1. "एक राष्ट्र, एक चुनाव" क्या है और कैबिनेट का ऐतिहासिक निर्णय?
भारत में स्वतंत्रता के बाद 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही आयोजित होते थे। लेकिन 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाओं के समय पूर्व भंग होने और 1970 में लोकसभा समय से पहले भंग होने के कारण यह चुनावी चक्र बिखर गया। वर्तमान में देश में औसतन हर 3 से 6 महीने में किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट को मंजूरी देकर इस व्यवस्था को पुनः पटरी पर लाने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया है। एक राष्ट्र, एक चुनाव का अर्थ है कि पूरे देश में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के लिए मतदान एक ही समयावधि में संपन्न कराया जाएगा।
2. कोविंद समिति की प्रमुख सिफारिशें और 18,626 पृष्ठों की रिपोर्ट
सितंबर 2023 में गठित उच्चस्तरीय समिति ने 397 दिनों तक 47 राजनीतिक दलों, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों, मुख्य चुनाव आयुक्तों और आम नागरिकों के सुझावों का विश्लेषण करने के बाद अपनी 18,626 पन्नों की रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी थी:
- सर्वसम्मत निष्कर्ष: समिति ने पाया कि बार-बार होने वाले चुनावों से विकास कार्य ठप हो जाते हैं, नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) आती है और प्रशासनिक अमला व सुरक्षा बल हमेशा चुनावी ड्यूटी में व्यस्त रहते हैं।
- जीडीपी वृद्धि पर असर: अर्थशास्त्रियों के अनुसार एक साथ चुनाव होने से देश की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर में 1% से 1.5% तक का अतिरिक्त उछाल आ सकता है और मुद्रास्फीति में कमी आ सकती है।
3. दो-चरणीय फॉर्मूला: लोकसभा, विधानसभा और 100 दिनों में पंचायत चुनाव
कोविंद समिति ने एक साथ चुनाव कराने के लिए एक व्यावहारिक दो-चरणीय दृष्टिकोण (Two-Step Approach) सुझाया है:
- पहला चरण (Phase 1): एक नियत तिथि (Appointed Date) पर लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएंगे। इसके लिए उन राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल घटाया या बढ़ाया जाएगा जिनका कार्यकाल लोकसभा के साथ मेल नहीं खाता।
- दूसरा चरण (Phase 2): लोकसभा और विधानसभा चुनावों के संपन्न होने के ठीक 100 दिनों के भीतर देश की सभी नगर पालिकाओं, नगर निगमों और ग्राम पंचायतों के स्थानीय निकाय चुनाव एक साथ संपन्न कराए जाएंगे।
4. आवश्यक संविधान संशोधन (अनुच्छेद 83, 172 और 324A)
इस ऐतिहासिक सुधार को अमलीजामा पहनाने के लिए संसद में दो प्रमुख संविधान संशोधन विधेयक लाने की सिफारिश की गई है:
- पहला विधेयक (लोकसभा व विधानसभा समकालिकता): संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद के सदनों की अवधि) और अनुच्छेद 172 (राज्य विधानसभाओं की अवधि) में संशोधन किया जाएगा। इसके लिए राज्यों की विधानसभाओं के अनुसमर्थन (Ratification) की आवश्यकता नहीं होगी; संसद में दो-तिहाई बहुमत पर्याप्त होगा।
- दूसरा विधेयक (स्थानीय निकाय व एकल मतदाता सूची): अनुच्छेद 324A जोड़कर राज्य चुनाव आयोगों और भारत के चुनाव आयोग के समन्वय से एकल मतदाता सूची बनाई जाएगी। इसके लिए कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी अनिवार्य होगी।
5. एकल मतदाता सूची (Single Electoral Roll): आम नागरिक को क्या फायदा?
वर्तमान में भारत के चुनाव आयोग (ECI) की लोकसभा/विधानसभा मतदाता सूची अलग होती है और राज्य चुनाव आयोगों (SEC) की पंचायत व नगर निगम मतदाता सूची अलग होती है। कई बार नागरिकों का नाम एक लिस्ट में होता है और दूसरी में कट जाता है:
- सुधार के बाद पूरे देश के लिए एकल मतदाता सूची (Single Unified Electoral Roll) बनेगी।
- नागरिक को केवल एक बार वोटर आईडी बनवानी होगी। वही ईपीआईसी (EPIC) नंबर वार्ड पार्षद से लेकर प्रधानमंत्री के चुनाव तक हर वोट के लिए वैध रहेगा।
- मतदाता सूची दोहराव और फर्जी वोटों पर 100% लगाम लगेगी।
6. आर्थिक और प्रशासनिक प्रभाव: बार-बार आचार संहिता से मुक्ति
- आदर्श आचार संहिता (MCC) का प्रभाव: जब भी किसी राज्य में चुनाव होते हैं, 2-3 महीने तक नई सड़कों, अस्पतालों, भर्ती विज्ञापनों और कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा पर रोक लग जाती है। एक साथ चुनाव होने से 5 साल में केवल एक बार ही आचार संहिता लागू होगी, जिससे विकास परियोजनाएं बिना रुके निरंतर चलेंगी।
- चुनावी खर्च में बचत: 2024 के आम चुनाव में सरकार और राजनीतिक दलों का कुल खर्च ₹1.35 लाख करोड़ आंका गया था। एक साथ चुनाव कराने से यह भारी खर्च आधा रह जाएगा और सुरक्षा बलों के आवागमन पर होने वाले करोड़ों रुपये बचेंगे।
7. ईवीएम (EVM) और वीवीपैट (VVPAT) की जरूरत व लॉजिस्टिक्स तैयारी
भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार एक साथ चुनाव कराने के लिए बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होगी:
- हर मतदान केंद्र पर दो ईवीएम सेट (कंट्रोल यूनिट और बैलेट यूनिट) रखे जाएंगे—एक लोकसभा के लिए और एक विधानसभा के लिए।
- अनुमान के अनुसार लगभग 25-30 लाख अतिरिक्त ईवीएम और वीवीपैट मशीनों के निर्माण की आवश्यकता होगी, जिसके लिए सरकारी उपक्रमों (BEL और ECIL) को ऑर्डर दिए जाएंगे।
- केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की तैनाती केवल एक बार में योजनाबद्ध तरीके से की जा सकेगी।
8. त्रिशंकु विधानसभा या अविश्वास प्रस्ताव की स्थिति में क्या नियम होंगे?
यदि किसी राज्य में सरकार गिर जाए या त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) बने, तो क्या पूरे देश में दोबारा चुनाव होंगे? कोविंद समिति ने इसके लिए स्पष्ट नियम तय किया है:
- अवशेष अवधि का सिद्धांत (Unexpired Term): ऐसी स्थिति में मध्यावधि चुनाव (Mid-term Elections) केवल बचे हुए कार्यकाल के लिए होंगे।
- उदाहरण: यदि 2029 में चुनाव हुए और 2031 में किसी राज्य सरकार का पतन हो गया, तो नई चुनी गई विधानसभा पूरे 5 साल नहीं चलेगी बल्कि केवल शेष 3 वर्ष (2034 तक) ही कार्य करेगी, ताकि अगला चुनाव पुनः देश के साथ ही हो।
9. विपक्षी दलों की आपत्तियां और संघवाद (Federalism) पर बहस
विपक्ष के प्रमुख दलों ने इस प्रस्ताव पर कुछ आपत्तियां दर्ज कराई हैं:
- क्षेत्रीय मुद्दों का दबना: आशंका जताई गई है कि राष्ट्रीय लहर या बड़े राष्ट्रीय मुद्दों के सामने राज्यों के स्थानीय और बुनियादी मुद्दे गौण हो सकते हैं।
- संविधान के मूल ढांचे पर सवाल: कुछ दलों का मानना है कि राज्यों की स्वायत्तता और संघवाद (Federal Structure) के लिए विधानसभाओं का स्वतंत्र कार्यकाल आवश्यक है।
- सरकार का तर्क है कि यूरोप, दक्षिण अफ्रीका और स्वीडन सहित कई लोकतंत्रों में यह प्रणाली दशकों से सफलतापूर्वक काम कर रही है।
10. आम भारतीय मतदाता पर क्या सीधा असर पड़ेगा?
- मतदाता को एक ही दिन मतदान केंद्र पर जाकर दो अलग-अलग ईवीएम पर वोट डालना होगा—एक अपने सांसद (MP) के लिए और एक अपने विधायक (MLA) के लिए।
- सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों को बार-बार चुनावी ड्यूटी और जनगणना से मुक्ति मिलेगी और वे अपने मूल शैक्षणिक व प्रशासनिक कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
- व्यापारियों और आम नागरिकों को बार-बार धारा 144, रैलियों के जाम और नकदी आवाजाही पर लगने वाले प्रतिबंधों से राहत मिलेगी।
11. लागू होने की संभावित समय-सीमा और आगे के विधिक कदम
कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब संसद के आगामी सत्र में विधिक मसौदा पेश किया जाएगा। इसके बाद एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) इसका विस्तृत अध्ययन कर सकती है। यदि यह कानून 2025-26 तक पारित हो जाता है, तो देश में 2029 के आम चुनावों से "एक राष्ट्र, एक चुनाव" का पहला चरण औपचारिक रूप से लागू होने की प्रबल संभावना है।