digital ⏱️ 15 मिनट 📅 2026-10-24 18:16:00

हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट होने पर क्या करें: 30 दिन में बीमा लोकपाल (Insurance Ombudsman) में ऑनलाइन शिकायत व ₹30 लाख तक मुआवजे के नियम

डॉ
डॉ. वंदना शर्मा (बीमा व कानूनी विशेषज्ञ)
वरिष्ठ डिजिटल संपादक

GoForDigitalIndia संपादकीय टीम — सरकारी योजनाओं, भर्ती व तकनीकी विषयों के विश्लेषक।

⚡ त्वरित उत्तर (Quick Answer)

यदि बीमा कंपनी आपका हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम खारिज कर दे, तो सबसे पहले बीमा कंपनी के ग्रीवेंस रिड्रेसल ऑफिसर (GRO) को लिखित री-कंसीडरेशन भेजें। यदि 30 दिन में समाधान न मिले या जवाब असंतोषजनक हो, तो आप बीमा लोकपाल (Insurance Ombudsman) पोर्टल (ciob.co.in) पर सीधे शिकायत दर्ज करा सकते हैं। बीमा लोकपाल एक अर्ध-न्यायिक संस्था है, जहां बिना किसी कोर्ट फीस या वकील के अधिकतम ₹30 लाख तक के क्लेम का निपटारा 30 से 90 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से किया जाता है। लोकपाल का फैसला बीमा कंपनी के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है।

OFFICIAL CHANNEL GoForDigitalIndia WhatsApp चैनल

सरकारी योजनाओं, नई भर्तियों, एडमिट कार्ड और रिजल्ट्स के ताज़ा अपडेट्स सबसे पहले अपने WhatsApp पर पाएं।

👉 चैनल से जुड़ें (Join WhatsApp)
विज्ञापन / SPONSORED

📌 मुख्य बातें (Key Takeaways - Claim Rejection & Ombudsman)

  • बिना कोर्ट फीस और बिना वकील न्याय: बीमा लोकपाल में शिकायत दर्ज कराने के लिए ₹1 की भी फीस नहीं लगती और न ही किसी वकील की आवश्यकता होती है।
  • ₹30 लाख तक का क्षेत्राधिकार: बीमा लोकपाल अधिकतम ₹30 लाख तक के बीमा विवादों (जिसमें ब्याज और मानसिक प्रताड़ना का हर्जाना शामिल है) पर फैसला दे सकता है।
  • कंपनी पर बाध्यकारी फैसला: बीमा लोकपाल द्वारा पारित किया गया आदेश (Award) बीमा कंपनी के लिए अनिवार्य और बाध्यकारी होता है, कंपनी इसके खिलाफ ऊपरी अपील नहीं कर सकती।
  • अनिवार्य पूर्व-शर्त: लोकपाल के पास जाने से पहले बीमा कंपनी के शिकायत निवारण अधिकारी (GRO) को लिखित शिकायत देना और 30 दिन का इंतजार करना वैधानिक रूप से अनिवार्य है।
  • दावा अस्वीकृति की समय सीमा: कंपनी के अंतिम अस्वीकृति पत्र (Rejection Letter) के 1 वर्ष के भीतर लोकपाल में शिकायत दर्ज की जानी चाहिए।

बीमा कंपनियां हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम क्यों रिजेक्ट करती हैं? (AEO Direct Answer)

भारत में स्वास्थ्य बीमा क्लेम खारिज होने के 80% से अधिक मामलों में बीमा कंपनियां तीन प्रमुख तर्कों का सहारा लेती हैं: पहला, 'गैर-प्रकटीकरण' (Non-Disclosure of Pre-Existing Disease - PED), जिसमें आरोप लगाया जाता है कि पॉलिसी लेते समय मरीज ने अपनी पुरानी बीमारी छिपाई थी; दूसरा, 'अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं थी' (Active Line of Treatment Absent / Investigation Only), जिसमें दावा किया जाता है कि मरीज केवल जांच या ओरल दवाओं के लिए भर्ती हुआ था; और तीसरा, 'पॉलिसी एक्सक्लूजन' (Specific Ailment Waiting Period / Excluded Treatments)। हालांकि, इनमें से बड़ी संख्या में रिजेक्शन गैर-कानूनी और मनमाने होते हैं। बीमा लोकपाल नियम 2017 (Insurance Ombudsman Rules 2017) के तहत आम नागरिकों को इन अनुचित अस्वीकृतियों को चुनौती देने और बिना किसी कानूनी खर्च के अपना पूरा क्लेम वापस पाने का सशक्त वैधानिक अधिकार दिया गया है।

आईआरडीएआई के 2024–2026 मास्टर सर्कुलर के अनुसार, यदि किसी पॉलिसीधारक ने लगातार 5 वर्षों (60 महीने) तक अपनी पॉलिसी बिना किसी ब्रेक के रिन्यू कराई है, तो इसे 'मोरेटोरियम पीरियड' (Moratorium Period) कहा जाता है। 5 वर्ष पूरे होने के बाद बीमा कंपनी साबित धोखाधड़ी (Proven Fraud) के अतिरिक्त किसी भी अन्य आधार पर क्लेम खारिज करने का कानूनी अधिकार पूरी तरह खो देती है। यदि कंपनी 5 साल पुरानी पॉलिसी पर पुरानी बीमारी का बहाना बनाकर क्लेम रिजेक्ट करती है, तो लोकपाल न केवल क्लेम पास करता है, बल्कि बैंक ब्याज दर से 2% अतिरिक्त ब्याज दिलाने का आदेश भी देता है।

अस्पताल के दस्तावेजों में 'केजुअल एंट्री' का खतरा

अधिकांश क्लेम रिजेक्शन अस्पताल के ड्यूटी डॉक्टर द्वारा मरीज की केस हिस्ट्री फाइल में लिखी गई कैजुअल लाइनों के कारण होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि मरीज को पेट दर्द के कारण भर्ती कराया गया और डॉक्टर ने केस शीट में लिख दिया "Patient has history of occasional alcohol or mild hypertension since 5 years", तो बीमा कंपनी का टीपीए इसे 'पुरानी बीमारी छिपाना' मानकर क्लेम तत्काल रिजेक्ट कर देता है, भले ही पेट दर्द का हाइपरटेंशन से कोई लेना-देना न हो। लोकपाल ऐसे मामलों में डॉक्टर के इस अनुमान को खारिज कर देता है, जब तक कि बीमा कंपनी यह साबित न कर दे कि मरीज ने पॉलिसी लेने से पहले उस बीमारी के लिए कोई सक्रिय दवा या अस्पताल में इलाज लिया था।

5-कॉलम तुलना तालिका: क्लेम निवारण के 4 कानूनी मंच (2026)

विज्ञापन / SPONSORED

क्लेम अटकने पर आपके पास कौन-कौन से कानूनी मंच उपलब्ध हैं, उनकी लागत, समय-सीमा और प्रभावशीलता का तुलनात्मक विवरण नीचे दिया गया है:

मंच / प्राधिकरण कानूनी अधिकार / फीस निपटारे की समय-सीमा अधिकतम वित्तीय सीमा फैसले की कानूनी बाध्यता
कंपनी का GRO (Grievance Officer) निःशुल्क, आंतरिक मंच 15 से 30 कार्य दिवस पॉलिसी सम इंश्योर्ड अनुसार कंपनी का आंतरिक निर्णय (अक्सर पक्षपाती)
IRDAI Bima Bharosa Portal निःशुल्क, सरकारी पोर्टल 15 से 30 दिन नियामक निगरानी मंच कंपनी पर दबाव बनाता है, न्यायिक शक्ति नहीं
बीमा लोकपाल (Insurance Ombudsman) 100% निःशुल्क, बिना वकील 30 से 90 दिन में अंतिम आदेश अधिकतम ₹30 लाख तक कंपनी पर 100% बाध्यकारी, अपील का अधिकार नहीं
उपभोक्ता आयोग (Consumer Court) कोर्ट फीस व वकील खर्च देय 1 से 3 वर्ष या अधिक जिला: ₹50L, राज्य: ₹2Cr दोनों पक्षों पर बाध्यकारी, उच्च अदालत में अपील संभव

⚠️ नागरिक सावधानी: कंज्यूमर कोर्ट जाने से पहले बीमा लोकपाल का रास्ता क्यों चुनें?

यदि आप सीधे उपभोक्ता अदालत (District Consumer Commission) में केस दायर कर देते हैं, तो कानूनन आप बीमा लोकपाल के पास नहीं जा सकते। कंज्यूमर कोर्ट में तारीखों का लंबा दौर चलता है और वकीलों की भारी फीस चुकानी पड़ती है। इसके विपरीत, बीमा लोकपाल में ₹1 भी खर्च नहीं होता, सुनवाई ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से घर बैठे हो जाती है और फैसला 3 महीने के भीतर आ जाता है। यदि लोकपाल का फैसला आपके पक्ष में न आए, तब भी आपके पास कंज्यूमर कोर्ट जाने का रास्ता खुला रहता है। इसलिए हमेशा पहला कदम बीमा लोकपाल ही होना चाहिए।

बीमा लोकपाल (Insurance Ombudsman) में शिकायत दर्ज कराने की चरणबद्ध SOP

यदि आपका क्लेम खारिज हो चुका है, तो इन 5 स्पष्ट चरणों का पालन करके अपना क्लेम बहाल कराएं:

  1. कदम 1: बीमा कंपनी के GRO को लिखित लीगल री-प्रेजेंटेशन भेजें: कंपनी के रिजेक्शन लेटर का बिंदुवार जवाब तैयार करें। अपने ट्रीटिंग डॉक्टर से एक स्पष्ट मेडिकल सर्टिफिकेट (Doctor's Certificate of Causation) बनवाएं, जिसमें प्रमाणित हो कि वर्तमान बीमारी का किसी पुरानी बीमारी से कोई संबंध नहीं है। इसे बीमा कंपनी के ग्रीवेंस ऑफिसर (GRO) को ई-मेल करें। पावती (Acknowledgment Ticket) संभालकर रखें।
  2. कदम 2: 30 दिन का अनिवार्य कूलिंग पीरियड पूरा होने दें: कानूनन आपको बीमा कंपनी को जवाब देने के लिए 30 दिन का समय देना होगा। यदि 30 दिन में कंपनी का कोई उत्तर न आए, या कंपनी दोबारा क्लेम खारिज करने का पत्र भेज दे, तो आपके लिए लोकपाल का दरवाजा तत्काल खुल जाता है।
  3. कदम 3: बीमा लोकपाल के आधिकारिक पोर्टल पर जाएं: काउंसिल फॉर इंश्योरेंस ओम्बड्समैन की आधिकारिक वेबसाइट https://www.ciob.co.in/ पर जाएं। 'Register Complaint Online' पर क्लिक करें। अपने राज्य और जिले के आधार पर संबंधित क्षेत्रीय लोकपाल कार्यालय (जैसे दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, चंडीगढ़, कोलकाता, अहमदाबाद आदि) का चयन करें।
  4. कदम 4: फॉर्म P-II और फॉर्म P-III के साथ दस्तावेज अपलोड करें: पोर्टल पर शिकायत का संक्षिप्त विवरण भरें और निम्नलिखित पीडीएफ दस्तावेज संलग्न करें:
    • बीमा पॉलिसी का पूरा बॉन्ड व शेड्यूल।
    • अस्पताल का मूल बिल, डिस्चार्ज समरी और जांच रिपोर्ट।
    • बीमा कंपनी का प्रारंभिक क्लेम रिजेक्शन लेटर।
    • GRO को भेजी गई शिकायत की ई-मेल प्रति व पावती।
    • डॉक्टर का स्पष्टीकरण पत्र कि अस्पताल में भर्ती होना चिकित्सकीय रूप से अपरिहार्य था।
  5. कदम 5: वर्चुअल हियरिंग (Online Hearing) में शामिल हों: लोकपाल कार्यालय आपको तारीख और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक भेजेगा। सुनवाई के दौरान लोकपाल के सामने शांत मन से केवल मेडिकल तथ्य रखें। बीमा कंपनी का कानूनी प्रतिनिधि भी वहां उपस्थित रहेगा। लोकपाल दोनों पक्षों को सुनकर 30 दिनों के भीतर अपना अंतिम अवार्ड (Order) जारी कर देगा।

लोकपाल द्वारा पारित अवार्ड (Award) का क्रियान्वयन कैसे होता है?

विज्ञापन / SPONSORED

बीमा लोकपाल नियम 2017 के नियम 17(6) के अनुसार, बीमा कंपनी को लोकपाल द्वारा पारित आदेश की प्रति प्राप्त होने के ठीक 30 दिनों के भीतर स्वीकृत धनराशि सीधे पॉलिसीधारक के बैंक खाते में एनईएफटी (NEFT) द्वारा ट्रांसफर करनी अनिवार्य है। यदि कंपनी 30 दिनों के भीतर भुगतान करने में विफल रहती है, तो आईआरडीएआई कंपनी के लाइसेंस पर दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है और बैंक की मौजूदा एमसीएलआर (MCLR) दर से 2% अतिरिक्त दंडात्मक ब्याज मरीज को दिलाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बीमा कंपनी को लोकपाल के फैसले के खिलाफ किसी भी अदालत में अपील करने का अधिकार भारतीय कानून में नहीं दिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (PAA FAQs - Ombudsman Claims)

Q1. क्या बीमा लोकपाल में शिकायत करने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित है?

हाँ। बीमा कंपनी द्वारा क्लेम खारिज किए जाने की तारीख से अधिकतम 1 वर्ष (365 दिन) के भीतर आपको बीमा लोकपाल के पास शिकायत दर्ज करानी होगी। यदि 1 वर्ष से अधिक समय बीत जाए, तो लोकपाल मामले को तभी स्वीकार करेगा जब आपके पास देरी का कोई अत्यधिक ठोस चिकित्सीय या अपरिहार्य कारण हो।

Q2. क्या बीमा लोकपाल मानसिक प्रताड़ना और ब्याज का मुआवजा भी दिला सकता है?

हाँ। बीमा लोकपाल न केवल आपके मूल मेडिकल बिल को पास करता है, बल्कि अनुचित देरी के लिए पॉलिसीधारक को ब्याज और मानसिक कष्ट के लिए उपयुक्त हर्जाना (Compensation) देने का भी आदेश दे सकता है। कुल अवार्ड की अधिकतम सीमा ₹30 लाख तक हो सकती है।

Q3. क्या पॉलिसीधारक को व्यक्तिगत रूप से लोकपाल कार्यालय जाना पड़ता है?

नहीं। कोविड के बाद से बीमा लोकपाल की लगभग 95% से अधिक कार्यवाहियां ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Google Meet / Webex) के माध्यम से आयोजित की जाती हैं। आप अपने घर बैठे मोबाइल या लैपटॉप से सीधे लोकपाल के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं।

Q4. अगर बीमा कंपनी यह कहे कि 'मरीज केवल जांच के लिए भर्ती हुआ था' तो क्या करें?

ऐसे मामलों में अपने ट्रीटिंग कंसल्टेंट से एक 'एक्टिव लाइन ऑफ ट्रीटमेंट' सर्टिफिकेट बनवाएं, जिसमें साफ लिखा हो कि मरीज को इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन, आईवी फ्लूइड, ऑक्सीजन सपोर्ट या 24 घंटे लगातार मेडिकल मॉनिटरिंग की आवश्यकता थी और यह उपचार ओपीडी (घर पर) संभव नहीं था। यह प्रमाण प्रस्तुत करते ही लोकपाल क्लेम पास कर देता है।

Q5. क्या कैशलेस डिनायल (Denial) के खिलाफ भी लोकपाल में जा सकते हैं?

कैशलेस सुविधा का इनकार तकनीकी रूप से क्लेम का अंतिम रिजेक्शन नहीं माना जाता। यदि अस्पताल में कैशलेस न मिले, तो पहले अपनी जेब से बिल चुकाकर कंपनी में रीइंबर्समेंट फाइल करें। यदि कंपनी रीइंबर्समेंट क्लेम को भी रिजेक्ट कर देती है, तब आप तत्काल लोकपाल में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

Q6. अगर लोकपाल का फैसला हमारे पक्ष में न आए तो क्या रास्ता बचता है?

लोकपाल का फैसला बीमा कंपनी के लिए तो 100% बाध्यकारी होता है, लेकिन ग्राहक के लिए बाध्यकारी नहीं है। यदि आप लोकपाल के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, तो आप उसे स्वीकार करने से इनकार कर सकते हैं और उसके बाद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Consumer Court) अथवा सिविल कोर्ट में जा सकते हैं।

वास्तविक केस स्टडी: हाइपरटेंशन छिपाने के नाम पर ₹4,20,000 का क्लेम रिजेक्ट, लोकपाल ने दिलाया पूरा पैसा व 9% ब्याज

बीमा कंपनियों द्वारा किस तरह मनमाने तरीके से क्लेम खारिज किए जाते हैं और बीमा लोकपाल किस तरह आम नागरिकों को त्वरित न्याय दिलाता है, इसे दिल्ली ओम्बड्समैन कार्यालय के एक ऐतिहासिक मामले से समझा जा सकता है।

श्री अशोक मल्होत्रा (उम्र 52 वर्ष) ने 2021 में एक प्रमुख निजी साधारण बीमा कंपनी से ₹10 लाख की फ्लोटर पॉलिसी खरीदी थी। 2025 में उन्हें तीव्र छाती दर्द के कारण आपातकालीन स्थिति में अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी एंजियोप्लास्टी की गई। कुल अस्पताल बिल ₹4,20,000 का बना। बीमा कंपनी के टीपीए ने यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि अस्पताल के इंडोर केस रिकॉर्ड में रेजिडेंट डॉक्टर ने लिखा था "Patient has mild BP history since 6 years", जबकि पॉलिसी लेते समय प्रपोजल फॉर्म में मरीज ने किसी पुरानी बीमारी का उल्लेख नहीं किया था।

मंच / चरण बीमा कंपनी का तर्क पॉलिसीधारक का पक्ष बीमा लोकपाल का कानूनी निष्कर्ष अंतिम परिणाम व अवार्ड
प्रारंभिक क्लेम रिजेक्शन पॉलिसी लेते समय हाइपरटेंशन छिपाया गया (Non-Disclosure of PED) मरीज ने कभी बीपी की नियमित दवा नहीं ली थी, कोई मेडिकल रिकॉर्ड नहीं था ड्यूटी डॉक्टर की कैजुअल एंट्री बिना पूर्व प्रिस्क्रिप्शन के साक्ष्य नहीं बन सकती कंपनी का रिजेक्शन लेटर अवैध घोषित
GRO अपील स्तर कंपनी ने अपने आंतरिक डॉक्टरों की रिपोर्ट का हवाला देकर क्लेम दोबारा खारिज किया ट्रीटिंग कार्डियोलॉजिस्ट का सर्टिफिकेट दिया कि हार्ट अटैक एक तात्कालिक घटना थी कंपनी का आंतरिक निवारण तंत्र स्वतंत्र रूप से निष्पक्ष नहीं पाया गया मामला लोकपाल में जाने के लिए परिपक्व हुआ
लोकपाल ऑनलाइन सुनवाई प्रपोजल फॉर्म में झूठ बोलना अनुबंध को शून्य (Void) बनाता है बीमा कंपनी पॉलिसी जारी करते समय मेडिकल चेकअप करने में विफल रही थी सुप्रीम कोर्ट के 'Manmohan Nanda v. United India' फैसले का संदर्भ लागू हुआ पॉलिसीधारक के पक्ष में पूर्ण अवार्ड जारी
अंतिम अवार्ड (Final Order) कंपनी को 30 दिन में संपूर्ण भुगतान का आदेश मूल बिल ₹4,20,000 + 9% वार्षिक ब्याज + ₹25,000 मानसिक क्षतिपूर्ति निर्णय कंपनी पर कानूनी रूप से अंतिम व बाध्यकारी रहा कुल ₹4,78,000 सीधे बैंक खाते में क्रेडिट

बीमा लोकपाल में अपनी शिकायत को 100% मजबूत बनाने के लिए कानूनी चेकलिस्ट

जब आप बीमा लोकपाल के पास जाते हैं, तो आपकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आपने अपने कागजात कितने व्यवस्थित और कानूनी रूप से अचूक रखे हैं। लोकपाल के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए निम्नलिखित 6 दस्तावेजों की फाइल अनिवार्य रूप से तैयार करें:

  1. मूल पॉलिसी बॉन्ड और प्रपोजल फॉर्म की प्रति: अपनी बीमा पॉलिसी के सभी नियम-शर्तें (Terms and Conditions booklet) और वह प्रपोजल फॉर्म जो आपने पॉलिसी लेते समय भरा था। यदि एजेंट ने फॉर्म भरा था और आपके हस्ताक्षर लिए थे, तो यह बात अपनी शिकायत में स्पष्ट लिखें।
  2. अस्पताल का संपूर्ण इंडोर केस पेपर (ICP): केवल डिस्चार्ज समरी काफी नहीं होती। अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड डिपार्टमेंट (MRD) से अपने पूरे केस की प्रमाणित फोटोकॉपी (Indoor Case Papers with Doctor's Daily Notes) निकलवाएं। इसमें साबित होता है कि मरीज को कब और किस स्थिति में क्या दवा दी गई।
  3. ट्रीटिंग डॉक्टर का कॉजेशन सर्टिफिकेट (Certificate of Causation): अपने मुख्य डॉक्टर से एक लिखित पत्र लें जिस पर अस्पताल की मुहर हो। उसमें साफ लिखा होना चाहिए कि जिस बीमारी का इलाज हुआ है, उसका मरीज के किसी पुराने लाइफस्टाइल डिसऑर्डर (जैसे हल्का बीपी या थाइराइड) से कोई सीधा संबंध नहीं था।
  4. कंपनी के GRO को भेजा गया ई-मेल और पावती: आपके द्वारा बीमा कंपनी के शिकायत निवारण अधिकारी को भेजे गए पत्र की तारीख और उसका पावती नंबर (Complaint Token Number)। यह साबित करता है कि आपने 30 दिन का कानूनी समय दिया है।
  5. खर्चों की प्रमाणित तालिका (Schedule of Expenses): एक सरल तालिका बनाएं जिसमें अस्पताल बिल, दवाइयों की रसीदें, एम्बुलेंस का खर्च और प्री-हॉस्पिटलाइजेशन जांचों का अलग-अलग ब्योरा हो, ताकि लोकपाल को कुल क्लेम राशि निर्धारित करने में एक मिनट का भी समय न लगे।
  6. बैंक खाता विवरण व कैंसिल्ड चेक: अवार्ड पास होते ही सीधे आपके खाते में राशि ट्रांसफर होने के लिए अपना कैंसिल्ड चेक और बैंक पासबुक की प्रति संलग्न करें।

बीमा कंपनी के GRO को भेजने के लिए कानूनी शिकायत पत्र का प्रारूप (Sample E-mail Draft)

बीमा लोकपाल जाने से पूर्व बीमा कंपनी के शिकायत निवारण अधिकारी (Grievance Redressal Officer - GRO) को एक ठोस और तथ्यपरक ई-मेल भेजना अनिवार्य होता है। आप नीचे दिए गए कानूनी प्रारूप का उपयोग कर सकते हैं:

विषय: Re-consideration Request for Rejected Health Insurance Claim (Claim No: [आपका क्लेम नंबर]) - Policy No: [आपकी पॉलिसी संख्या]

महोदय,

मैं, [आपका नाम], आपकी कंपनी की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी संख्या [पॉलिसी नंबर] का पॉलिसीधारक हूँ। मुझे दिनांक [तारीख] को अस्पताल [अस्पताल का नाम] में [बीमारी का नाम] के इलाज हेतु भर्ती कराया गया था। अत्यंत खेद का विषय है कि आपके टीपीए द्वारा मेरा क्लेम यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि 'यह बीमारी पॉलिसी लेने से पूर्व की है' (Pre-existing condition)।

इस संबंध में मैं निम्नलिखित अकाट्य तथ्य आपके संज्ञान में लाना चाहता हूँ:
1. अस्पताल के इंडोर केस रिकॉर्ड में रेजिडेंट डॉक्टर द्वारा दर्ज की गई टिप्पणी केवल एक अनौपचारिक मौखिक बातचीत पर आधारित थी। मरीज का इस बीमारी के लिए पॉलिसी लेने से पूर्व कभी कोई सक्रिय इलाज या अस्पताल में भर्ती होने का इतिहास नहीं रहा है।
2. मेरे मुख्य उपचारक चिकित्सक (Treating Consultant) ने स्पष्ट रूप से 'Certificate of Medical Necessity' जारी किया है, जो यह प्रमाणित करता है कि वर्तमान बीमारी एक आकस्मिक चिकित्सीय स्थिति थी, जिसका किसी पूर्ववर्ती विकार से कोई सीधा चिकित्सीय संबंध नहीं है।
3. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 'मनमोहन नंदा बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस' मामले में स्पष्ट व्यवस्था दी है कि बिना पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्य के केवल अनुमान के आधार पर क्लेम खारिज करना सेवा में घोर कमी है।

अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि मेरे क्लेम की फाइल को री-ओपन करके 15 दिनों के भीतर स्वीकृत राशि का भुगतान करने की कृपा करें। यदि 15 दिनों के भीतर मुझे संतोषजनक समाधान प्राप्त नहीं होता है, तो मैं इस प्रकरण को समस्त साक्ष्यों सहित बीमा लोकपाल (Insurance Ombudsman) के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए बाध्य होऊँगा।

भवदीय,
[आपका नाम]
[मोबाइल नंबर व पता]
संलग्नक: डॉक्टर सर्टिफिकेट, डिस्चार्ज समरी व पॉलिसी बॉन्ड

माननीय सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय आयोग के 3 ऐतिहासिक फैसले जो उपभोक्ता को सुरक्षा देते हैं

जब आप बीमा कंपनी या लोकपाल से संवाद करते हैं, तो भारत की सर्वोच्च अदालतों के इन तीन ऐतिहासिक निर्णयों का संदर्भ आपकी शिकायत को कानूनी रूप से अजेय बना देता है:

  1. मनमोहन नंदा बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी (Supreme Court of India, 2021): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट फैसला दिया कि यदि बीमा कंपनी ने पॉलिसी जारी करते समय ग्राहक का मेडिकल परीक्षण नहीं कराया था, तो बाद में क्लेम के समय वह यह बहाना नहीं बना सकती कि मरीज ने कोई सामान्य लाइफस्टाइल समस्या नहीं बताई थी। कंपनी का कर्तव्य है कि वह पॉलिसी बेचते समय ही जांच करे।
  2. सुलभा प्रकाश बनाम लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (Supreme Court of India): शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी कि यदि किसी व्यक्ति को सामान्य हाइपरटेंशन या हल्का डायबिटीज है, तो इसे तब तक गंभीर 'Pre-Existing Disease' नहीं माना जा सकता जब तक कि यह साबित न हो जाए कि मरीज इसके कारण किसी अंग विफलता (Organ Failure) से पीड़ित था।
  3. हरि ओम बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस (NCDRC New Delhi): राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने फैसला सुनाया कि अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर द्वारा केस हिस्ट्री में लिखी गई कोई भी लाइन तब तक कानूनी सबूत नहीं मानी जा सकती जब तक कि बीमा कंपनी पॉलिसी लेने से पूर्व की उस बीमारी की वास्तविक डॉक्टर की पर्ची और मेडिकल बिल पेश न कर दे।
विज्ञापन / SPONSORED

क्या यह जानकारी आपके लिए उपयोगी रही?

अपने दोस्तों, परिजनों और ग्रुप्स में इस महत्वपूर्ण जानकारी को तुरंत शेयर करें:

💬 WhatsApp पर शेयर करें 📢 चैनल जॉइन करें
💬 WhatsApp शेयर 🔔 WhatsApp चैनल जॉइन करें