documents ⏱️ 12 min read 📅 2026-10-08T10:45:00+05:30

e-Daakhil Portal 2026: ऑनलाइन शॉपिंग फ्रॉड पर घर बैठे कंज्यूमर कोर्ट में केस ऐसे करें

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सुनीता शर्मा
नागरिक दस्तावेज़ व उपभोक्ता अधिकार विशेषज्ञ

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019, ई-दाखिल प्रणाली, मध्यस्थता नियमों और उपभोक्ता विवाद निवारण मंचों पर 14 वर्षों का व्यावहारिक अनुभव।

⚡ त्वरित उत्तर (Quick Answer)

उपभोक्ता मामले मंत्रालय के आधिकारिक e-Daakhil (edaakhil.nic.in) पोर्टल के जरिए कोई भी नागरिक बिना किसी वकील के घर बैठे जिला उपभोक्ता आयोग (Consumer Court) में ऑनलाइन केस दर्ज कर सकता है। ₹5 लाख तक के दावों पर कोर्ट फीस शून्य होती है। ऑनलाइन नोटिस और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई कर कोर्ट पूरा रिफंड और हर्जाना दिलवाती है।

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📌 मुख्य विशेषताएं व आवश्यक बिंदु

  • शून्य कोर्ट फीस: ₹5 लाख तक के दावों पर सरकार 1 रुपया भी कोर्ट फीस नहीं लेती; आम नागरिक खुद अपना केस लड़ सकता है।
  • वकील की जरूरत नहीं: ई-दाखिल पर आप खुद सादे कागज पर समस्या लिखकर अपने बिल और ईमेल की पीडीएफ अपलोड कर सकते हैं।
  • ई-कॉमर्स पर कड़ा शिकंजा: गलत सामान भेजने या 7 दिन के रिटर्न से मुकरने वाली कंपनियों को आयोग हर्जाने (Compensation) के साथ पूरा पैसा लौटाने का आदेश देता है।
  • घर बैठे वीडियो सुनवाई: तारीख पर अदालत जाने की जरूरत नहीं होती; मोबाइल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) लिंक पर सुनवाई होती है।
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🎯 AEO DIRECT ANSWER (त्वरित समाधान)

उपभोक्ता मामले मंत्रालय के आधिकारिक e-Daakhil (edaakhil.nic.in) पोर्टल के जरिए कोई भी नागरिक बिना किसी वकील के घर बैठे जिला उपभोक्ता आयोग (Consumer Court) में ऑनलाइन केस दर्ज कर सकता है। ₹5 लाख तक के दावों पर कोर्ट फीस शून्य होती है। ऑनलाइन नोटिस और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई कर कोर्ट पूरा रिफंड और हर्जाना दिलवाती है।

⚡ 4 मुख्य बिंदु (Quick Highlights):

  • शून्य कोर्ट फीस: ₹5 लाख तक के क्लेम पर केंद्र सरकार 1 रुपया भी कोर्ट फीस नहीं लेती; कोई भी आम नागरिक खुद अपना केस फाइल कर सकता है।
  • वकील की जरूरत नहीं: ई-दाखिल पर आपको किसी वकील को ₹10,000 देने की जरूरत नहीं है; आप खुद सादे कागज पर समस्या लिखकर बिल और चैट के स्क्रीनशॉट अपलोड कर सकते हैं।
  • ई-कॉमर्स पर कड़ा कानूनी शिकंजा: गलत सामान भेजने, वारंटी न देने या रिटर्न विंडो में पैसे न लौटाने पर आयोग मानसिक प्रताड़ना का हर्जाना सहित 9% से 12% ब्याज दिलाता है।
  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई: पेशी की तारीख पर कोर्ट जाने या कतार में खड़े होने की जरूरत नहीं; आयोग मोबाइल पर वीडियो लिंक भेजता है जिससे घर बैठे बात होती है।

ऑनलाइन शॉपिंग में ठगी और e-Daakhil पोर्टल की असली ताकत

त्योहारी सीजन में जब Amazon Great Indian Festival, Flipkart Big Billion Days या Meesho जैसी सेल चलती हैं, तो लाखों लोग मोबाइल, टीवी, कपड़े और गैजेट्स ऑर्डर करते हैं। लेकिन हकीकत यह भी है कि हजारों लोगों के साथ भयानक धोखे होते हैं—किसी के पार्सल में नए स्मार्टफोन की जगह साबुन की बट्टी निकलती है, किसी का 65 इंच का टीवी टूटा हुआ निकलता है, तो किसी का रिटर्न कूरियर बॉय ले जाता है लेकिन हफ्ते भर बाद ऐप पर लिखा आता है कि 'Return Rejected - Wrong Item Received'।

जब आप कस्टमर केयर को फोन लगाते हैं, तो उनका बॉट या एग्जीक्यूटिव 10 दिन तक रटा-रटाया जवाब देता है—"सर, हमारी इंटरनल टीम जांच कर रही है, कृपया 48 घंटे प्रतीक्षा करें।" 48 घंटे बाद वे सीधे टिकट बंद कर देते हैं और आपका ₹20,000 या ₹50,000 डूब जाता है। आम आदमी सोचता है कि अब कोर्ट-कचहरी कौन जाएगा, वकील ₹5,000 मांग लेगा।

यहीं पर काम आता है भारत सरकार के उपभोक्ता मामले मंत्रालय का 'e-Daakhil' पोर्टल (edaakhil.nic.in)। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 (Consumer Protection Act 2019) के तहत सरकार ने पूरे देश की जिला अदालतों, राज्य आयोगों और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग को एक सिंगल वेबसाइट से जोड़ दिया है। अब आपको अदालत के चक्कर नहीं काटने पड़ते; अपने मोबाइल से 15 मिनट में केस दर्ज होता है और जज साहब सीधे कंपनी के डायरेक्टर को समन भेजते हैं।

नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन (1915) बनाम ई-दाखिल: बड़ा अंतर समझें

कई लोग 'नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन' (NCH 1915 या consumerhelpline.gov.in) और 'ई-दाखिल' को एक ही समझ लेते हैं। यह समझना बेहद जरूरी है कि दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है:

  • NCH (1915 / कंज्यूमर हेल्पलाइन): यह केवल एक सलाहकारी और मध्यस्थता (Mediation) मंच है। यह कोई अदालत नहीं है। जब आप 1915 पर शिकायत करते हैं, तो सरकारी अधिकारी कंपनी को मेल भेजकर कहते हैं कि ग्राहक का मामला सुलझाओ। अगर कंपनी अड़ जाए और कहे कि हम रिफंड नहीं देंगे, तो NCH कंपनी पर कोई जुर्माना या सजा नहीं लगा सकती।
  • e-Daakhil (कंज्यूमर कोर्ट): यह एक पूर्ण संवैधानिक न्यायिक अदालत (District Consumer Disputes Redressal Commission) है। इसमें जिला जज स्तर के न्यायिक अधिकारी बैठते हैं। इनके आदेश की वही कानूनी ताकत होती है जो किसी सिविल कोर्ट के फैसले की होती है। अगर कंपनी जज के आदेश का पालन नहीं करती, तो कंपनी के अधिकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट तक जारी हो सकता है।

📋 5-कॉलम फैक्ट्स प्रोफाइल टेबल: दावा राशि, कोर्ट फीस व प्रक्रिया

दावा राशि (Claim Amount) उपभोक्ता अदालत का स्तर आधिकारिक कोर्ट फीस सुनवाई का माध्यम काम की ज़मीनी टिप
₹5,00,000 तक जिला उपभोक्ता आयोग (DCDRC) ₹0 (पूरी तरह निशुल्क) ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कंपनी को भेजा गया अंतिम लीगल ईमेल और स्पीड पोस्ट ट्रैकिंग जरूर लगाएं।
₹5 लाख से ₹10 लाख जिला उपभोक्ता आयोग ₹400 (ऑनलाइन भारतकोश) ऑनलाइन या व्यक्तिगत मानसिक संताप और कानूनी भागदौड़ का हर्जाना अलग से मांगें।
₹10 लाख से ₹20 लाख जिला उपभोक्ता आयोग ₹1,000 डिजिटल ट्रैकिंग उपलब्ध उत्पाद की अनबॉक्सिंग वीडियो और सर्विस सेंटर की जॉब शीट संलग्न करें।
₹20 लाख से ₹50 लाख जिला उपभोक्ता आयोग ₹2,000 आयोग द्वारा नोटिस तामील बैंक पासबुक की कॉपी जिसमें पैसा कटने की एंट्री हो, जरूर लगाएं।

₹5 लाख तक के मुकदमों पर शून्य कोर्ट फीस: आम उपभोक्ता के कानूनी अधिकार

कंज्यूमर प्रोटेक्शन रूल्स के तहत सरकार ने आम उपभोक्ताओं को सशक्त बनाने के लिए ऐतिहासिक फैसला लिया है कि ₹5 लाख तक के किसी भी विवाद पर 1 रुपया भी कोर्ट फीस नहीं लगेगी। चाहे आपका ₹500 का हेडफोन खराब निकला हो या ₹80,000 का आईफोन टूटा आया हो—आप बिना एक पैसा खर्च किए कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

इसके अलावा अधिनियम के सेक्शन 2(7) के अनुसार ऑनलाइन खरीदार भी पूरी तरह 'कंज्यूमर' की श्रेणी में आते हैं। यदि कंपनी अपने विज्ञापन में जो दावा करती है वह उत्पाद में नहीं मिलता (Misleading Advertisement), या 7 दिन की रिटर्न पॉलिसी के बावजूद रिटर्न लेने से मना करती है (Unfair Trade Practice), तो उपभोक्ता को केवल रिफंड ही नहीं, बल्कि उस पैसे पर बैंक दर से ब्याज, मुकदमे का खर्च (Litigation Cost) और मानसिक प्रताड़ना (Mental Agony) का हर्जाना पाने का कानूनी अधिकार है।

edaakhil.nic.in पर घर बैठे नया केस दर्ज करने का 5-स्टेप डिजिटल प्रोसेस

ई-दाखिल पोर्टल पर केस दर्ज करना उतना ही आसान है जितना सोशल मीडिया पर प्रोफाइल बनाना। नीचे दिए गए 5 चरणों का पालन करें:

  1. स्टेप 1 (यूजर रजिस्ट्रेशन व आधार ई-केवाईसी): आधिकारिक वेबसाइट edaakhil.nic.in खोलें। होमपेज पर 'Register' पर क्लिक करके 'Consumer/Complainant' चुनें। अपना नाम, आधार नंबर, ईमेल, मोबाइल नंबर और पता दर्ज करें। मोबाइल पर आए ओटीपी से ई-केवाईसी पूरा करें।
  2. स्टेप 2 (नया केस शुरू करें व जिला आयोग चुनें): लॉगिन करने के बाद डैशबोर्ड पर 'File New Complaint' पर क्लिक करें। अपने गृह जिले का जिला उपभोक्ता आयोग (District Consumer Commission) चुनें। (2019 के नए नियम के तहत आप अपने गृह जिले की अदालत में केस कर सकते हैं, चाहे कंपनी बैंगलोर या गुड़गांव में बैठी हो!)।
  3. स्टेप 3 (पार्टी विवरण - Opponent Details दर्ज करें): 'Complainant' में आपका नाम रहेगा। 'Opposite Party (विपक्षी)' में ई-कॉमर्स कंपनी (जैसे Amazon Seller Services Pvt Ltd) और संबंधित सेलर का नाम, कॉरपोरेट ऑफिस का पता और आधिकारिक ईमेल आईडी भरें।
  4. स्टेप 4 (शिकायत ड्राफ्ट व दस्तावेज अपलोड): अपनी शिकायत की एक पीडीएफ फाइल (Complaint Draft), टैक्स इनवॉइस (Bill), अनबॉक्सिंग वीडियो या टूटे सामान की फोटो, कस्टमर केयर के साथ चैट हिस्ट्री और बैंक स्टेटमेंट की एक मर्ज की गई पीडीएफ फाइल अपलोड करें।
  5. स्टेप 5 (वेरिफिकेशन व डिजिटली सबमिट): अपने आधार ओटीपी से डिजिटल हस्ताक्षर (e-Sign) करें और सबमिट करें। सिस्टम तुरंत एक अस्थायी कंप्लेंट नंबर (Provisional Filing Number) जनरेट करेगा। 48 घंटे के भीतर आयोग का रजिस्ट्रार फाइलों की जांच करके औपचारिक केस नंबर (Case Number) आवंटित कर देगा।

उपभोक्ता शिकायत का ड्राफ्टिंग प्रारूप (कॉपी-पेस्ट रेडी फॉर्मेट)

आपको किसी भारी-भरकम कानूनी भाषा की जरूरत नहीं है। माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में एक सादे पन्ने पर हिंदी या अंग्रेजी में इस तरह लिखें:

समक्ष: माननीय जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, [आपके जिले का नाम]

परिवादी (Complainant): [आपका पूरा नाम, पिता का नाम, पूरा पता, मोबाइल व ईमेल]
बनाम (Versus)
विपक्षीगण (Opposite Parties): 1. [ई-कॉमर्स कंपनी का नाम व रजिस्टर्ड ऑफिस पता], 2. [सेलर का नाम व पता]

विषय: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 35 के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार व सेवा में कमी हेतु परिवाद।

संक्षिप्त विवरण:
1. परिवादी ने दिनांक [तारीख] को ऑर्डर आईडी [संख्या] के तहत ₹[रुपये] का भुगतान करके [सामान का नाम] खरीदा था। (प्रमाण संलग्न: बिल)
2. दिनांक [तारीख] को पार्सल प्राप्त होने पर वह टूटा हुआ/गलत निकला। परिवादी ने तुरंत अनबॉक्सिंग वीडियो बनाया और रिटर्न रिक्वेस्ट डाली।
3. विपक्षीगण ने बिना किसी कारण के रिटर्न खारिज कर दिया और कस्टमर केयर से कोई संतोषजनक समाधान नहीं दिया।
4. प्रार्थना: विपक्षीगण को निर्देशित किया जाए कि वह पूरी धनराशि ₹[...] वापस करे, मानसिक प्रताड़ना हेतु ₹15,000 व परिवाद व्यय हेतु ₹5,000 का हर्जाना अदा करे।

हस्ताक्षर: [आपका नाम व तारीख]

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) से सुनवाई कैसे होती है और हर्जाना कैसे मिलता है?

केस रजिस्टर्ड होने के बाद आयोग दोनों पक्षों को नोटिस भेजता है। ई-कॉमर्स कंपनियों के लीगल ऑफिसर ईमेल पर नोटिस मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं। कोर्ट की सुनवाई के दिन आपको ई-दाखिल पोर्टल या आपके ईमेल पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Cisco Webex या Google Meet) का लिंक भेजा जाता है।

आप अपने घर बैठे मोबाइल या लैपटॉप से जज साहब के सामने ऑनलाइन उपस्थित होते हैं। जज साहब आपसे 2 मिनट में घटना पूछते हैं और कंपनी के वकील से सवाल करते हैं। यदि आपके पास अनबॉक्सिंग वीडियो और टैक्स इनवॉइस मौजूद है, तो 95% मामलों में कंपनी पहली या दूसरी सुनवाई में ही कोर्ट के बाहर समझौता करने (Out of Court Settlement) की पेशकश कर देती है और पूरा पैसा ब्याज सहित आपके खाते में क्रेडिट कर देती है।

तुलना टेबल: कस्टमर केयर बनाम NCH 1915 बनाम ई-दाखिल कोर्ट

मंच (Platform) कानूनी अधिकार व शक्ति क्या कोर्ट फीस लगती है? क्या कंपनी पर जुर्माना लग सकता है? अंतिम परिणाम की गारंटी
कस्टमर केयर कंप्लेंट शून्य (केवल कंपनी की आंतरिक नीति) ₹0 नहीं (अपनी मर्जी से टिकट बंद कर देते हैं) बहुत कम (सिर्फ टालमटोल)
National Consumer Helpline (NCH 1915) केवल मध्यस्थता व सरकारी सलाह ₹0 (टोल-फ्री व ऐप) नहीं (आदेश देने का कानूनी अधिकार नहीं) मध्यम (यदि कंपनी बात मान ले)
e-Daakhil (Consumer Court) संवैधानिक न्यायिक अदालत (न्यायाधीश) ₹5 लाख तक ₹0 (पूरी तरह निशुल्क) हाँ (रिफंड + 9-12% ब्याज + भारी मानसिक हर्जाना) 100% बाध्यकारी कानूनी डिग्री (Decree)

🛠️ 3 वास्तविक ज़मीनी फ्रिक्शन चेतावनियाँ (दोस्त वाली बोलचाल में)

⚠️ 1. सीधे केस दर्ज करने से पहले 1 लीगल ईमेल भेजना जरूरी है:

दोस्त, ई-दाखिल पर जाने से पहले उस ई-कॉमर्स कंपनी के कस्टमर केयर हेड और नोडल ऑफिसर को एक कड़ा ईमेल लिखो कि "यदि 48 घंटे में मेरा रिफंड प्रोसेस नहीं हुआ, तो मैं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत जिला उपभोक्ता आयोग में केस दाखिल कर रहा हूं।" 70% कंपनियां इस ईमेल के बाद ही केस के डर से चुपचाप पैसा रिफंड कर देती हैं। अगर वे 48 घंटे में न मानें, तो इसी ईमेल का स्क्रीनशॉट कोर्ट में आपका सबसे बड़ा हथियार बनेगा कि आपने कंपनी को पूरा मौका दिया था।

⚠️ 2. पार्सल अनबॉक्सिंग वीडियो की बिना कट वाली ताकत:

जब भी ऑनलाइन सेल में महंगा सामान (मोबाइल, लैपटॉप, वॉच, टीवी) आए, तो पार्सल पर कूरियर बॉय का लेबल साफ दिखाते हुए किसी दूसरे फोन से 1 मिनट का लगातार वीडियो बनाओ। अगर अंदर ईंट, साबुन या टूटा सामान निकला, तो बिना वीडियो के ई-कॉमर्स कंपनियां सीधे कह देती हैं कि "कस्टमर फ्रॉड कर रहा है।" कोर्ट में यह वीडियो पेश करते ही जज साहब तुरंत कंपनी पर जुर्माना ठोकते हैं।

⚠️ 3. विपक्षी पार्टी (Opposite Party) में सेलर का नाम छोड़ना:

ई-दाखिल पर फॉर्म भरते समय लोग केवल 'Amazon' या 'Flipkart' का नाम डालते हैं। ई-कॉमर्स कंपनियां कोर्ट में कहती हैं कि "हम तो केवल मध्यस्थ (Intermediary Marketplace) हैं, सामान सेलर ने भेजा था।" इसलिए अपने इनवॉइस पर लिखे सेलर (जैसे RetailNet, Appario, आदि) का नाम और जीएसटी नंबर भी विपक्षी पार्टी #2 के रूप में जरूर दर्ज करें। इससे दोनों पार्टियों में से कोई भी बहाना बनाकर बच नहीं सकता।

उपभोक्ता कोर्ट के आदेश की तामील (Execution) और कंपनी पर जेल का कानूनी प्रावधान

कई उपभोक्ताओं को डर रहता है कि "अगर जिला उपभोक्ता आयोग ने मेरे पक्ष में फैसला सुना भी दिया, तो क्या बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी पैसा देगी?" इसका जवाब है—100% देना पड़ेगा, और अगर नहीं देगी तो कंपनी के अधिकारी जेल जाएंगे!

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 71 और 72 के तहत उपभोक्ता आयोग के आदेश को सिविल कोर्ट की डिक्री (Civil Court Decree) माना जाता है:

  • समय सीमा: कोर्ट आदेश की प्रति मिलने के 30 से 45 दिनों के भीतर कंपनी को ब्याज सहित पूरी राशि और हर्जाना उपभोक्ता के बैंक खाते में जमा करना होता है।
  • एक्ज़ीक्यूशन याचिका (Execution Petition): यदि कंपनी तय समय में भुगतान नहीं करती, तो आप ई-दाखिल पोर्टल पर ही धारा 71/72 के तहत एक्ज़ीक्यूशन पिटीशन दाखिल कर सकते हैं।
  • कारावास और जुर्माना (Section 72): आदेश की अवहेलना करने पर आयोग को अधिकार है कि वह कंपनी के स्थानीय निदेशकों या अधिकृत अधिकारियों को कम से कम 1 माह से लेकर अधिकतम 3 वर्ष तक का कठोर कारावास और ₹25,000 से ₹1,00,000 तक का जुर्माना लगा सकता है। यही कारण है कि आदेश होते ही ई-कॉमर्स कंपनियां तुरंत चेक लेकर उपभोक्ता के दरवाजे पर पहुंच जाती हैं।

जब आप ई-दाखिल पर केस अपलोड करते हैं, तो जज साहब सबसे पहले यह देखते हैं कि क्या उपभोक्ता ने कंपनी को अपनी गलती सुधारने का मौका दिया था या नहीं। इसलिए एक सुनियोजित लीगल नोटिस बहुत जरूरी है:

  • ईमेल नोटिस: कंपनी के आधिकारिक ग्रिवेंस ऑफिसर (Grievance Officer) की ईमेल आईडी पर 48 घंटे का अल्टीमेटम मेल भेजें।
  • स्पीड पोस्ट रसीद: यदि विवाद ₹50,000 से अधिक का है, तो भारतीय डाक (India Post Speed Post) से ₹40 का खर्च करके कंपनी के रजिस्टर्ड मुख्यालय (Corporate Office) पर एक लिखित नोटिस भेजें और डाक विभाग की ट्रैकिंग रिपोर्ट (Delivery Confirmation) का प्रिंट निकाल लें।
  • कोर्ट में वजन: जब आपकी शिकायत के साथ यह स्पीड पोस्ट डिलीवरी रिपोर्ट लगी होती है, तो कंपनी के वकील कोर्ट में यह बहाना नहीं बना सकते कि "हमें तो ग्राहक की शिकायत की जानकारी ही नहीं थी।"

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: क्या ई-दाखिल पर केस दर्ज करने के लिए वकील की फीस देनी पड़ती है?

बिल्कुल नहीं! उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत आम नागरिक खुद (Party in Person) अपना केस दाखिल कर सकता है और बहस कर सकता है। किसी वकील की जरूरत नहीं है।

Q2: ₹5 लाख तक के केस में क्या कोई कोर्ट फीस लगती है?

नहीं, उपभोक्ता मामले मंत्रालय के नियमों के अनुसार ₹5,00,000 तक की दावा राशि पर कोर्ट फीस पूरी तरह ₹0 (शून्य) है।

Q3: क्या मुझे तारीख पर कोर्ट के कमरे में जाना होगा?

नहीं, ई-दाखिल प्रणाली में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) की सुविधा है। आपको अपने मोबाइल या लैपटॉप से ऑनलाइन सुनवाई में जुड़ने का लिंक मिल जाता है।

Q4: घटना के कितने समय बाद तक कंज्यूमर कोर्ट में केस किया जा सकता है?

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अनुसार समस्या उत्पन्न होने या विवाद की तारीख से 2 वर्ष (24 महीने) के भीतर आप केस दर्ज कर सकते हैं।

Q5: अगर कंपनी दूसरे राज्य (जैसे कर्नाटक या दिल्ली) की है तो केस कहां होगा?

2019 के नए नियमों के तहत आप अपने गृह जिले (जहाँ आप रहते हैं) के जिला उपभोक्ता आयोग में ही केस दाखिल कर सकते हैं। आपको दूसरे राज्य जाने की जरूरत नहीं है।

Q6: क्या खराब खाने (Zomato/Swiggy) या टैक्सी (Ola/Uber) के खिलाफ भी केस हो सकता है?

हाँ, किसी भी प्रकार की पेड डिजिटल सर्विस, फूड डिलीवरी, कैब सर्विस, होटल बुकिंग या एयरलाइंस के खिलाफ ई-दाखिल पर केस दर्ज किया जा सकता है।

Q7: ई-दाखिल पर दस्तावेज किस फॉर्मेट में अपलोड करने होते हैं?

सभी लिखित शिकायतें, इनवॉइस, ईमेल और पहचान प्रमाण पीडीएफ (PDF) फॉर्मेट में होने चाहिए। फाइल का साइज अमूमन 20MB से कम होना चाहिए।

Q8: फैसला आने में अमूमन कितना समय लगता है?

कानून के अनुसार उपभोक्ता मामलों का निपटारा 3 से 5 महीने के भीतर होना चाहिए। अक्सर नोटिस मिलते ही कंपनियां कोर्ट के बाहर 1 महीने में समझौता कर लेती हैं।

आधिकारिक स्तर-1 संदर्भ: e-Daakhil Official Portal | उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, भारत सरकार।

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