराई है, तो आपके पासपोर्ट वेरिफिकेशन पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। पासपोर्ट केवल तभी रुकता है जब आपके विरुद्ध किसी अदालत में आपराधिक आरोप तय (Charges Framed) हों या गैर-जमानती वारंट लंबित हो।

Q3: क्या घर का ताला टूटने या चोरी होने पर ऑनलाइन e-FIR दर्ज हो सकती है?

उत्तर: अधिकांश राज्य पुलिस पोर्टल्स (जैसे UP COP व दिल्ली पुलिस) पर अज्ञात आरोपी के विरुद्ध साधारण चोरी और वाहन चोरी में ई-एफआईआर दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन यदि मौके पर कोई शारीरिक हिंसा, लूट या हत्या जैसी गंभीर घटना हुई है, तो पुलिस फील्ड यूनिट और फॉरेंसिक जांच हेतु थाने की टीम को मौके पर बुलाना अनिवार्य होता है।

Q4: क्या एफआईआर दर्ज कराने के बाद उसे वापस लिया जा सकता है?

उत्तर: एक बार जब एफआईआर दर्ज हो जाती है, तो फरियादी उसे सीधे थाने जाकर अपनी मर्जी से 'वापस' नहीं ले सकता। यदि दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है, तो समझौते योग्य धाराओं में अदालत के समक्ष समझौता पेश किया जाता है, अथवा उच्च न्यायालय (High Court) में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 (पूर्व 482 CrPC) के तहत एफआईआर रद्द (Quash) कराने की याचिका दाखिल की जाती है।

Q5: जब जीरो एफआईआर को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले थाने में ट्रांसफर किया जाता है, तो क्या शिकायतकर्ता को दोबारा बयान देने थाने जाना पड़ता है?

उत्तर: ट्रांसफर होने पर CCTNS सिस्टम के माध्यम से केस डायरी और मूल तहरीर सीधे संबंधित थाने को डिजिटल रूप से भेज दी जाती है और वहां नया नियमित क्राइम नंबर आवंटित होता है। जांच अधिकारी (IO) साक्ष्य संकलन और औपचारिक बयान दर्ज करने हेतु शिकायतकर्ता से संपर्क करता है, लेकिन शून्य एफआईआर की कानूनी वैधता ट्रांसफर के क्षण से ही बिना रुकावट जारी रहती है।

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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q. क्या जीरो एफआईआर दर्ज कराने के लिए कोई सरकारी फीस लगती है?

A. कतई नहीं। भारतीय कानून के तहत किसी भी थाने में सामान्य एफआईआर, ई-एफआईआर या जीरो एफआईआर दर्ज कराने के लिए शून्य शुल्क है। यदि कोई पुलिसकर्मी एफआईआर दर्ज करने के बदले पैसे मांगता है, तो यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर अपराध है।

Q. क्या ऑनलाइन ई-एफआईआर से पासपोर्ट वेरिफिकेशन में कोई समस्या आती है?

A. यदि आप पीड़ित (शिकायतकर्ता) हैं और आपने अपने साथ हुए अपराध या चोरी की ई-एफआईआर दर्ज कराई है, तो आपके पासपोर्ट वेरिफिकेशन पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। पासपोर्ट केवल तभी रुकता है जब आपके विरुद्ध किसी अदालत में आपराधिक आरोप तय (Charges Framed) हों या गैर-जमानती वारंट लंबित हो।

Q. क्या घर का ताला टूटने या चोरी होने पर ऑनलाइन e-FIR दर्ज हो सकती है?

A. अधिकांश राज्य पुलिस पोर्टल्स पर अज्ञात आरोपी के विरुद्ध साधारण चोरी और वाहन चोरी में ई-एफआईआर दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन यदि मौके पर कोई शारीरिक हिंसा, लूट या हत्या जैसी गंभीर घटना हुई है, तो पुलिस फील्ड यूनिट और फॉरेंसिक जांच हेतु थाने की टीम को मौके पर बुलाना अनिवार्य होता है।

Q. क्या एफआईआर दर्ज कराने के बाद उसे वापस लिया जा सकता है?

A. एक बार जब एफआईआर दर्ज हो जाती है, तो फरियादी उसे सीधे थाने जाकर अपनी मर्जी से 'वापस' नहीं ले सकता। यदि दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है, तो समझौते योग्य धाराओं में अदालत के समक्ष समझौता पेश किया जाता है, अथवा उच्च न्यायालय (High Court) में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत एफआईआर रद्द (Quash) कराने की याचिका दाखिल की जाती है।

Q. जब जीरो एफआईआर को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले थाने में ट्रांसफर किया जाता है, तो क्या शिकायतकर्ता को दोबारा बयान देने थाने जाना पड़ता है?

A. ट्रांसफर होने पर CCTNS सिस्टम के माध्यम से केस डायरी और मूल तहरीर सीधे संबंधित थाने को डिजिटल रूप से भेज दी जाती है और वहां नया नियमित क्राइम नंबर आवंटित होता है। जांच अधिकारी (IO) साक्ष्य संकलन और औपचारिक बयान दर्ज करने हेतु शिकायतकर्ता से संपर्क करता है, लेकिन शून्य एफआईआर की कानूनी वैधता ट्रांसफर के क्षण से ही बिना रुकावट जारी रहती है।

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