उन सभी परिवारों, कानूनी उत्तराधिकारियों, पुत्रों, पुत्रियों और विधवाओं के लिए जिनके परिवार के किसी सदस्य की अचानक मृत्यु हो गई है और उनके बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट, पीपीएफ, शेयर, म्यूचुअल फंड या ग्रेच्युटी में लाखों रुपये फंसे हुए हैं और बैंक या कंपनी बिना कोर्ट के आदेश के पैसा देने से मना कर रही है।
काम की बात (Quick Summary):
- तहसील से जो ₹20 में 'वारिसान प्रमाण पत्र' (Family Membership / Legal Heir Certificate) बनता है, वह जमीन की खतौनी में नाम चढ़ाने के लिए तो काम आता है, लेकिन बड़े बैंक डिपॉजिट और शेयर ट्रांसफर के लिए कानूनन पर्याप्त नहीं होता।
- भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 की धारा 372 (Indian Succession Act Section 372) के तहत सक्षम दीवानी अदालत (Civil Court) से Succession Certificate बनवाना पड़ता है।
- कोर्ट का आदेश आने के बाद बैंक मैनेजर पर कोई वित्तीय जोखिम नहीं रहता, इसलिए बैंक तुरंत ब्याज सहित पूरा पैसा आवेदक के खाते में ट्रांसफर कर देता है।
- यदि सभी कानूनी उत्तराधिकारी एक साथ मिलकर सहमति (No Objection / NOC) से आवेदन करें, तो यह प्रक्रिया 3 से 6 महीने के भीतर शांतिपूर्वक पूरी हो जाती है।
संबद्ध ई-कोर्ट्स पोर्टल व केस ट्रैकिंग लिंक:
राष्ट्रीय ई-कोर्ट्स सेवा पोर्टल: services.ecourts.gov.in | ई-कोर्ट्स मोबाइल ऐप: eCourts Services App | कानूनी सहायता: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) हेल्पलाइन 15100 (निशुल्क विधिक परामर्श)
उत्तराधिकार प्रमाण पत्र क्या है और बैंक या वित्तीय संस्थान इसे कब मांगते हैं?
जब किसी व्यक्ति का देहांत बिना कोई वैध वसीयत (Will) लिखे हो जाता है (कानूनी भाषा में इसे Intestate Succession कहा जाता है), तो उसकी छोड़ी गई संपत्ति पर उसके निकटतम कानूनी उत्तराधिकारियों का अधिकार होता है। अचल संपत्ति (जैसे पुश्तैनी मकान या कृषि भूमि) के मामले में नाम परिवर्तन राजस्व विभाग और नगर निगम के दाखिल-खारिज (Mutation) से हो जाता है। परंतु चल संपत्ति (Movable Property) जैसे बैंकों में जमा नकदी, सावधि जमा (FD), कंपनी शेयर, सरकारी बांड, और भविष्य निधि के मामले में कानून बेहद सख्त है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सर्कुलर के अनुसार यदि बैंक खाते में कोई नामांकित व्यक्ति (Nominee) दर्ज है, तो बैंक बिना कोर्ट आदेश के भी क्लेम दे सकता है। परंतु निम्नलिखित स्थितियों में बैंक मैनेजर रिस्क नहीं लेता और खाताधारक के परिजनों से कोर्ट का उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) मांगता है:
- मृतक के खाते या एफडी में कोई नॉमिनी दर्ज नहीं था और क्लेम की राशि ₹5 लाख से अधिक है।
- खाते में नॉमिनी दर्ज था, लेकिन नॉमिनी की मृत्यु भी मूल खाताधारक से पहले या उसी दुर्घटना में हो चुकी है।
- परिवार के कई वारिसों (जैसे पहली पत्नी के बच्चे और दूसरी पत्नी, या भाई-बहन) के बीच पैसे को लेकर लिखित विवाद या दावेदारी आ चुकी हो।
- मृतक के नाम किसी लिस्टेड कंपनी के शेयर, डिबेंचर या म्यूचुअल फंड यूनिट्स हैं और रजिस्ट्रार एंड ट्रांसफर एजेंट (RTA) शेयर ट्रांसफर के लिए कोर्ट ऑर्डर मांग रहा हो।
- मृतक किसी फर्म या व्यक्ति से वैध व्यावसायिक कर्ज या बकाया राशि पाने का हकदार था और देनदार केवल कानूनी वारिस को ही भुगतान करना चाहता हो।
लीगल हेयर सर्टिफिकेट (वारिसान) बनाम सक्सेशन सर्टिफिकेट: मुख्य अंतर
आम जनता अक्सर तहसील से बनने वाले वारिसान प्रमाण पत्र और कोर्ट के उत्तराधिकार प्रमाण पत्र को एक ही समझ लेती है, जिससे महीनों का कीमती समय खराब होता है। नीचे दी गई तालिका में दोनों के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से समझें:
| मापदंड / विषय | लीगल हेयर सर्टिफिकेट (वारिसान) | सक्सेशन सर्टिफिकेट (Succession Certificate) | लागू कानून व प्राधिकारी | काम की व्यावहारिक सलाह |
|---|---|---|---|---|
| 1. जारी करने वाला प्राधिकारी | तहसीलदार, उपजिलाधिकारी (SDM) या राजस्व अधिकारी द्वारा जारी। | केवल सक्षम सिविल कोर्ट (जिला न्यायाधीश / सिविल जज) द्वारा जारी। | राजस्व नियम बनाम भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 | प्रशासनिक प्रमाण पत्र कोर्ट के न्यायिक आदेश के सामने कभी नहीं टिक सकता। |
| 2. मुख्य कानूनी उद्देश्य | केवल यह प्रमाणित करना कि मृतक के परिवार में कौन-कौन से जीवित सदस्य हैं। | मृतक के पैसों, कर्ज व वित्तीय प्रतिभूतियों को प्राप्त करने का पूर्ण कानूनी अधिकार देना। | पारिवारिक वंशावली बनाम वित्तीय वसूली का अधिकार | बैंक में बड़ी रकम फंसी हो तो सीधे कोर्ट में सक्सेशन की अर्जी लगाएं। |
| 3. संपत्ति का प्रकार | कृषि जमीन, पुश्तैनी मकान के दाखिल-खारिज और अनुकंपा नियुक्ति हेतु। | केवल चल संपत्ति (बैंक एफडी, शेयर, म्यूचुअल फंड, डिबेंचर, बीमा राशि)। | धारा 370 के तहत केवल चल वित्तीय संपत्तियों पर लागू | मकान-दुकान की मिल्कियत साबित करने के लिए सक्सेशन सर्टिफिकेट नहीं दिया जाता। |
| 4. सरकारी फीस व खर्च | मात्र ₹20 से ₹50 सरकारी फीस (ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल पर)। | कुल संपत्ति के मूल्यांकन का 2% से 3% कोर्ट फीस स्टाम्प। | कोर्ट फीस एक्ट (Court Fees Act) के अनुसार निर्धारित | कोर्ट फीस केवल उन्हीं खातों पर लगती है जिनका उल्लेख अर्जी में किया जाता है। |
| 5. कानूनी बाध्यता (Legal Immunity) | बैंक मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। बैंक इनकार कर सकता है। | बैंक व कंपनियां भुगतान करने के लिए 100% कानूनी रूप से बाध्य हैं। | धारा 381 के तहत भुगतानकर्ता को पूर्ण विधिक संरक्षण | कोर्ट सर्टिफिकेट पर भुगतान करने वाले बैंक मैनेजर पर कोई भविष्य का मुकदमा नहीं हो सकता। |
किन परिस्थितियों में सक्सेशन सर्टिफिकेट बनवाना अनिवार्य हो जाता है?
यदि आपके परिवार में किसी की मृत्यु हुई है, तो पहले बैंक जाकर यह समझें कि क्या मामला सामान्य क्लेम से सुलझ सकता है या कोर्ट जाना ही पड़ेगा। निम्नलिखित 4 मामलों में कोर्ट जाना 100% अनिवार्य हो जाता है:
- ₹5 लाख से अधिक की लावारिस एफडी या बचत: अधिकांश राष्ट्रीयकृत बैंक (SBI, PNB, BoB, Canara Bank) और निजी बैंक (HDFC, ICICI, Axis) बिना नॉमिनी वाले मामलों में ₹5 लाख तक की राशि इंडेम्निटी बॉन्ड (Indemnity Bond) और दो गवाहों के आधार पर जारी कर देते हैं। परंतु यदि राशि ₹5 लाख से अधिक (जैसे 10 लाख, 25 लाख या 50 लाख) है, तो बैंक बोर्ड का नियम सीधे कोर्ट के सक्सेशन सर्टिफिकेट की मांग करता है।
- डीमैट खाते में बंद पड़े शेयर और म्यूचुअल फंड: यदि मृतक के पास 1990 या 2000 के दशक के पुराने फिजिकल शेयर सर्टिफिकेट हैं या डीमैट खाते में शेयर पड़े हैं जिनकी वर्तमान बाजार कीमत लाखों में है और नॉमिनी अपडेट नहीं था, तो सेबी (SEBI) और कंपनियों के रजिस्ट्रार केवल कोर्ट का सक्सेशन सर्टिफिकेट ही स्वीकार करते हैं।
- सरकारी कर्मचारी की ग्रेच्युटी व पीएफ बिना नॉमिनेशन: यदि किसी सरकारी कर्मचारी की सेवाकाल में मृत्यु हो जाती है और सर्विस बुक में परिवार के सदस्यों का नामांकन अधूरा था, तो महालेखाकार (AG Office) और कोषागार बिना सिविल कोर्ट के आदेश के ट्रेजरी से पेंशन या ग्रेच्युटी का चेक नहीं काटते।
- विवादित उत्तराधिकार का मामला: यदि मृतक के एक से अधिक विवाह हुए थे या सौतेले भाई-बहनों के बीच क्लेम को लेकर तनातनी है, तो बैंक किसी भी एक पक्ष को पैसा देकर खुद को मुकदमे में नहीं फंसाना चाहता। ऐसी स्थिति में बैंक लिखित पत्र दे देता है कि 'कृपया न्यायालय से सक्षम आदेश लेकर आएं।'
सिविल कोर्ट में आवेदन करने के लिए आवश्यक कागजात व शपथ पत्र
अदालत में वाद (Petition under Section 372) दाखिल करने से पहले निम्नलिखित सभी आवश्यक दस्तावेजों की मूल प्रतियां और प्रमाणित फोटोकॉपी तैयार कर लें:
- मूल मृत्यु प्रमाण पत्र (Original Death Certificate): नगर निगम, ग्राम पंचायत या रजिस्ट्रार (जन्म-मृत्यु) द्वारा जारी डिजिटल मृत्यु प्रमाण पत्र सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
- मृतक के स्थायी पते का प्रमाण (Proof of Residence): आधार कार्ड, वोटर आईडी या पासपोर्ट जिससे यह सिद्ध हो कि मृतक अपनी मृत्यु के समय संबंधित जिले के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) में निवास कर रहा था।
- चल संपत्तियों का संपूर्ण लिखित ब्यौरा (Schedule of Debts and Securities):
- संबंधित बैंक का नाम, शाखा का पता, बैंक खाता संख्या, एफडी रसीद संख्या और वर्तमान बैलेंस सर्टिफिकेट।
- डीमैट खाते का क्लाइंट मास्टर लिस्ट (CML), शेयर फोलियो नंबर और कंपनियों के नाम।
- बीमा पॉलिसी संख्या और इंश्योरेंस कंपनी का स्टेटस लेटर।
- सभी कानूनी उत्तराधिकारियों का विवरण व पहचान: मृतक की पत्नी, पुत्र, अविवाहित पुत्री, माता (यदि जीवित हों) आदि के आधार कार्ड, पैन कार्ड और पासपोर्ट साइज फोटो।
- शपथ पत्र व अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC / Affidavit of Relinquishment): यदि अन्य उत्तराधिकारी किसी एक व्यक्ति (जैसे माता या बड़े भाई) के पक्ष में क्लेम छोड़ना चाहते हैं, तो उनका नोटरीकृत अनापत्ति शपथ पत्र दाखिल किया जाता है।
कोर्ट से सक्सेशन सर्टिफिकेट पाने की स्टेप-बाय-स्टेप न्यायिक प्रक्रिया
सिविल कोर्ट में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया 6 स्पष्ट न्यायिक चरणों में संपन्न होती है:
- सक्षम न्यायालय का चयन व याचिका ड्राफ्टिंग: जिस जिले में मृतक का स्थायी निवास था या जहां उसकी बैंक शाखा स्थित है, वहां के जिला न्यायाधीश (District Judge) या सिविल जज सीनियर डिवीजन के समक्ष दीवानी अधिवक्ता के माध्यम से भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के अंतर्गत याचिका दाखिल की जाती है। याचिका में मृतक के मरने की तारीख, समय, पता, सभी उत्तराधिकारियों के नाम और संपत्ति का शेड्यूल दर्ज होता है।
- याचिका की प्रारंभिक सुनवाई व समन: अदालत प्रारंभिक दस्तावेजों की जांच करके वाद को पंजीकृत (Register) करती है और परिवार के उन सभी सदस्यों को नोटिस जारी करती है जिन्होंने याचिका पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
- समाचार पत्रों में सार्वजनिक विज्ञप्ति (Public Notice in Newspapers): कोर्ट आदेश देती है कि जिले के दो प्रमुख समाचार पत्रों (एक स्थानीय भाषा जैसे हिंदी दैनिक और एक अंग्रेजी दैनिक) में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित कराई जाए। इसमें आम जनता को 30 से 45 दिनों का समय दिया जाता है कि यदि किसी को इस उत्तराधिकार पर कोई आपत्ति हो, तो वह कोर्ट में आकर अपनी आपत्ति दर्ज कराए।
- बैंक से रिपोर्ट तलब करना: अदालत संबंधित बैंकों और वित्तीय संस्थानों को पत्र भेजकर पुष्टि मांगती है कि क्या याचिका में उल्लिखित बैंक खाते और एफडी में वास्तव में उतना पैसा जमा है या नहीं। बैंक के अधिकृत अधिकारी कोर्ट में आकर विवरण सत्यापित करते हैं।
- गवाही व साक्ष्य (Evidence & Hearing): यदि 45 दिनों की अवधि में कोई सार्वजनिक आपत्ति नहीं आती, तो अदालत मुख्य याचिकाकर्ता (आवेदक) और दो स्वतंत्र गवाहों की गवाही दर्ज करती है। गवाह यह बयान देते हैं कि मृतक के यही कानूनी उत्तराधिकारी हैं और कोई अन्य वारिस छूटा नहीं है।
- कोर्ट फीस जमा करना व सर्टिफिकेट जारी होना: गवाही पूरी होने पर न्यायाधीश याचिका स्वीकार करते हुए फैसला (Judgment) सुनाते हैं। आवेदक को संपत्ति के कुल मूल्य पर निर्धारित कोर्ट फीस स्टाम्प पेपर दाखिल करने का निर्देश दिया जाता है। कोर्ट फीस जमा होते ही न्यायालय की आधिकारिक सील और न्यायाधीश के हस्ताक्षरयुक्त Certificate of Succession जारी कर दिया जाता है।
राज्यवार कोर्ट फीस, वकील का खर्च व समय-सीमा का संपूर्ण विश्लेषण
अदालती प्रक्रिया में कितना खर्च और कितना समय लगता है, इसकी यथार्थवादी जानकारी नीचे दी गई तालिका में देखें:
| खर्च का मद / चरण | सरकारी नियम व दर | अनुमानित खर्च (उदाहरण ₹10 लाख पर) | अनुमानित समय-सीमा | काम की व्यावहारिक टिप |
|---|---|---|---|---|
| न्यायिक कोर्ट फीस (Court Fees) | राज्य के कोर्ट फीस एक्ट के अनुसार कुल चल संपत्ति का 2% से 3% (अधिकतम सीमा राज्यवार भिन्न) | ₹10 लाख पर लगभग ₹20,000 से ₹25,000 | फैसले के दिन जमा करना होता है | यह फीस सीधे सरकार के खजाने में जाती है, इसकी विधिवत चालान रसीद मिलती है। |
| अखबार विज्ञप्ति (Public Notice) | दो अधिकृत समाचार पत्रों में कानूनी नोटिस प्रकाशन | ₹3,000 से ₹6,000 (दोनों अखबार मिलाकर) | केस फाइल होने के 15 दिन बाद | अखबार की पूरी मूल कॉपी संभाल कर रखें, कोर्ट में मूल पन्ना दाखिल करना होता है। |
| अधिवक्ता शुल्क (Advocate Fees) | केस की जटिलता, शहर और वकील के अनुभव पर निर्भर | ₹15,000 से ₹40,000 (परस्पर समझौते पर) | केस के विभिन्न चरणों में किश्तों में | पहले ही स्पष्ट कर लें कि ड्राफ्टिंग, नोटिस और सर्टिफाइड कॉपी का खर्च इसी में शामिल है या अलग। |
| कुल प्रक्रिया की समय-सीमा | अविवादित मामलों में जब परिवार में कोई मतभेद न हो | 3 से 6 महीने का समय | नियमित तारीखों पर उपस्थिति जरूरी | यदि परिवार के सभी सदस्य पहले ही दिन एनओसी दाखिल कर दें तो केस जल्दी निस्तारित होता है। |
| विवादित मामला होने पर | यदि कोई पक्ष वसीयत या फर्जीवाड़े की आपत्ति उठा दे | 1 से 2 वर्ष लग सकते हैं | साक्ष्य व गवाहों की जिरह के अनुसार | विवाद से बचने के लिए परिवार में बैठकर पहले ही समझौता कर लेना सबसे बुद्धिमानी है। |
कोर्ट का सर्टिफिकेट मिलने के बाद बैंक व डीमैट खाते से पैसा निकालने का तरीका
जैसे ही आपके हाथ में न्यायालय का मूल उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) आ जाता है, बैंक से पैसा प्राप्त करने की प्रक्रिया बहुत आसान हो जाती है:
- कोर्ट की प्रमाणित प्रतिलिपि (Certified Copy) लें: कोर्ट के नकल अनुभाग (Copying Section) से आदेश और सर्टिफिकेट की कम से कम 3 प्रमाणित प्रतियां निकलवाएं।
- बैंक शाखा में आवेदन पत्र दें: संबंधित बैंक प्रबंधक के नाम आवेदन पत्र लिखें और उसके साथ कोर्ट के सक्सेशन सर्टिफिकेट की प्रमाणित प्रति, अपना पैन कार्ड, आधार कार्ड और अपना सक्रिय बैंक खाता विवरण (कैंसल चेक) संलग्न करें।
- बैंक लीगल सेल द्वारा वेरिफिकेशन: बैंक शाखा उस आदेश की एक प्रति अपने जोनल लीगल एडवाइजर को भेजती है। लीगल एडवाइजर द्वारा ई-कोर्ट्स वेबसाइट से पुष्टि होते ही 3 से 7 दिनों के भीतर मृतक के खाते को बंद (Close) कर दिया जाता है और सारा पैसा ब्याज सहित आवेदक के खाते में ट्रांसफर (RTGS/NEFT) कर दिया जाता है।
- डीमैट शेयर ट्रांसफर: यदि शेयर हैं, तो अपने डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट (जैसे Zerodha, Groww, Angel One या Sharekhan) को सक्सेशन सर्टिफिकेट की नोटरीकृत प्रति और ट्रांसमिशन फॉर्म (Transmission Form) भेजें। 15 दिनों में शेयर आपके डीमैट खाते में क्रेडिट हो जाएंगे।
आपत्ति (Objection) आने पर क्या करें और सामान्य विवादों का कानूनी समाधान
1. यदि 45 दिनों के भीतर कोई अन्य रिश्तेदार आपत्ति दर्ज करा दे तो क्या होगा?
यदि कोई व्यक्ति आपत्ति दर्ज कराता है, तो न्यायालय दोनों पक्षों को अपनी बात साबित करने का अवसर देता है। यदि मामला जटिल वसीयत का निकलता है, तो अदालत धारा 373 के तहत मामले को नियमित सिविल सूट में तब्दील कर सकती है। हालांकि जब तक अंतिम फैसला नहीं होता, कोर्ट मृतक के बैंक खाते को फ्रीज (सुरक्षित) रखने का आदेश देती है ताकि कोई भी पक्ष अवैध रूप से पैसा न निकाल सके।
2. यदि सर्टिफिकेट जारी होने के बाद किसी नए बैंक खाते का पता चले?
घबराएं नहीं। इसके लिए नया केस करने की जरूरत नहीं होती। आप उसी न्यायालय में धारा 376 के तहत 'एक्सटेंशन ऑफ सक्सेशन सर्टिफिकेट' (Extension of Certificate) का प्रार्थना पत्र दे सकते हैं। न्यायालय अतिरिक्त खाते की राशि पर अतिरिक्त कोर्ट फीस लेकर मूल सर्टिफिकेट में नए खाते का नाम भी जोड़ देती है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1. क्या उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनवाने के बाद जमीन या मकान भी अपने नाम हो जाता है?
बिल्कुल नहीं। कानूनन सक्सेशन सर्टिफिकेट केवल चल संपत्ति (बैंक, एफडी, शेयर, कर्ज) के लिए होता है। जमीन या मकान के लिए तहसील में खतौनी का वरासत (Varasat / Mutation) कराना होता है या यदि कोई वसीयत है तो सिविल कोर्ट से प्रोबेट (Probate of Will) या लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन (Letters of Administration) लेना पड़ता है।
Q2. यदि खाते में नॉमिनी था, तो क्या फिर भी अन्य वारिस कोर्ट से सक्सेशन ला सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों के अनुसार, 'नॉमिनी केवल पैसों का ट्रस्टी (देखभालकर्ता) होता है, मालिक नहीं।' यदि किसी खाते में किसी एक पुत्र का नाम नॉमिनी था, लेकिन मृतक ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी, तो बाकी सभी कानूनी वारिस (माता, पत्नी, अन्य भाई-बहन) कोर्ट से सक्सेशन सर्टिफिकेट लाकर उस पैसे में अपना कानूनी हिस्सा पाने के पूर्ण हकदार हैं।
Q3. क्या कोई व्यक्ति खुद बिना वकील के सक्सेशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन कर सकता है?
सैद्धांतिक रूप से कानून में स्वयं पक्षकार के रूप में (Party-in-person) उपस्थित होने की अनुमति है। परंतु न्यायिक ड्राफ्टिंग, कानूनी धाराओं, अखबार विज्ञप्ति और साक्ष्य के नियमों की जटिलता के कारण एक अनुभवी दीवानी अधिवक्ता (Civil Advocate) के माध्यम से जाना ही व्यावहारिक, सुरक्षित और समय बचाने वाला होता है।
Q4. क्या विवाहित बेटियों को भी पिता के बैंक खातों के सक्सेशन में बराबर का हक मिलता है?
जी हाँ, 100% बराबर हक है। हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के अनुसार बेटियां (चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित) पुत्रों के बिल्कुल समान क्लास-1 लीगल हेयर हैं। कोर्ट में जब तक बेटियां अपनी अनापत्ति (NOC) न दें या अपना हिस्सा न लें, तब तक अदालत केवल बेटों के नाम सक्सेशन सर्टिफिकेट जारी नहीं करती।
Q5. क्या सक्सेशन सर्टिफिकेट की कोई एक्सपायरी डेट होती है?
नहीं। अदालत द्वारा जारी उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की कोई कानूनी एक्सपायरी डेट नहीं होती। यह जीवनभर वैध रहता है। हालांकि बैंक से क्लेम लेने में अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए क्योंकि कई बार निष्क्रिय खातों (Inoperative Accounts) का पैसा आरबीआई के डीईए फंड (Depositor Education and Awareness Fund - DEAF) में चला जाता है जिसे वापस पाने में अतिरिक्त कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है।