- पर्यावरण प्रेमी एवं जागरूक नागरिक: जो राष्ट्रीय राजमार्गों पर पेड़ों के कटान और पर्यावरण संरक्षण नियमों को समझना चाहते हैं।
- ग्रामीण स्वयं सहायता समूह (SHGs) व किसान: जो हाईवे किनारे नर्सरी और वृक्षारोपण रखरखाव से आजीविका कमाना चाहते हैं।
- इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉन्ट्रैक्टर्स व सिविल इंजीनियर्स: जिन्हें डीपीआर में 1% ग्रीन फंड और ट्रांसप्लांटेशन नॉर्म्स का अनुपालन करना है।
- प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी: जो यूपीएससी, राज्य लोक सेवा आयोग और ई-गवर्नेंस की पर्यावरण नीतियों की तैयारी कर रहे हैं।
1. ग्रीन हाईवेज पॉलिसी 2026: उद्देश्य और पृष्ठभूमि
भारत का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क विश्व के सबसे बड़े सड़क तंत्रों में से एक है। तेजी से हो रहे आर्थिक विकास और एक्सप्रेसवे निर्माण के कारण वाहनों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन और धूल प्रदूषण में वृद्धि हुई है। इसी चुनौती से निपटने के लिए ग्रीन हाईवेज पॉलिसी तैयार की गई है। इस नीति का उद्देश्य केवल सड़क के किनारे पौधे लगाना नहीं है, बल्कि एक ऐसा प्राकृतिक 'हरित गलियारा' (Green Corridor) तैयार करना है जो ध्वनि प्रदूषण को सोखे, मिट्टी के कटाव को रोके और सड़क हादसों को कम करने में भी मदद करे।
वर्ष 2026 के संशोधित नियमों के तहत, हर नए हाईवे प्रोजेक्ट के लिए 'एनवायर्नमेंटल सस्टेनेबिलिटी ऑडिट' अनिवार्य कर दिया गया है। बिना ग्रीन क्लीयरेंस और प्लांटेशन प्लान के किसी भी नए एक्सप्रेसवे को अंतिम कमर्शियल ऑपरेशन सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) के साथ मिलकर एकीकृत डिजिटल डैशबोर्ड तैयार किया गया है जो यह सुनिश्चित करता है कि निर्माण के दौरान यदि किसी वन क्षेत्र से सड़क गुजरती है तो उसके बदले निर्धारित प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) का 100% अनुपालन हो।
2. 1% सिविल कॉस्ट आवंटन और वित्तीय प्रबंधन प्रणाली
ग्रीन हाईवेज नीति का सबसे मजबूत वित्तीय स्तंभ है—कुल सिविल निर्माण लागत का 1% अनिवार्य ग्रीन फंड। यदि किसी एक्सप्रेसवे परियोजना की सिविल लागत ₹5,000 करोड़ है, तो ₹50 करोड़ की राशि सीधे हरित गलियारे के निर्माण, पौधों की खरीद, सिंचाई तंत्र और 5 वर्षों के रखरखाव के लिए आरक्षित की जाती है।
इस फंड का प्रबंधन NHAI के विशेष 'ग्रीन हाईवे फंड' (GHF) के तहत एस्क्रो अकाउंट द्वारा किया जाता है। इससे ठेकेदार या निर्माण एजेंसियां इस बजट को किसी अन्य सिविल कार्य में डाइवर्ट नहीं कर सकतीं। फंड का भुगतान केवल सैटेलाइट ऑडिट में 90% से अधिक पौधों के जीवित पाए जाने के बाद ही किस्तों में जारी किया जाता है। अनुबंध के तहत 40% राशि प्रारंभिक पौधारोपण के बाद, 20% दूसरे वर्ष के सफल ऑडिट के बाद, और शेष 40% पांचवें वर्ष के पूर्ण सर्वाइवल सत्यापन के बाद जारी की जाती है।
3. ISRO भुवन सैटेलाइट और AI ड्रोन द्वारा जियो-टैगिंग
अतीत में कागजी वृक्षारोपण की शिकायतों को जड़ से समाप्त करने के लिए 2026 की नीति में अत्याधुनिक अंतरिक्ष और एआई तकनीक का समावेश किया गया है:
- ISRO भुवन प्लेटफॉर्म: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के भुवन सैटेलाइट सिस्टम से प्रत्येक राष्ट्रीय राजमार्ग के ग्रीन बेल्ट का हाई-रिजॉल्यूशन जीआईएस मैप तैयार किया जाता है।
- डिजिटल जियो-टैगिंग: प्रत्येक रोपे गए पौधे को एक विशिष्ट डिजिटल आईडी और जीपीएस कोऑर्डिनेट असाइन किया जाता है। इसमें पौधे की प्रजाति, रोपण की तारीख और वेंडर का विवरण दर्ज होता है।
- AI युक्त ड्रोन सर्वे: हर तीन महीने पर NHAI द्वारा अधिकृत ड्रोन हाईवे के ऊपर उड़ान भरकर कैनोपी घनत्व, पौधों की ऊंचाई और पत्तियों के स्वास्थ्य (NDVI - Normalized Difference Vegetation Index) का विश्लेषण करते हैं।
- स्वचालित अलर्ट सिस्टम: यदि किसी विशेष 5 किलोमीटर के पैच में 15% से अधिक पौधे सूखते हैं, तो सिस्टम स्वचालित रूप से क्षेत्रीय परियोजना निदेशक (Project Director) और संबंधित ठेकेदार को सुधारात्मक नोटिस भेज देता है।
4. वैज्ञानिक ट्री ट्रांसप्लांटेशन (Tree Transplantation) के नए नियम
पुराने और विशाल पेड़ों को काटे बिना उन्हें सुरक्षित दूसरी जगह स्थानांतरित करने के लिए MoRTH ने सख्त 'ट्री ट्रांसप्लांटेशन प्रोटोकॉल' जारी किए हैं:
ट्रांसप्लांटेशन की प्रक्रिया निम्नलिखित कड़े चरणों में संपन्न होती है:
- कैनोपी प्रूनिंग व शेड्यूलिंग: पेड़ के शीर्ष भाग की अनावश्यक शाखाओं की वैज्ञानिक छंटाई की जाती है ताकि वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) से पानी की कमी न हो। यह कार्य केवल पतझड़ या मानसून के आरंभ में किया जाता है।
- रूट बॉल प्रिपरेशन व कवकनाशी उपचार: तने के चारों ओर 1.5 से 2 मीटर व्यास में गहरी खुदाई कर जड़ों को संरक्षित किया जाता है और फंगस से बचाव हेतु कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप लगाया जाता है।
- माइकोराइजा इनोकुलेशन: नए रोपण स्थल पर मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए लाभकारी कवक (Mycorrhiza) और बायो-फर्टिलाइजर्स डाले जाते हैं ताकि जड़ें तेजी से नए वातावरण में फैल सकें।
- सपोर्ट केबलिंग: ट्रांसप्लांट के बाद पेड़ को तेज आंधी-तूफान से बचाने के लिए कम से कम 1 वर्ष तक स्टील सपोर्ट केबल्स और बांस के ढांचों से बांधकर रखा जाता है।
5. कृषि-जलवायु क्षेत्र अनुसार प्रजातियों का चयन व 3-स्तरीय कैनोपी
राजमार्गों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधों का चयन स्थानीय पारिस्थितिकी (Agro-climatic Zones) के अनुसार किया जाता है:
- शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र (राजस्थान, गुजरात, हरियाणा): खेजड़ी, रोहिड़ा, नीम, बेर, बबूल और केर जैसे कम पानी में पनपने वाले पेड़।
- गंगा-यमुना मैदानी क्षेत्र (उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब): शीशम, पीपल, बरगद, जामुन, महुआ, अमलतास और कचनार।
- तटीय एवं उच्च आर्द्रता क्षेत्र (केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, बंगाल): नारियल, काजू, बादाम, करंज, मैंग्रोव प्रजातियां और कैसुरीना।
- पहाड़ी एवं पश्चिमी घाट क्षेत्र (उत्तराखंड, हिमाचल, पूर्वोत्तर): देवदार, बांज (ओक), बुरांश, सिल्वर ओक और बांस के झुरमुट।
सड़क के डिवाइडर (Median) पर बोगनविलिया और कनेर जैसे कम ऊंचाई वाले फूलदार पौधे लगाए जाते हैं जो सामने से आने वाली तेज लाइट को रोकते हैं। पहली पंक्ति में 3-5 मीटर के मध्यम पेड़ और बाउंड्री पर 15-20 मीटर ऊंचे घने पेड़ लगाए जाते हैं।
6. बैम्बू क्रैश बैरियर (Bio-Fencing) और वन्यजीव संरक्षण
भारत सरकार ने पारंपरिक स्टील क्रैश बैरियर के स्थान पर प्राकृतिक बांस से बने 'बाहुबली' बैम्बू क्रैश बैरियर (Bamboo Crash Barriers) को बड़े पैमाने पर लागू करने की मंजूरी दी है। यह पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ वाहनों के प्रभाव को अवशोषित करने में भी अत्यधिक प्रभावी साबित हुआ है।
इसके साथ ही, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों से गुजरने वाले एक्सप्रेसवे पर 'एनिमल अंडरपास' और 'कैनोपी ब्रिज' बनाए गए हैं, जिनके चारों ओर घने बांस और देशी झाड़ियां लगाई जाती हैं ताकि वन्यजीव बिना किसी डर के सुरक्षित प्राकृतिक रास्ते से गुजर सकें।
7. ठेकेदारों के लिए कड़े अनुपालन नियम व पेनाल्टी स्ट्रक्चर
ग्रीन हाईवेज नीति 2026 में निर्माण कंपनियों और रखरखाव एजेंसियों के लिए कड़े आर्थिक दंड और ब्लैकलिस्टिंग के प्रावधान शामिल हैं:
8. ग्रीन हाईवेज से कार्बन क्रेडिट और हरित अर्थव्यवस्था
ग्रीन हाईवेज नीति 2026 भारत के लिए एक नया वित्तीय संसाधन खोल रही है—ग्रीन बॉन्ड और कार्बन क्रेडिट्स। राजमार्गों के दोनों ओर विकसित किए गए लाखों हेक्टेयर घने जंगलों को कार्बन सिंक के रूप में प्रमाणित किया जाता है।
राष्ट्रीय स्तर पर इन परियोजनाओं को 'वेरिफाइड कार्बन स्टैंडर्ड' (VCS) और 'गोल्ड स्टैंडर्ड' के तहत रजिस्टर कराया गया है। अनुमान के अनुसार, 10,000 किलोमीटर का ग्रीन हाईवे कॉरिडोर प्रति वर्ष लगभग 5 लाख टन CO2 का अवशोषण करता है। इससे अर्जित कार्बन राजस्व का सीधा उपयोग राजमार्गों पर सौर ऊर्जा से चलने वाले लाइटिंग सिस्टम और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) चार्जिंग हब बनाने में किया जाता है।
9. ग्रामीण स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के लिए रोजगार के अवसर
ग्रीन हाईवे केवल सरकारी योजना नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण आजीविका का बड़ा माध्यम बन चुका है। NHAI ने स्थानीय स्तर पर नर्सरी तैयार करने और पौधों की देखरेख का काम महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और स्थानीय ग्राम पंचायतों को सौंपने की नीति बनाई है:
- नर्सरी अनुबंध: स्थानीय SHGs को उन्नत किस्म के पौधों की पौध तैयार करने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता दी जाती है।
- ड्रिप इरिगेशन व मेंटेनेंस: हाईवे किनारे ड्रिप सिंचाई प्रणाली के संचालन और निराई-गुड़ाई के लिए स्थानीय श्रमिकों को नियमित रोजगार मिलता है।
- प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन: जिन समूहों के आवंटित क्षेत्र में पौधों का जीवित रहने का अनुपात 90% से अधिक रहता है, उन्हें वार्षिक बोनस प्रदान किया जाता है।
- अतिरिक्त आय: फलों वाले पेड़ों (जैसे जामुन, आंवला, बेर) की उपज का स्थानीय ग्रामीणों और महिला मंडलों को प्रसंस्करण व स्थानीय बाजार में बिक्री का अधिकार दिया जाता है।
10. हाईवे किनारे वर्षा जल संचयन व ड्रिप इरिगेशन तकनीक
पेड़ों को बारहमासी पानी उपलब्ध कराने और भूजल स्तर को सुधारने के लिए राजमार्ग के दोनों किनारों पर विशेष रेनवाटर हार्वेस्टिंग पिट्स (RWH) और ड्रेनेज चैनल्स बनाए गए हैं। सड़क से बहने वाले वर्षा जल को फिल्टर चैंबर्स के माध्यम से सीधे पौधों की जड़ों के पास पहुंचाया जाता है।
सौर ऊर्जा से संचालित स्वचालित ड्रिप इरिगेशन नेटवर्क द्वारा न्यूनतम पानी की बर्बादी के साथ हर पौधे तक नमी पहुंचाई जाती है। इससे सूखे के मौसम में भी पौधों के मरने की दर घटकर 5% से नीचे आ गई है।
11. नागरिक निगरानी और शिकायत निवारण प्रक्रिया
यदि किसी नागरिक को राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे अवैध रूप से पेड़ कटते हुए दिखाई दें या रोपे गए पौधे सूखे/उपेक्षित मिलें, तो वे निम्नलिखित माध्यमों से तुरंत शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके अलावा यदि आपके नजदीकी ग्राम क्षेत्र में किसी निजी बिल्डर या अवैध अतिक्रमणकारी द्वारा राजमार्ग की हरित पट्टी पर कब्जा किया जा रहा है, तो आप एनएचएआई विजिलेंस सेल को सीधे गोपनीय ईमेल द्वारा सूचित कर सकते हैं:
त्वरित सहायता एवं शिकायत चैनल:
- राजमार्गयात्रा (Rajmargyatra) मोबाइल ऐप: ऐप डाउनलोड करें > 'ग्रीन हाईवे फीडबैक' चुनें > जीपीएस लोकेशन और फोटो अपलोड करके सबमिट करें।
- NHAI केंद्रीय हेल्पलाइन: 1033 (टोल-फ्री, 24x7 उपलब्ध)।
- ईमेल सपोर्ट: grievance@nhai.org / greenhighways@morth.nic.in पर शिकायत भेजें।
- विजिलेंस सेल शिकायत: cvo@nhai.org (हरित पट्टी अतिक्रमण एवं अनियमितता)।
- निपटान समय-सीमा: NHAI के फील्ड इंजीनियर को 72 घंटे के भीतर साइट का निरीक्षण कर सुधारात्मक कार्रवाई रिपोर्ट अपलोड करनी होती है।