डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) क्या है और यह खतरनाक सिंडिकेट कैसे काम करता है?
त्वरित उत्तर: डिजिटल अरेस्ट एक अत्यंत परिष्कृत और मनोवैज्ञानिक रूप से भयाक्रांत करने वाला साइबर फ्रॉड है, जिसमें ठग पुलिस अधिकारी, सीबीआई डायरेक्टर, कस्टम्स कमिश्नर या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बनकर नागरिकों को वीडियो कॉल करते हैं। वे पीड़ित पर मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग तस्करी या देशद्रोह का झूठा आरोप लगाते हैं और गिरफ्तारी व बदनामी का डर दिखाकर घंटों या दिनों तक वीडियो कॉल पर 'कमरे में बंद' (कैद) रखते हैं, जब तक कि पीड़ित अपनी सारी जमा पूंजी उनके बताए बैंक खातों में ट्रांसफर न कर दे।
गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के अनुसार, इस सिंडिकेट का संचालन अक्सर दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (कंबोडिया, म्यांमार, लाओस) में बैठे चीनी सिंडिकेट द्वारा किया जाता है। वे पीड़ित को डराने के लिए बैकग्राउंड में हूबहू असली जैसा दिखने वाला पुलिस स्टेशन का सेट, वायरलेस सेट की आवाजें, खाकी वर्दी, फर्जी वारंट और सुप्रीम कोर्ट के जाली लेटरहेड का इस्तेमाल करते हैं।
⚠️ कानून का सीधा सच: भारत में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी कोई व्यवस्था नहीं है!
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35 और 36 के अनुसार किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए पुलिस अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ता है, अपनी पहचान और वर्दी पर नेमप्लेट दिखानी होती है, लिखित में 'गिरफ्तारी का मेमो' (Arrest Memo) तैयार करना होता है और परिवार के सदस्य को तत्काल सूचना देनी होती है। वीडियो कॉल पर कमरे में बंद रहने का हुक्म देना 100% गैर-कानूनी और फर्जी है।
डिजिटल अरेस्ट सिंडिकेट की 5-चरणीय धोखाधड़ी की कार्यप्रणाली (Modus Operandi)
नीचे दी गई तालिका से समझें कि ठग किस तरह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर सामान्य पढ़े-लिखे लोगों और सेवानिवृत्त अधिकारियों को अपना शिकार बनाते हैं:
| चरण (Stage) | ठगों का फर्जी दावा / स्वांग | पीड़ित की मनोवैज्ञानिक स्थिति | ठगों की मांग (Demand) | बचाव का सही कदम |
|---|---|---|---|---|
| चरण 1: पार्सल व कस्टम्स का झांसा | फेडेक्स/डीएचएल से आपके आधार पर ताइवान ड्रग्स पार्सल का दावा | आश्चर्य, भ्रम और घबराहट | 'हम आपकी कॉल मुंबई क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर रहे हैं' | तुरंत फोन काटें; कूरियर कंपनी कभी पुलिस नहीं जोड़ती |
| चरण 2: फर्जी पुलिस/सीबीआई वीडियो कॉल | स्काइप या व्हाट्सएप पर वर्दीधारी पुलिस अधिकारी का सेटअप | अत्यधिक भय और सामाजिक प्रतिष्ठा खोने का डर | 'कमरा बंद करें, किसी को न बताएं, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है' | कैमरा ऑफ करें और कॉल डिस्कनेक्ट करें |
| चरण 3: सुप्रीम कोर्ट का जाली अरेस्ट वारंट | मुख्य न्यायाधीश के फर्जी हस्ताक्षर वाला मनी लॉन्ड्रिंग अरेस्ट वारंट | सहम जाना, सोचने-समझने की क्षमता खत्म होना | 'आपको 72 घंटे के डिजिटल अरेस्ट में रखा जाता है' | वारंट का कानूनी अध्ययन: कोर्ट कभी व्हाट्सएप पर वारंट नहीं भेजती |
| चरण 4: 'सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट' में फंड ट्रांसफर | 'आरबीआई का सिक्योर अकाउंट है, जांच के बाद 30 मिनट में पैसा वापस मिलेगा' | परिवार व करियर बचाने की अंतिम मजबूरी | एफडी तुड़वाकर या बैंक से आरटीजीएस द्वारा लाखों रुपये ट्रांसफर कराना | एक भी रुपया न भेजें; बैंक में जाकर मैनेजर से बात करें |
| चरण 5: पैसे मिलते ही नंबर ब्लॉक | पैसे आते ही कॉल काटना और चैट हिस्ट्री डिलीट कर देना | ठगी का गहरा अहसास और अवसाद | संपर्क पूरी तरह काट देना | तुरंत 1930 पर कॉल करें और बैंक को सूचित करें |
यदि कोई आपको वीडियो कॉल पर डिजिटल अरेस्ट की धमकी दे, तो अपनाएं यह 5-चरणीय SOP
जैसे ही आपके फोन पर ऐसा कोई कॉल आए, बिना विचलित हुए नीचे दिए गए चरणों का कड़ाई से पालन करें:
- स्टेप 1 (चरण 1) - तुरंत कॉल डिस्कनेक्ट करें और नंबर ब्लॉक करें: किसी भी तथाकथित पुलिस अधिकारी या सीबीआई अधिकारी से बहस करने की जरूरत नहीं है। बस एक वाक्य कहें: 'यदि मेरे खिलाफ कोई केस है, तो मुझे कानूनी डाक से नोटिस भेजिए या मेरे स्थानीय थाने की पुलिस को भेजिए', और तुरंत फोन काट दें।
- स्टेप 2 (चरण 2) - अपने परिवार और विश्वस्त मित्रों को बताएं: ठगों की सबसे बड़ी ताकत आपका अकेलापन और गोपनीयता होती है। वे बार-बार कहते हैं कि 'किसी को मत बताना'। कमरे से बाहर निकलें, अपने परिवार के सदस्यों, बच्चों या पड़ोसियों को पूरी बात बताएं। जैसे ही आप किसी दूसरे व्यक्ति को बताएंगे, आपका डर 90% तुरंत खत्म हो जाएगा।
- स्टेप 3 (चरण 3) - स्थानीय पुलिस स्टेशन जाकर पुष्टि करें: अपने शहर के नजदीकी थाने में जाएं और ड्यूटी अधिकारी को कॉल और नंबर दिखाएं। पुलिस तुरंत आपको आश्वस्त करेगी कि यह पूरी तरह फर्जी है और आपके खिलाफ कोई वारंट या शिकायत नहीं है।
- स्टेप 4 (चरण 4) - गृह मंत्रालय की हेल्पलाइन 1930 और चक्षु (Chakshu) पर रिपोर्ट करें: दूरसंचार विभाग के Chakshu Portal (sancharsaathi.gov.in) पर उस फोन नंबर की रिपोर्ट करें ताकि उस नंबर और मोबाइल हैंडसेट को पूरे देश में हमेशा के लिए ब्लॉक किया जा सके। साथ ही 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं।
- स्टेप 5 (चरण 5) - बैंक से किसी भी हाल में पैसा ट्रांसफर न करें: याद रखें, भारत का कोई भी सरकारी विभाग (आरबीआई, सेबी, सीबीआई, पुलिस) कभी भी नागरिकों से उनके पैसे की जांच के लिए किसी दूसरे बैंक खाते में फंड ट्रांसफर करने की मांग नहीं करता। यह दावा 100% फर्जीवाड़े की निशानी है।
🏛️ कानून के तहत पुलिस जांच का वास्तविक नियम (BNSS Section 35 & 47)
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत यदि किसी नागरिक से किसी भी अपराध के सिलसिले में पूछताछ करनी होती है, तो पुलिस अधिकारी को धारा 35(3) BNSS के तहत पहले एक मुद्रित एवं हस्ताक्षरित नोटिस डाक द्वारा या स्थानीय पुलिस के जरिए तामील कराना होता है। नोटिस में स्पष्ट रूप से पूछताछ की तारीख, समय और पुलिस स्टेशन का पता लिखा होता है। वीडियो कॉल पर अरेस्ट करना पूरी तरह गैर-कानूनी और दंडनीय कृत्य है।
गृह मंत्रालय (MHA) की आधिकारिक एडवाइजरी के मुख्य बिंदु
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने देश के सभी नागरिकों के लिए व्यापक सार्वजनिक एडवाइजरी जारी की है:
- आई4सी (I4C) का स्पष्टीकरण: केंद्रीय एजेंसियां जैसे सीबीआई, ईडी, कस्टम्स या राज्य पुलिस बल कभी भी स्काइप (Skype), व्हाट्सएप (WhatsApp), सिग्नल या टेलीग्राम पर 'वीडियो सर्विलांस' या 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती हैं।
- फर्जी स्काइप आईडी की पहचान: ठग अक्सर 'cbi_investigation_hq', 'mumbai_police_cell' जैसी फर्जी यूजर आईडी बनाते हैं। सरकारी एजेंसियां कभी भी निजी मैसेंजिंग ऐप्स के जरिए आधिकारिक जांच संचालित नहीं करतीं।
- कूरियर फ्रॉड की हकीकत: फेडेक्स या कोई भी निजी लॉजिस्टिक कंपनी कभी भी सीमा शुल्क (Customs) या नारकोटिक्स विभाग के मामलों में ग्राहकों को सीधे फोन करके पुलिस से कनेक्ट नहीं कराती। यह एक संगठित स्क्रिप्ट है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs - PAA)
1. क्या पुलिस वास्तव में मुझे स्काइप या व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर गिरफ्तार कर सकती है?
बिल्कुल नहीं। भारत के किसी भी कानून में वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी (Digital Arrest) का कोई प्रावधान नहीं है। किसी भी कानूनी प्रक्रिया में गिरफ्तारी केवल भौतिक रूप से (Physically) व्यक्ति के सामने उपस्थित होकर और वारंट दिखाकर ही की जा सकती है। वीडियो कॉल पर अरेस्ट करने का दावा करने वाला व्यक्ति शत-प्रतिशत साइबर ठग है।
2. ठगों के पास मेरा सही नाम, आधार नंबर और पता कैसे था?
आजकल विभिन्न निजी वेबसाइटों, होटल बुकिंग, ई-कॉमर्स पोर्टल्स या पुराने डेटा लीक के कारण डार्क वेब पर लोगों के नाम, पते और आधार नंबर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। ठग इसी लीक हुए डेटा का इस्तेमाल आपका विश्वास जीतने और आपको यह विश्वास दिलाने के लिए करते हैं कि वे सचमुच सरकारी अधिकारी हैं।
3. अगर मैं डरकर पैसे ट्रांसफर कर चुका हूं, तो क्या वह पैसा वापस मिल सकता है?
यदि पैसे ट्रांसफर करने के पहले 1 से 2 घंटे के भीतर (गोल्डन ऑवर) आपने 1930 पर कॉल कर दी और अपने बैंक को तुरंत सूचित कर दिया, तो उस खाते को फ्रीज करके 70% से 90% तक फंड रिकवर होने की पूरी संभावना होती है। इसके अलावा बैंक के नोडल अधिकारी और साइबर सेल में लिखित शिकायत देकर मजिस्ट्रेट के आदेश से फंड रिफंड कराया जा सकता है।
4. क्या ठग मेरे घर पर स्थानीय पुलिस को भेज सकते हैं?
नहीं। चूंकि ठग खुद अपराधी होते हैं और अक्सर भारत से बाहर कंबोडिया या म्यांमार में बैठे होते हैं या देश के किसी दूसरे राज्य से कॉल कर रहे होते हैं, उनका स्थानीय पुलिस से कोई संबंध नहीं होता। वे केवल आपका मानसिक डर भुनाते हैं। जैसे ही आप स्थानीय पुलिस स्टेशन जाने की बात कहेंगे, वे तुरंत फोन काट देंगे।
5. वे मुझे सुप्रीम कोर्ट का अरेस्ट वारंट और सीलबंद पत्र दिखाते हैं, क्या वे असली होते हैं?
वे सभी दस्तावेज फोटोशॉप और फर्जी ग्राफिक्स से तैयार किए गए जाली पत्र होते हैं। सुप्रीम कोर्ट या कोई भी अदालत कभी भी किसी आरोपी या गवाह को व्हाट्सएप या ईमेल पर 'अरेस्ट वारंट' नहीं भेजती। अदालती समन और वारंट हमेशा पुलिस कर्मियों द्वारा व्यक्तिगत रूप से घर पर तामील कराए जाते हैं।
6. अगर वीडियो कॉल पर मेरा चेहरा रिकॉर्ड कर लिया गया है, तो क्या वे मुझे ब्लैकमेल कर सकते हैं?
कई बार लोग डरते हैं कि वीडियो कॉल पर उनका चेहरा दिखने से कोई गलत काम न हो जाए। घबराएं नहीं। तुरंत 1930 पर इस घटना की शिकायत दर्ज कराएं और नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (cybercrime.gov.in) पर उस नंबर और स्क्रीनशॉट को अपलोड करें। पुलिस रिकॉर्ड में शिकायत दर्ज होने के बाद आपके खिलाफ किसी भी दुरुपयोग की कानूनी जिम्मेदारी शून्य हो जाती है।
🏛️ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35, 36 व 47: गिरफ्तारी के अनिवार्य कानूनी नियम
देश के हर नागरिक को यह जानना चाहिए कि भारत का कानून किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी के संबंध में क्या सुरक्षा उपाय प्रदान करता है:
- धारा 35 BNSS (गिरफ्तारी की प्रक्रिया): पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी के समय अपनी वर्दी पर स्पष्ट, दृश्यमान और सटीक पहचान (नाम का बैज) धारण करना अनिवार्य है। गिरफ्तारी की सभी कार्यवाहियां भौतिक रूप से साक्षी की उपस्थिति में की जाती हैं।
- धारा 36 BNSS (अधिकारों की जानकारी): गिरफ्तार किए जा रहे व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तारी के आधार और जमानत के उसके अधिकार की जानकारी देना पुलिस का विधिक कर्तव्य है।
- धारा 47 BNSS (रिश्तेदारों को अनिवार्य सूचना): गिरफ्तारी होते ही पुलिस स्टेशन के भारसाधक अधिकारी को उस व्यक्ति के नामित परिजन या मित्र को तुरंत टेलीफोन या संदेश द्वारा औपचारिक सूचना देनी होती है।
- 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी: संविधान के अनुच्छेद 22(2) और BNSS के अनुसार, किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर नजदीकी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष शारीरिक रूप से पेश करना अनिवार्य है।
उपरोक्त किसी भी विधिक सिद्धांत में 'वीडियो कॉल पर कमरे में बंद रखने' या 'स्काइप पर डिजिटल अरेस्ट' का कोई उल्लेख नहीं है। यह पूरी तरह से ठगों का मनगढ़ंत और काल्पनिक स्वांग है।
🔎 कंबोडिया और म्यांमार सिंडिकेट का तकनीकी सच: फर्जी स्टूडियो और वीपीएन
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की उच्चस्तरीय जांच में सामने आया है कि इस सिंडिकेट के तार दक्षिण-पूर्व एशिया के 'कॉल सेंटर कैम्पसों' से जुड़े हैं:
- स्टेप 1 (चरण 1) - नौकरी के नाम पर तस्करी: भारत के बेरोजगार आईटी युवाओं को डेटा एंट्री और कस्टमर सपोर्ट की नौकरी का झांसा देकर थाईलैंड बुलाया जाता है, जहां से उनका पासपोर्ट छीनकर अवैध रूप से कंबोडिया या म्यांमार की सीमाओं में बंधक बना लिया जाता है।
- स्टेप 2 (चरण 2) - फर्जी पुलिस थानों का स्टूडियो: इन कैम्पसों में बड़े-बड़े हॉल होते हैं जहां विभिन्न भारतीय राज्यों (मुंबई क्राइम ब्रांच, दिल्ली स्पेशल सेल, सीबीआई मुख्यालय) के बैकड्रॉप, राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ, खाकी वर्दी और वायरलेस सेट के साथ हाई-डेफिनिशन वेबकैम लगाए जाते हैं।
- स्टेप 3 (चरण 3) - वीपीएन और वीओआईपी कॉलिंग: ठग वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) और वीओआईपी गेटवे का उपयोग करके कॉल करते हैं, जिससे उनके फोन नंबर पर +91 या स्थानीय भारतीय नंबर प्रदर्शित होता है (Caller ID Spoofing)।
- स्टेप 4 (चरण 4) - मनोवैज्ञानिक शोषण: ठगों के पास मनोवैज्ञानिक स्क्रिप्ट्स होती हैं। वे पीड़ित की आवाज में थोड़ा सा भी डर भांपते ही अपनी आवाज तेज कर देते हैं और कहते हैं कि 'यदि आपने एक मिनट के लिए भी कैमरा बंद किया तो हम आपके घर SWAT टीम भेज देंगे'।
📝 पुलिस अधीक्षक / साइबर सेल को लिखित शिकायत का आधिकारिक ड्राफ्ट
यदि आपके साथ ऐसा कोई प्रयास हुआ है, तो नीचे दिए गए प्रारूप में अपने जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) या साइबर क्राइम सेल को आवेदन सौंपें:
सेवा में, पुलिस अधीक्षक (साइबर अपराध शाखा), [जिले का नाम, राज्य] विषय: फर्जी सीबीआई/पुलिस अधिकारी बनकर वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' एवं जबरन वसूली के प्रयास की शिकायत। महोदय, सादर निवेदन है कि मैं [आपका पूरा नाम], निवासी [स्थानीय पता], दिनांक [तारीख] को समय लगभग [समय] बजे अपने आवास पर मौजूद था। उसी समय मेरे मोबाइल नंबर [XXXXXXXXXX] पर एक अज्ञात नंबर [+XX XXXXXXXXXX] से व्हाट्सएप/स्काइप कॉल प्राप्त हुई। कॉलर ने स्वयं को सीबीआई/मुंबई पुलिस का वरिष्ठ अधिकारी बताते हुए दावा किया कि मेरे आधार कार्ड से ताइवान अवैध पार्सल भेजा गया है। उन्होंने वीडियो कॉल पर खाकी वर्दी पहन रखी थी और मुझे सुप्रीम कोर्ट का जाली अरेस्ट वारंट दिखाकर कमरे में बंद रहने और बैंक खाते से ₹[रकम] सुरक्षा डिपॉजिट के रूप में ट्रांसफर करने का दबाव बनाया। मैंने सतर्कता बरतते हुए तुरंत कॉल डिस्कनेक्ट कर दी और कोई फंड ट्रांसफर नहीं किया। अतः आपसे निवेदन है कि: 1. उक्त मोबाइल नंबर, व्हाट्सएप प्रोफाइल एवं स्काइप आईडी के विरुद्ध BNS एवं IT Act के तहत सुसंगत धाराओं में प्राथमिक दर्ज की जाए। 2. उक्त नंबर को दूरसंचार विभाग (DoT) के सहयोग से राष्ट्रीय स्तर पर ब्लैकलिस्ट किया जाए। संलग्नक: - वीडियो कॉल स्क्रीनशॉट - फर्जी वारंट की कॉपी - मोबाइल कॉल लॉग भवदीय, [हस्ताक्षर] [नाम एवं संपर्क सूत्र]
👵 सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिकों और महिलाओं को निशाना बनाने की मनोवैज्ञानिक रणनीति
साइबर फॉरेंसिक प्रोफाइलिंग से यह उजागर हुआ है कि डिजिटल अरेस्ट सिंडिकेट मुख्य रूप से 60 वर्ष से अधिक आयु के पेंशनभोगियों, अकेली रहने वाली महिलाओं और प्रतिष्ठित डॉक्टरों या प्रोफेसरों को टारगेट करता है:
- प्रतिष्ठा की संवेदनशीलता: जीवन भर निष्कलंक सेवा देने वाले सम्मानित वरिष्ठ नागरिक पुलिस या कोर्ट के नाम से अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। ठग इसी सामाजिक सम्मान को हथियार बनाकर कहते हैं कि 'यदि आपने सहयोग नहीं किया तो आपकी पेंशन बंद कर दी जाएगी और मोहल्ले में पुलिस की गाड़ी सायरन बजाते हुए आएगी'।
- डिजिटल जानकारी का अभाव: बुजुर्गों को अक्सर वीओआईपी कॉलिंग, स्क्रीन शेयरिंग और यूपीआई लूपहोल्स की गहरी समझ नहीं होती, जिसका फायदा उठाकर ठग उनसे एनीडेस्क या टीमव्यूअर जैसी रिमोट स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स डाउनलोड करवा लेते हैं।
- पारिवारिक आइसोलेशन: ठग बातचीत के दौरान पूछते हैं कि 'घर में आपके साथ और कौन है?' जैसे ही उन्हें पता चलता है कि बच्चे विदेश या दूसरे शहर में हैं, वे पीड़ित पर चौबीसों घंटे निगरानी रखने का दबाव बढ़ा देते हैं।
⚠️ परिजनों और संतानों के लिए विशेष सलाह
यदि आपके माता-पिता या परिवार के बुजुर्ग घर पर अकेले रहते हैं, तो उन्हें डिजिटल अरेस्ट के तौर-तरीकों के बारे में खुलकर बताएं। उनके बैंक खातों में ऑनलाइन नेट बैंकिंग और आरटीजीएस ट्रांसफर की एक सख्त दैनिक सीमा (Daily Limit) तय करें ताकि किसी भी आपात स्थिति में एक दिन में बड़ी रकम ट्रांसफर न की जा सके।
📱 स्मार्टफोन में सुरक्षा सेटिंग्स: अनचाही विदेशी वीडियो कॉल्स को कैसे रोकें?
व्हाट्सएप और अन्य मैसेंजिंग ऐप्स ने साइबर फ्रॉड से बचाव के लिए कई नए सुरक्षा फीचर्स शुरू किए हैं जिनका उपयोग हर नागरिक को तुरंत करना चाहिए:
- 'Silence Unknown Callers' फीचर: अपने व्हाट्सएप की सेटिंग्स में जाएं > Privacy > Calls > 'Silence Unknown Callers' को ऑन करें। इससे किसी भी अनजान नंबर या विदेशी कोड वाले नंबर से आने वाली कॉल पर आपका फोन नहीं बजेगा और वह केवल कॉल लिस्ट में शांत रूप से दर्ज होगी।
- ट्रूकॉलर का स्पैम प्रोटेक्शन: अपने फोन में ट्रूकॉलर या डिफॉल्ट फोन ऐप में जाकर 'Block Top Spammers' और 'Block Numbers from Foreign Countries' को सक्रिय करें।
- स्क्रीन रिकॉर्डिंग और साक्ष्य संग्रह: यदि कभी कोई फर्जी अधिकारी आपको कॉल करे, तो डरने के बजाय तुरंत दूसरे फोन से उस स्क्रीन की वीडियो रिकॉर्डिंग बना लें। यह वीडियो साक्ष्य पुलिस को उस गिरोह के सदस्यों की चेहरे से पहचान करने में सबसे ज्यादा मदद करता है।