documents ⏱️ 5 मिनट पढ़ें 📅 16 सितंबर 2026

धारा 143 (धारा 80) जमीन अकृषक (Non-Agricultural) करवाने की प्रक्रिया: नियम, शुल्क, SDM आदेश व ई-डिस्ट्रिक्ट गाइड

अमित कुमार
अमित कुमार
वरिष्ठ विधिक एवं लोक सेवा सलाहकार

विधि स्नातक (LL.B.) और प्रशासनिक नियमों (DoPT, नागरिक अधिकार चार्टर, राजस्व संहिता) के विशेषज्ञ। विगत 8 वर्षों से ई-डिस्ट्रिक्ट सेवाओं, सिविल प्रमाण पत्रों, जाति, आय, निवास, और भूमि रिकॉर्ड प्रक्रियाओं पर प्रामाणिक तथ्य-जांच व विधिक मार्गदर्शन दे रहे हैं।

⚡ त्वरित उत्तर (Quick Answer)

जमीन को अकृषक (धारा 143/80) कराने के लिए भूस्वामी को संबंधित तहसील के उपजिलाधिकारी (SDM) न्यायालय में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करना होता है। इसके साथ प्रमाणित खतौनी, खसरा, प्रस्तावित नक्शा और शपथ पत्र संलग्न किया जाता है। एसडीएम द्वारा इस पत्रावली को तहसीलदार और लेखपाल को स्थलीय जांच हेतु भेजा जाता है। लेखपाल मौके पर जाकर पंचनामा बनाता है कि जमीन पर कोई फसल नहीं बोई जा रही है और इसका उपयोग आबादी, दुकान या उद्योग हेतु हो रहा है। इसके बाद आवेदक ट्रेजरी में निर्धारित कोर्ट शुल्क (सर्किल रेट का 1%) जमा करता है। यदि कोई सार्वजनिक आपत्ति नहीं आती है, तो एसडीएम धारा 80/143 का घोषणात्मक आदेश (Declaration Order) पारित करते हैं, जिसके बाद राजस्व अभिलेखों (खतौनी) में जमीन का प्रकार 'कृषि' से बदलकर 'गैर-कृषि आबादी' कर दिया जाता है।

पैरामीटरआधिकारिक विवरण
प्रक्रिया / आदेश का नामकृषि से गैर-कृषि (अकृषक) भूमि उपयोग परिवर्तन घोषणा (Section 80 / 143 Declaration)
सक्षम प्राधिकारी न्यायालयउपजिलाधिकारी (SDM / Assistant Collector First Class) कोर्ट
जांच अधिकारीतहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो (राजस्व निरीक्षक) व क्षेत्रीय लेखपाल
आवेदन माध्यमराज्य राजस्व ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल (जैसे UP e-District, MP Bhulekh, Dharni आदि) अथवा ऑफलाइन कोर्ट
सरकारी कोर्ट शुल्क (Court Fee)कृषि सर्किल रेट का 1% से 2% (राज्य नियमावली अनुसार)
समय सीमा (Time Limit)आवेदन से अंतिम आदेश तक 45 कार्य दिवस
कानूनी प्रभावभूमि पर उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता के कृषि नियम (जैसे धारा 89 सीलिंग, उत्तराधिकार) समाप्त होकर सामान्य संपत्ति कानून लागू होते हैं
खतौनी में प्रभावखतौनी में श्रेणी 1-क (खेती) से हटकर भूमि 'अकृषक (आबादी/व्यावसायिक)' दर्ज हो जाती है
राजस्व परिषद एवं भूमि विकास प्राधिकरण कानूनी नियम: यदि आप किसी कृषि भूमि (खेती की जमीन) पर मकान, दुकान, गोदाम, स्कूल, फैक्ट्री, रिसॉर्ट या व्यावसायिक परिसर का निर्माण करना चाहते हैं, तो सबसे पहले राजस्व संहिता के तहत उस भूमि का उपयोग परिवर्तन (Land Use Conversion) कराना अनिवार्य होता है। उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश अधिनियम की पुरानी धारा 143 (जो अब उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 80 बन चुकी है, तथा अन्य राज्यों में धारा 90A/NA Order के नाम से जानी जाती है) के तहत उपजिलाधिकारी (SDM) कोर्ट से आदेश पारित कराया जाता है। बिना धारा 143/80 कराए कृषि भूमि पर निर्माण करना अवैध अतिक्रमण माना जाता है, जिस पर विकास प्राधिकरण ध्वस्तीकरण (Bulldozer Action) की कार्रवाई कर सकते हैं और बैंक होम लोन देने से इनकार कर देते हैं।

1. धारा 143 / धारा 80 क्या है और यह क्यों आवश्यक है? {#1-क्या-है-धारा-143}

धारा 143 (धारा 80) जमीन अकृषक (Non-Agricultural) करवाने की प्रक्रिया: नियम, शुल्क, SDM आदेश व ई-डिस्ट्रिक्ट गाइड
चित्र: धारा 143 (धारा 80) जमीन अकृषक (Non-Agricultural) करवाने की प्रक्रिया: नियम, शुल्क, SDM आदेश व ई-डिस्ट्रिक्ट गाइड बनवाने की आधिकारिक सरकारी प्रक्रिया एवं आवश्यक दस्तावेजों की वैधानिक गाइड।

भारतीय भूमि कानूनों के अनुसार प्रत्येक जमीन का एक विशिष्ट उपयोग (Land Use) राजस्व अभिलेखों में दर्ज होता है।

  • ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकांश जमीनें 'कृषि भूमि (Agricultural Land)' के रूप में दर्ज होती हैं।
  • यदि कोई व्यक्ति खेती की जमीन खरीदकर उस पर सीधे प्लॉटिंग करता है, मकान बनाता है या गोदाम डालता है, तो यह कानून का उल्लंघन है।
  • धारा 143 (अब धारा 80): यह राजस्व न्यायालय की वह शक्ति है जिसके द्वारा एसडीएम यह आधिकारिक घोषणा करता है कि अमुक गाटा/खसरा संख्या की भूमि अब खेती के उपयोग में नहीं रही है और इसका उपयोग आवासीय (Residential), औद्योगिक (Industrial), व्यावसायिक (Commercial) या संस्थागत कार्यों हेतु किया जाएगा।

2. कृषि से गैर-कृषि कराने के मुख्य कानूनी व वित्तीय लाभ {#2-मुख्य-लाभ}

जमीन की धारा 143/80 हो जाने से संपत्ति धारक को निम्नलिखित महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त होते हैं:

  1. बैंक होम लोन की सुगमता: राष्ट्रीयकृत बैंक और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां (HDFC, SBI, LIC HFL) कृषि भूमि पर मकान बनाने हेतु लोन नहीं देतीं। धारा 143 का आदेश होने पर ही 100% होम लोन स्वीकृत होता है।
  2. मास्टर प्लान और मानचित्र (Map Approval) स्वीकृति: नगर निगम, नगर विकास प्राधिकरण (जैसे BDA, LDA, GDA आदि) केवल उसी जमीन पर भवन का नक्शा पास करते हैं जो राजस्व रिकॉर्ड में गैर-कृषि घोषित हो।
  3. राजस्व उत्तराधिकार नियमों से मुक्ति: कृषि भूमि में उत्तराधिकार राजस्व संहिता की धारा 108/110 के अनुसार चलता है (जिसमें विवाहित बेटियों को हिस्सा नहीं मिलता था)। धारा 143 होने के बाद भूमि पर 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम' या हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू हो जाता है, जिससे संपत्ति सामान्य मकान की तरह वसीयत या बच्चों में विभाजित हो सकती है।
  4. प्लॉटिंग व बिक्री में सुरक्षा: बिल्डरों या कॉलोनाइजरों द्वारा बेचे जाने वाले प्लॉट यदि धारा 143 पास हैं, तो खरीदार को भविष्य में किसी कानूनी पचड़े का सामना नहीं करना पड़ता।
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3. किन जमीनों की धारा 143 नहीं हो सकती (प्रतिबंधित भूमियां) {#3-प्रतिबंधित-भूमियां}

एसडीएम न्यायालय निम्नलिखित प्रकार की भूमियों पर कभी भी धारा 143 का आदेश नहीं कर सकता:

  • ग्राम सभा की सार्वजनिक भूमि: चकमार्ग, तालाब, चारागाह, श्मशान, कब्रिस्तान, खलिहान या नवीन परती।
  • अहस्तांतरणीय अधिकार वाले पट्टे की जमीन (Patta Land): जिस पर भूमिधर का स्थायी अधिकार न हो।
  • सरकारी अधिग्रहण में आई जमीन: जिस भूमि पर NHAI, रेलवे या एक्सप्रेसवे का अधिग्रहण प्रस्तावित या 3D अधिसूचना जारी हो चुकी हो।
  • मास्टर प्लान में ग्रीन बेल्ट / कृषि आरक्षित क्षेत्र: यदि विकास प्राधिकरण के जोनल प्लान में वह क्षेत्र केवल हरित पट्टी घोषित है।
  • न्यायालय में विचाराधीन भूमि: जिस पर सक्षम दीवानी अदालत से कोई स्थगन आदेश (Stay Order) लागू हो।

4. अनिवार्य दस्तावेज चेकलिस्ट {#4-आवश्यक-दस्तावेज}

एसडीएम कोर्ट या ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल पर आवेदन हेतु निम्नलिखित दस्तावेज आवश्यक हैं:

  1. वर्तमान वर्ष की प्रमाणित खतौनी (Certified Copy of RoR)।
  2. भू-नक्शा (शजरा मैप की प्रमाणित प्रति): जिसमें संबंधित गाटा संख्या और चौहद्दी (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) लाल स्याही से चिह्नित हो।
  3. प्रस्तावित निर्माण का ले-आउट प्लान: यदि व्यावसायिक या आवासीय उपयोग है।
  4. आवेदक का आधार कार्ड व पैन कार्ड।
  5. ₹100 के ई-स्टाम्प पेपर पर शपथ पत्र: कि भूमि पर कोई विवाद, बैंक बंधक या सरकारी अधिग्रहण लंबित नहीं है।
  6. सह-खातेदारों की अनापत्ति (NOC): यदि जमीन संयुक्त खाते की है, तो सभी सह-खातेदारों की सहमति आवश्यक होती है।

5. एसडीएम कोर्ट में आवेदन व स्थलीय जांच की चरणबद्ध प्रक्रिया {#5-चरणबद्ध-प्रक्रिया}

```mermaid

graph TD

A[नागरिक / अधिवक्ता द्वारा SDM कोर्ट में धारा 80/143 वाद दायर] --> B[तहसीलदार को स्थलीय आख्या हेतु पत्रावली प्रेषित]

B --> C[क्षेत्रीय लेखपाल व कानूनगो द्वारा स्थलीय जांच व पंचनामा]

C --> D[तहसीलदार द्वारा आख्या अनुमोदन व एसडीएम कोर्ट वापसी]

D --> E[सार्वजनिक नोटिस जारी 30 दिन की आपत्ति आमंत्रण]

E --> F[निर्धारित सरकारी ट्रेजरी कोर्ट शुल्क का भुगतान]

F --> G[एसडीएम द्वारा अकृषक घोषणा का अंतिम न्यायिक आदेश]

G --> H[राजस्व रजिस्टर आर-6 व खतौनी में परवाना अमलदरामद]

```

  1. वाद दाखिला (Filing of Suit): आवेदक अपने वकील के माध्यम से या ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल पर धारा 80 राजस्व संहिता के अंतर्गत वाद दाखिल करता है।
  2. लेखपाल स्थलीय जांच: क्षेत्रीय लेखपाल मौके पर जाता है और देखता है कि वर्तमान में जमीन का क्या उपयोग हो रहा है। वह पड़ोसी काश्तकारों के बयान लेता है और अपनी नजरी नक्शा रिपोर्ट तैयार करता है।
  3. सार्वजनिक विज्ञप्ति (Public Notice): तहसील के नोटिस बोर्ड और ग्राम पंचायत में नोटिस चस्पा किया जाता है कि यदि किसी व्यक्ति को इस जमीन को अकृषक घोषित करने में आपत्ति हो, तो वह 30 दिनों के भीतर अपनी आपत्ति दर्ज कराए।
  4. सुनवाई व आदेश: यदि कोई आपत्ति नहीं आती है और शुल्क जमा हो जाता है, तो उपजिलाधिकारी औपचारिक आदेश पारित करते हैं।

6. सरकारी शुल्क और सर्किल रेट का निर्धारण {#6-शुल्क-निर्धारण}

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता के नियमों के अनुसार:

  • यदि जमीन पर निर्माण पहले ही हो चुका है या प्रस्तावित है, तो उस क्षेत्र के कृषि सर्किल रेट के अनुसार आकलित कुल मूल्य का 1% सरकारी ट्रेजरी चालान के माध्यम से जमा करना होता है।
  • औद्योगिक उपयोग के मामले में सरकार अक्सर छूट प्रदान करती है (जैसे 0.5% या एमएसएमई हेतु पूर्ण छूट)।
  • ट्रेजरी चालान भारतीय स्टेट बैंक या ऑनलाइन e-Challan / e-Gras पोर्टल के माध्यम से सीधे राज्य संचित निधि (Consolidated Fund) में जमा किया जाता है।

7. खतौनी में अकृषक प्रविष्टि कैसे दर्ज होती है? {#7-खतौनी-प्रविष्टि}

एसडीएम द्वारा आदेश पारित होने के बाद प्रक्रिया पूरी नहीं होती; उसका राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज होना सबसे महत्वपूर्ण चरण है:

  1. एसडीएम कोर्ट से एक 'परवाना अमलदरामद' तहसीलदार/रजिस्ट्रार कानूनगो को भेजा जाता है।
  2. कंप्यूटर ऑपरेटर भूलेख पोर्टल में संबंधित गाटा संख्या पर धारा 80 का आदेश फीड करता है।
  3. आगामी खतौनी में उस जमीन की श्रेणी बदलकर 'श्रेणी 6(2) - अकृषक भूमि (स्थल, सड़कें, रेलवे, इमारतें आदि)' दर्ज हो जाती है।
  4. इसके बाद वह जमीन जीवन भर के लिए गैर-कृषि हो जाती है और उस पर कोई कृषि लगान (Land Revenue) देय नहीं होता।

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  • Meta Description: खेती की जमीन को आबादी या मकान हेतु गैर-कृषि (धारा 143/80) कराने की संपूर्ण कानूनी प्रक्रिया। एसडीएम कोर्ट आवेदन, लेखपाल जांच, सरकारी फीस व खतौनी अमलदरामद नियम।
  • Discover Recommended Image: 1200x675px (16:9), कृषि खेत से आवासीय प्लॉट में परिवर्तन का दृश्य, उपजिलाधिकारी न्यायालय की फाइल और गैर-कृषि खतौनी का आधिकारिक प्रोफार्मा।

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```

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q. क्या जमीन के किसी एक छोटे टुकड़े (अंश) की धारा 143 हो सकती है?

A. हाँ। यदि आपके पास 1 बीघा जमीन है और आप केवल 200 वर्ग गज पर दुकान या मकान बनाना चाहते हैं, तो आप केवल उस विशिष्ट 200 वर्ग गज क्षेत्र का चौहद्दी सहित नक्शा लगाकर आंशिक अकृषक आदेश (Partial Land Conversion) करवा सकते हैं। शेष भूमि पर कृषि अधिकार यथावत बने रहेंगे।

Q. यदि बिना धारा 143 कराए खेती की जमीन पर मकान बना लिया जाए, तो क्या होगा?

A. यदि बिना धारा 143 कराए निर्माण किया जाता है, तो राजस्व विभाग इसे अवैध मानकर धारा 82 के तहत भारी जुर्माना लगा सकता है। इसके अलावा स्थानीय विकास प्राधिकरण बिना नोटिस के भवन को सील या ध्वस्त कर सकता है और कोई भी बैंक उस संपत्ति पर लोन या मोर्टगेज स्वीकार नहीं करेगा।

Q. क्या धारा 143 होने के बाद जमीन को दोबारा खेती में बदला जा सकता है?

A. हाँ, यदि कोई किसान पुनः उस भूमि पर खेती शुरू करना चाहता है, तो वह राजस्व संहिता की धारा 81 के तहत एसडीएम कोर्ट में आवेदन करके अकृषक आदेश को निरस्त करवाकर उसे पुनः कृषि भूमि दर्ज करवा सकता है।

Q. क्या धारा 143 (धारा 80) जमीन अकृषक (Non-Agricultural) करवाने की को डिजिलॉकर (DigiLocker) में रखना कानूनी रूप से मान्य है?

A. हाँ, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 और आईटी नियम 2016 के नियम 9A के तहत डिजिलॉकर में उपलब्ध डिजिटल दस्तावेज को मूल भौतिक कागजात के बराबर 100% कानूनी मान्यता प्राप्त है।

Q. इस प्रमाण पत्र / कार्ड की आधिकारिक वैधता (Validity) कितने समय की होती है?

A. अधिकांश सरकारी पहचान और सिविल प्रमाण पत्र (जैसे आधार, जन्म, जाति, निवास) आजीवन (Lifetime) मान्य होते हैं, जबकि आय प्रमाण पत्र सामान्यतः 3 वर्ष और ईडब्ल्यूएस 1 वित्तीय वर्ष के लिए मान्य होता है।