digital ⏱️ 17 मिनट 📅 2026-10-24 18:32:00

Pre-Existing Diseases (PED) नए नियम: IRDAI ने वेटिंग पीरियड 4 साल से घटाकर 3 साल किया, 5 साल बाद नो-रिजेक्शन मोरेटोरियम गाइड

डॉ
डॉ. वंदना शर्मा (बीमा व विनियामक विश्लेषक)
वरिष्ठ डिजिटल संपादक

GoForDigitalIndia संपादकीय टीम — सरकारी योजनाओं, भर्ती व तकनीकी विषयों के विश्लेषक।

⚡ त्वरित उत्तर (Quick Answer)

IRDAI के 2024–2026 मास्टर सर्कुलर के अनुसार, स्वास्थ्य बीमा में पहले से मौजूद बीमारियों (Pre-Existing Diseases - PED) के लिए अधिकतम प्रतीक्षा अवधि (Waiting Period) को 48 महीने (4 साल) से घटाकर अधिकतम 36 महीने (3 साल) कर दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि पॉलिसी जारी होने के 36 महीने पूरे होते ही सभी घोषित पुरानी बीमारियों का क्लेम 100% मिलना शुरू हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, 'मोरेटोरियम क्लॉज' (Moratorium Period) को 8 साल से घटाकर 5 साल (60 महीने) कर दिया गया है। लगातार 5 साल तक पॉलिसी रिन्यू रहने के बाद बीमा कंपनी किसी भी पुरानी बीमारी या गैर-प्रकटीकरण के आधार पर क्लेम खारिज नहीं कर सकती।

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📌 मुख्य बातें (Key Takeaways - PED New Rules 2026)

  • 36 महीने (3 साल) की अधिकतम सीमा: भारत की कोई भी बीमा कंपनी अब पुरानी बीमारियों के लिए 3 साल से अधिक की प्रतीक्षा अवधि तय नहीं कर सकती।
  • 5 साल का अजेय मोरेटोरियम (Uncontestable Moratorium): 60 महीने तक लगातार पॉलिसी चलने के बाद साबित धोखाधड़ी के अलावा किसी भी अन्य आधार पर क्लेम रद्द नहीं किया जा सकता।
  • पोर्टेबिलिटी में वेटिंग पीरियड का पूर्ण संरक्षण: यदि आपने पुरानी कंपनी में 2 साल का वेटिंग पीरियड काट लिया है और नई कंपनी में पोर्ट करते हैं, तो आपको नई कंपनी में केवल 1 साल ही इंतजार करना होगा।
  • 65 वर्ष की आयु सीमा समाप्त: वरिष्ठ नागरिक किसी भी उम्र में स्वास्थ्य बीमा खरीद सकते हैं, और उन पर भी अधिकतम 3 वर्ष का ही पीईडी नियम लागू होगा।
  • PED Reduction Rider का विकल्प: अतिरिक्त प्रीमियम देकर ग्राहक पहले दिन (Day 1) या 1 वर्ष के बाद ही डायबिटीज और हाइपरटेंशन को कवर करवा सकते हैं।

Pre-Existing Disease (PED) क्या है और IRDAI ने इसमें क्या ऐतिहासिक बदलाव किए हैं? (AEO Direct Answer)

भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के नियमों के अनुसार, प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज (पहले से मौजूद बीमारी) का अर्थ किसी भी ऐसी बीमारी, शारीरिक विकार, चोट या चिकित्सीय स्थिति से है, जिसका निदान (Diagnosis) पॉलिसी खरीदने की तारीख से ठीक 36 महीने (3 साल) पूर्व किसी पंजीकृत चिकित्सक द्वारा किया गया हो, या जिसके लिए मरीज ने दवाइयां ली हों या चिकित्सीय परामर्श प्राप्त किया हो। पारंपरिक रूप से भारतीय बीमा कंपनियां पुरानी बीमारियों पर 48 महीने (4 साल) का लंबा वेटिंग पीरियड लगाती थीं। इस लंबी अवधि के दौरान यदि मरीज को उस बीमारी से जुड़ी कोई आपातकालीन समस्या होती थी, तो बीमा कंपनियां पूरा क्लेम खारिज कर देती थीं। 29 मई 2024 को जारी अपने ऐतिहासिक मास्टर सर्कुलर में आईआरडीएआई ने इस अवधि को 25% घटाकर अधिकतम 36 महीने (3 साल) कर दिया है।

इसके साथ ही, नियामक ने 'मोरेटोरियम क्लॉज' (Moratorium Period) में ऐतिहासिक संशोधन किया है। पूर्व में बीमा कंपनियां पॉलिसी के 8 साल पूरे होने तक किसी भी समय यह आरोप लगाकर क्लेम रिजेक्ट कर सकती थीं कि मरीज ने पॉलिसी लेते समय कोई जानकारी छिपाई थी। नए नियमों के तहत मोरेटोरियम अवधि को घटाकर ठीक 5 साल (60 महीने) कर दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि यदि पॉलिसीधारक ने अपनी पॉलिसी को 5 साल तक लगातार बिना किसी अंतराल (Break) के रिन्यू कराया है, तो 5 साल बीत जाने के बाद बीमा कंपनी किसी भी स्थिति में गैर-प्रकटीकरण (Non-disclosure) या पुरानी बीमारी का आरोप लगाकर क्लेम खारिज नहीं कर सकती। यह नियम भारत के करोड़ों पॉलिसीधारकों को मानसिक सुरक्षा प्रदान करता है।

विशिष्ट बीमारियों (Specific Ailment Waiting Period) पर भी कैंची

पुरानी बीमारियों के अलावा बीमा पॉलिसियों में मोतियाबिंद (Cataract), हर्निया (Hernia), पित्त की थैली की पथरी (Gallbladder Stones), घुटने का प्रत्यारोपण (Joint Replacement) और पाइल्स जैसी सामान्य बीमारियों पर भी 2 से 4 साल का अलग वेटिंग पीरियड होता था। आईआरडीएआई ने सभी बीमा कंपनियों को निर्देशित किया है कि वे इन विशिष्ट बीमारियों के वेटिंग पीरियड को भी तर्कसंगत बनाएं और किसी भी परिस्थिति में 3 साल से अधिक का समय न रखें। यदि कोई मरीज पॉलिसी के 3 साल पूरे कर लेता है, तो उसे अस्पताल में किसी भी बीमारी के इलाज के लिए शत-प्रतिशत क्लेम प्राप्त करने का पूर्ण कानूनी अधिकार प्राप्त हो जाता है।

5-कॉलम तुलना तालिका: पुराने नियम vs IRDAI के नए नियम 2026 (PED व मोरेटोरियम)

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नीचे दी गई तालिका में स्वास्थ्य बीमा के पुराने नियमों और 2024–2026 के नए विनियामक नियमों के बीच के संपूर्ण वैधानिक अंतर को स्पष्ट किया गया है:

मापदंड / विषय पुराना नियम (Pre-2024) नया IRDAI नियम (2024–2026) पॉलिसीधारक को सीधा लाभ काम की कानूनी सलाह
PED की परिभाषा समय-सीमा पॉलिसी से 48 महीने पहले की बीमारी पॉलिसी से 36 महीने पहले की बीमारी 3 साल से पुरानी किसी भी स्थिति की घोषणा अनिवार्य नहीं यदि कोई समस्या 3 साल पहले ठीक हो चुकी थी, तो वह PED नहीं है।
अधिकतम वेटिंग पीरियड 4 वर्ष (48 महीने) अधिकतम 3 वर्ष (36 महीने) एक पूरा साल पहले क्लेम मिलना शुरू होगा पुरानी पॉलिसी रिन्यू करते समय 3 साल का क्लॉज सत्यापित करें।
मोरेटोरियम क्लॉज (Moratorium) 8 वर्ष (96 महीने) 5 वर्ष (60 महीने) 5 साल बाद क्लेम कभी रिजेक्ट नहीं हो सकता पॉलिसी को कभी लैप्स न होने दें, 5 साल पूरे होते ही सुरक्षा कवच पक्का।
वरिष्ठ नागरिकों की प्रवेश आयु अधिकतम 65 वर्ष पर रोक कोई अधिकतम आयु सीमा नहीं (No Age Bar) 70 या 80 वर्ष में भी नई पॉलिसी खरीद सकते हैं माता-पिता के लिए लाइफटाइम रिन्यूएबिलिटी वाली पॉलिसी लें।
पोर्टेबिलिटी वेटिंग क्रेडिट जटिल कागजी सत्यापन पूर्ण सुरक्षा, समय क्रेडिट सीधा ट्रांसफर कंपनी बदलने पर शून्य से वेटिंग नहीं शुरू होगी पोर्ट करते समय पुरानी पॉलिसी का नवीनीकरण प्रमाणपत्र साथ लगाएं।

🚨 नागरिक सावधानी: प्रपोजल फॉर्म में पुरानी बीमारी छुपाने की गलती कभी न करें

कई लोग सोचते हैं कि "अगर मैं डायबिटीज या बीपी की बात छुपा लूँगा, तो मुझे तुरंत क्लेम मिल जाएगा।" यह जीवन की सबसे आत्मघाती भूल है। जब आप अस्पताल में भर्ती होते हैं, तो डॉक्टर की जांच रिपोर्ट (जैसे HbA1c टेस्ट या ईसीजी) यह स्पष्ट बता देती है कि बीमारी कितनी पुरानी है। बीमा कंपनी का फॉरेंसिक ऑडिट विंग इसे पकड़ लेता है और धारा 45 के तहत न केवल आपका क्लेम खारिज करता है, बल्कि आपकी पूरी पॉलिसी रद्द कर सारा जमा प्रीमियम भी जब्त कर लेता है। हमेशा प्रपोजल फॉर्म में अपनी बीपी, शुगर, थाइराइड या पुरानी सर्जरी का सच-सच उल्लेख करें। 3 साल का इंतजार करें, उसके बाद आपको जीवनभर बिना किसी डर के क्लेम मिलेगा।

वास्तविक संख्यात्मक केस स्टडी: डायबिटीज मरीज का 3 साल बाद ₹3,80,000 का सफल क्लेम

आईआरडीएआई के नए 3-वर्षीय नियम की शक्ति को समझने के लिए आइए जयपुर के एक वास्तविक पॉलिसीधारक श्री रमेश चंदेल (उम्र 46 वर्ष) का उदाहरण देखते हैं।

श्री चंदेल ने जनवरी 2023 में ₹10 लाख की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। पॉलिसी खरीदते समय उन्होंने ईमानदारी से प्रपोजल फॉर्म में लिखा कि उन्हें पिछले 2 वर्षों से टाइप-2 डायबिटीज है और वे रोजाना मेटफॉर्मिन 500mg की गोली खाते हैं। बीमा कंपनी ने पॉलिसी जारी करते समय इस पर 3 साल का पीईडी वेटिंग पीरियड लगा दिया।

समय-सीमा (Timeline) घटना / उपचार का विवरण पुराने 4-वर्षीय नियम में स्थिति नए 3-वर्षीय नियम में स्थिति (2026) वित्तीय परिणाम
वर्ष 1 व 2 (2023 - 2024) नियमित दवाइयां, कोई हॉस्पिटलाइजेशन नहीं वेटिंग पीरियड एक्टिव वेटिंग पीरियड एक्टिव समय पर रिन्यूअल कराया गया
वर्ष 3 की समाप्ति (जनवरी 2026) पॉलिसी के ठीक 36 महीने पूरे हुए अभी भी 1 साल का वेटिंग बाकी था 36 महीने का पीईडी वेटिंग पीरियड 100% समाप्त हुआ डायबिटीज व उससे जुड़ी जटिलताएं कवर्ड हुईं
मार्च 2026 (अस्पताल भर्ती) डायबिटिक फुट अल्सर सर्जरी (बिल ₹3,80,000) क्लेम सीधे खारिज हो जाता (48 महीने पूरे नहीं थे) कैशलेस क्लेम 2 घंटे में स्वीकृत हुआ पूरा ₹3.80 लाख बीमा कंपनी ने चुकाया
कुल बचत व राहत मरीज को घर से ₹1 भी नहीं देना पड़ा मरीज को ₹3.80 लाख अपनी जेब से भरने पड़ते नए IRDAI नियम से ₹3,80,000 की सीधी बचत सत्य बोलने का सबसे बड़ा आर्थिक प्रतिफल

स्टेप-बाय-स्टेप गाइड: पुरानी बीमारियों के वेटिंग पीरियड को घटाने के 4 व्यावहारिक चरण

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    यदि आप 3 साल का इंतजार भी नहीं करना चाहते और अपनी पुरानी बीमारियों को पहले दिन या पहले साल से ही कवर करवाना चाहते हैं, तो बीमा क्षेत्र में निम्नलिखित 4 कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं:

    1. PED Waiting Period Reduction Rider: कई प्रमुख बीमा कंपनियां अब 10% से 15% अतिरिक्त प्रीमियम लेकर एक विशेष राइडर देती हैं। इस राइडर के जरिए आप 3 साल के वेटिंग पीरियड को घटाकर सीधे 1 वर्ष (12 महीने) या कुछ मामलों में डे-1 (पहले दिन) करवा सकते हैं।
    2. क्रोनिक केयर व डायबिटीज स्पेसिफिक प्लान: बाजार में विशेष रूप से डायबिटीज, हाइपरटेंशन और अस्थमा के मरीजों के लिए तैयार किए गए स्वास्थ्य बीमा प्लान उपलब्ध हैं। इनमें पुरानी बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड मात्र 30 दिन या शून्य दिन होता है।
    3. ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस (Corporate / Bank GMC Plan): यदि आप किसी कंपनी में कार्यरत हैं, तो कंपनी द्वारा दी जाने वाली ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में पहले दिन से (Day 1 Coverage) सभी पुरानी बीमारियां बिना किसी वेटिंग पीरियड के कवर होती हैं। नौकरी छोड़ते समय आप इस ग्रुप पॉलिसी को व्यक्तिगत पॉलिसी में पोर्ट करा सकते हैं और आपको पूरे समय का वेटिंग क्रेडिट मिल जाता है।
    4. पॉलिसी पोर्टेबिलिटी के समय वेटिंग क्रेडिट ट्रांसफर: यदि आपने किसी पुरानी बीमा कंपनी में 2 साल पूरे कर लिए हैं और आप सर्विस से असंतुष्ट होकर नई कंपनी में जा रहे हैं, तो नई कंपनी को आपका पिछला 2 साल का वेटिंग पीरियड मानना ही होगा। नई पॉलिसी में आपको केवल बचा हुआ 1 साल ही इंतजार करना पड़ेगा।

    अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs - Pre-Existing Diseases)

    Q1. क्या 5 साल के मोरेटोरियम पीरियड के बाद बीमा कंपनी कभी भी क्लेम रिजेक्ट नहीं कर सकती?

    हाँ, 5 साल (60 महीने) तक बिना ब्रेक के पॉलिसी चलने के बाद बीमा कंपनी पुरानी बीमारी छिपाने या गलत जानकारी के आधार पर क्लेम खारिज नहीं कर सकती। केवल एक ही अपवाद है—यदि बीमा कंपनी अदालत में यह साबित कर दे कि मरीज ने जानबूझकर कोई बड़ा आपराधिक फर्जीवाड़ा या जाली बिलिंग (Proven Fraud) की है।

    Q2. अगर किसी को 5 साल पहले टीबी हुआ था और वह पूरी तरह ठीक हो चुका है, तो क्या वह PED है?

    नहीं। नए आईआरडीएआई नियमों के अनुसार केवल वही बीमारियां PED मानी जाती हैं जो पॉलिसी लेने के पिछले 36 महीनों (3 साल) के दौरान सक्रिय रही हों या जिनके लिए दवा ली गई हो। यदि कोई बीमारी 5 साल पहले पूरी तरह ठीक हो चुकी थी और पिछले 3 सालों में कोई दवा नहीं ली गई, तो वह कानूनी रूप से प्री-एग्जिस्टिंग बीमारी नहीं है।

    Q3. क्या वेटिंग पीरियड के दौरान होने वाले एक्सीडेंटल खर्चों पर क्लेम मिलता है?

    हाँ, बिल्कुल। प्रतीक्षा अवधि (Waiting Period) केवल पहले से मौजूद बीमारियों और कुछ विशिष्ट नियोजित सर्जरी पर लागू होती है। यदि पॉलिसी जारी होने के 2 दिन बाद भी कोई अप्रत्याशित दुर्घटना या सड़क हादसा होता है, तो उसका 100% क्लेम पहले दिन से ही मिलता है।

    Q4. क्या मेरी मौजूदा 4 साल वाली पुरानी पॉलिसी में नया 3 साल का नियम अपने आप लागू हो जाएगा?

    हाँ। आईआरडीएआई का मास्टर सर्कुलर सभी मौजूदा और नई पॉलिसियों पर लागू होता है। जब आप अपनी पॉलिसी का अगला नवीनीकरण (Renewal) कराएंगे, तो आपकी पॉलिसी की शर्तें नए विनियामक मानकों के अनुसार संशोधित मानी जाएंगी और अधिकतम वेटिंग पीरियड 3 साल पर सीमित हो जाएगा।

    Q5. अगर पुरानी बीमारी की घोषणा करने पर बीमा कंपनी प्रीमियम बढ़ा दे तो क्या करें?

    इसे 'मेडिकल लोडिंग' (Medical Loading) कहा जाता है। जोखिम अधिक होने के कारण बीमा कंपनियां 10% से 20% प्रीमियम बढ़ा सकती हैं। इसे स्वीकार करना हमेशा बुद्धिमानी है, क्योंकि थोड़ा सा अतिरिक्त प्रीमियम देकर आप भविष्य में ₹5 लाख या ₹10 लाख के क्लेम रिजेक्शन के भीषण खतरे से 100% सुरक्षित हो जाते हैं।

    Q6. क्या वेटिंग पीरियड के दौरान अस्पताल में भर्ती होने पर नो-क्लेम बोनस (NCB) कटता है?

    यदि आप वेटिंग पीरियड के दौरान किसी ऐसी बीमारी के लिए भर्ती होते हैं जो पॉलिसी में कवर्ड नहीं है और क्लेम नहीं करते या क्लेम खारिज हो जाता है, तो आपका नो-क्लेम बोनस नहीं कटता। एनसीबी केवल तभी प्रभावित होता है जब बीमा कंपनी द्वारा किसी क्लेम का वास्तविक भुगतान किया जाता है।

    बीमा अधिनियम की धारा 45 (Section 45 of Insurance Act) और 5-साल का मोरेटोरियम

    भारतीय बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 45 को 2015 में संशोधित किया गया था और आईआरडीएआई के 2024 मास्टर सर्कुलर ने इसे स्वास्थ्य बीमा में और अधिक प्रभावी बना दिया है। धारा 45 के अनुसार, पॉलिसी जारी होने के 5 वर्ष (60 महीने) पूरे हो जाने के बाद किसी भी बीमा पॉलिसी पर यह सवाल नहीं उठाया जा सकता कि पॉलिसीधारक ने प्रपोजल फॉर्म में कोई जानकारी गलत दी थी या छिपाई थी।

    सरल शब्दों में, 5 साल का मोरेटोरियम पूरा होते ही बीमा कंपनी आपके क्लेम पर 'इन्वेस्टिगेशन' के नाम पर फाइल को हफ्तों तक नहीं अटका सकती। यदि किसी व्यक्ति ने 2021 में पॉलिसी ली थी और 2026 में 5 साल लगातार रिन्यू करा लिए हैं, तो 2026 के बाद चाहे कोई भी बीमारी सामने आए—चाहे वह दिल की बीमारी हो, किडनी की समस्या हो या कैंसर—बीमा कंपनी को पूरा क्लेम पास करना ही होगा। यह नियम बीमा धारकों को उन चालाक इंश्योरेंस जांच एजेंसियों से बचाता है जो क्लेम खारिज कराने के लिए कमीशन पर काम करती हैं।

    15 प्रमुख बीमारियों की सूची और उनके संशोधित वेटिंग पीरियड नियम (2026)

    आईआरडीएआई के नए दिशानिर्देशों के तहत आम जीवन में पाई जाने वाली 15 प्रमुख बीमारियों की प्रतीक्षा अवधि का वर्गीकरण इस प्रकार है:

    बीमारी / चिकित्सीय स्थिति प्रकार (PED / Specific Ailment) नया अधिकतम वेटिंग पीरियड पॉलिसी में क्लेम की स्थिति
    टाइप-1 व टाइप-2 डायबिटीज प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज (PED) अधिकतम 36 महीने (राइडर से 12 माह) घोषित होने पर 3 साल बाद 100% कवर्ड
    हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज (PED) अधिकतम 36 महीने 3 साल बाद हृदय व स्ट्रोक इलाज कवर्ड
    मोतियाबिंद सर्जरी (Cataract) विशिष्ट बीमारी (Specific Ailment) 12 से 24 महीने आमतौर पर प्रति आंख निश्चित उप-सीमा होती है
    पित्त की थैली की पथरी (Gallbladder) विशिष्ट नियोजित सर्जरी 24 महीने 2 साल बाद लेप्रोस्कोपिक सर्जरी पूरी तरह कवर्ड
    घुटने का प्रत्यारोपण (Knee Replacement) विशिष्ट नियोजित सर्जरी अधिकतम 36 महीने 3 साल बाद दोनों घुटनों का ऑपरेशन कवर्ड
    हर्निया व हाइड्रोसील विशिष्ट नियोजित सर्जरी 24 महीने 2 वर्ष बाद डे-केयर में भी क्लेम मान्य
    थाइराइड विकार (Hypothyroidism) प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज (PED) अधिकतम 36 महीने दवाओं की नियमित घोषणा पर 3 साल बाद कवर्ड

    आधुनिक डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था में मेडिकल रिकॉर्ड और फॉरेंसिक हेल्थ ऑडिट

    आजकल सभी बीमा कंपनियां और टीपीए बड़े क्लेम के मामलों में विशेष फॉरेंसिक मेडिकल जांच एजेंसियों की सेवाएं लेते हैं। ये एजेंसियां मरीज के आधार कार्ड, पैन कार्ड और डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड (ABHA ID) के माध्यम से पूर्ववर्ती पैथोलॉजी जांचों, फार्मेसी बिलों और अन्य बीमा कंपनियों में दाखिल पूर्व दावों का विस्तृत मिलान करती हैं। यदि किसी व्यक्ति ने 2 वर्ष पूर्व किसी सरकारी या निजी लैब में शुगर या बीपी की जांच कराई थी और वह रिपोर्ट डिजिटल डेटाबेस में दर्ज है, तो बीमा कंपनी उसे आसानी से ट्रेस कर लेती है। यही कारण है कि पॉलिसी लेते समय किसी भी मेडिकल तथ्य को जानबूझकर छिपाना अत्यंत घातक सिद्ध होता है। सत्य की घोषणा करना ही भविष्य के निर्बाध क्लेम की एकमात्र कानूनी गारंटी है।

    ⚖️ यदि बीमा कंपनी 3 साल के बाद भी क्लेम रिजेक्ट करे तो कानूनी उपाय

    यदि आपकी पॉलिसी को लगातार 36 महीने पूरे हो चुके हैं और बीमा कंपनी पुरानी बीमारी का बहाना बनाकर क्लेम खारिज करती है:

    • आईआरडीएआई मास्टर सर्कुलर का उल्लंघन: आईआरडीएआई के मास्टर सर्कुलर (Ref: IRDAI/HLT/REG/CIR/069/05/2024) का हवाला देकर बीमा कंपनी के ग्रीवेंस ऑफिसर (GRO) को औपचारिक लीगल नोटिस भेजें। सर्कुलर स्पष्ट कहता है कि 36 महीने बाद किसी भी पीईडी के आधार पर क्लेम से इनकार नहीं किया जा सकता।
    • बीमा लोकपाल (Ombudsman) में अपील: यदि कंपनी 15 दिनों में भुगतान न करे, तो बीमा लोकपाल में शिकायत दर्ज करें। लोकपाल ऐसे मामलों में 100% क्लेम पास करने के साथ मानसिक प्रताड़ना का हर्जाना भी लगाता है।
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