1. डिजिटल इंडिया एक्ट 2026 क्या है और पुराने IT Act से कैसे अलग है?
जब वर्ष 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act 2000) बनाया गया था, तब भारत में इंटरनेट अपने शुरुआती दौर में था और देश में 55 लाख से भी कम इंटरनेट उपयोगकर्ता थे। उस समय स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, क्लाउड कंप्यूटिंग, क्रिप्टो और जेनेरेटिव एआई का कोई अस्तित्व नहीं था। वर्तमान में 90 करोड़ से अधिक भारतीयों के इंटरनेट से जुड़ने के बाद पुराना कानून साइबर अपराधों और नई प्रौद्योगिकियों से निपटने में अपर्याप्त साबित हो रहा था।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय (MeitY) द्वारा तैयार किया गया डिजिटल इंडिया एक्ट 2026 (Digital India Act) 21वीं सदी का एक समकालीन, भविष्योन्मुखी कानून है। इसका उद्देश्य भारत के इंटरनेट को खुला (Open), सुरक्षित (Safe), विश्वसनीय (Trusted) और जवाबदेह (Accountable) बनाना है। यह कानून केवल अपराधों की सजा तय नहीं करता, बल्कि नागरिकों के डिजिटल अधिकारों की गारंटी भी देता है।
2. DPDP एक्ट के नए नियम: नागरिकों के निजता अधिकार और डेटा सहमति
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) नियमों के तहत डेटा फिड्यूशरी (डेटा एकत्र करने वाली कंपनियां जैसे बैंक, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया) के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं:
- स्पष्ट व सरल भाषा में सहमति (Unambiguous Consent): अब कंपनियां 20 पेजों के लंबे अंग्रेजी कानूनी दस्तावेजों में छुपाकर सहमति नहीं ले सकतीं। सहमति का नोटिस संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल सभी 22 भारतीय भाषाओं में अत्यंत सरल शब्दों में देना होगा।
- डेटा मिनिमलाइजेशन (Data Minimisation): कंपनियां केवल उसी सेवा के लिए आवश्यक न्यूनतम डेटा मांग सकती हैं। उदाहरण के लिए, कैब बुकिंग ऐप को आपके कॉन्टैक्ट्स या माइक्रोफोन के एक्सेस की मांग करने की अनुमति नहीं होगी।
- सहमति वापस लेने का अधिकार: नागरिक किसी भी समय एक क्लिक में अपनी दी गई सहमति वापस ले सकते हैं और कंपनी को उनका डेटा अपने सर्वर से पूरी तरह डिलीट करना होगा।
3. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक पर सख्त सरकारी नियम
एआई और डीपफेक तकनीक के दुरुपयोग से प्रतिष्ठा हनन और वित्तीय धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों को देखते हुए कड़े प्रावधान किए गए हैं:
- अनिवार्य वॉटरमार्किंग (AI Watermarking): एआई द्वारा बनाई गई किसी भी तस्वीर, वीडियो या ऑडियो पर स्पष्ट दृश्य या डिजिटल वॉटरमार्क होना अनिवार्य होगा ताकि आम नागरिक जान सकें कि सामग्री कृत्रिम रूप से बनाई गई है।
- डीपफेक हटाने की समय-सीमा: यदि कोई डीपफेक या अश्लील छेड़छाड़ की गई सामग्री सोशल मीडिया पर अपलोड होती है, तो शिकायत मिलने के 24 से 36 घंटे के भीतर प्लेटफॉर्म को उसे हटाना (Take down) होगा।
- एल्गोरिदम पूर्वाग्रह (Algorithmic Bias): एआई मॉडल किसी भी जाति, धर्म, लिंग या समुदाय के विरुद्ध पक्षपातपूर्ण या भेदभावपूर्ण निर्णय नहीं दे सकते।
4. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के सेफ हार्बर (Safe Harbour) की समीक्षा
पुराने आईटी एक्ट की धारा 79 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों (जैसे X, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब) को 'सेफ हार्बर' सुरक्षा प्राप्त थी, जिसका अर्थ था कि उनके प्लेटफॉर्म पर किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा पोस्ट की गई गैरकानूनी सामग्री के लिए कंपनी को सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता था।
डिजिटल इंडिया एक्ट में इस सेफ हार्बर की पुनर्परिभाषा की जा रही है। यदि कोई प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिदम के जरिए हिंसा, अश्लीलता या राष्ट्रविरोधी गलत सूचना को जानबूझकर वायरल (Amplify) करता है, तो वह कानूनी छूट खो देगा और उसके अधिकारियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत अभियोजन चलाया जा सकेगा।
5. डार्क पैटर्न्स पर बैन: ई-कॉमर्स साइट्स की भ्रामक ट्रिक्स पर रोक
ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स और ऐप्स अक्सर उपयोगकर्ताओं को धोखा देकर अतिरिक्त पैसे वसूलने के लिए 'डार्क पैटर्न्स' का इस्तेमाल करते थे:
- फाल्स अर्जेंसी (False Urgency): कृत्रिम रूप से दिखाना कि "केवल 2 टिकट बचे हैं!" जबकि वास्तविक में सीटें खाली हों।
- बास्केट स्नीकिंग (Basket Sneaking): चेकआउट के समय चुपके से दान, बीमा या अतिरिक्त डिलीवरी चार्ज जोड़ देना।
- सब्सक्रिप्शन ट्रैप (Roach Motel): सब्सक्रिप्शन लेना तो एक क्लिक में आसान हो, लेकिन उसे कैंसिल करने के लिए 10 पेजों का फॉर्म भरना पड़े।
- नए नियमों के तहत इन सभी अनैतिक ट्रिक्स को अवैध घोषित किया गया है और उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण द्वारा भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
6. बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा: पैरेंटल कंसेंट और टारगेटेड ऐड्स पर प्रतिबंध
18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के डिजिटल भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं:
- बच्चों का व्यक्तिगत डेटा प्रोसेस करने से पहले माता-पिता की सत्यापनीय सहमति (Verifiable Parental Consent) लेना अनिवार्य होगा।
- बच्चों के व्यवहार को ट्रैक करने वाले ऐड्स (Targeted Advertising) और उन्हें स्क्रीन का आदी बनाने वाले एल्गोरिदम पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
- स्कूलों और एजुकेशनल ऐप्स द्वारा बच्चों के बायोमेट्रिक और व्यक्तिगत डेटा को किसी तीसरे पक्ष के साथ साझा करने की मनाही होगी।
7. भारी जुर्माने का प्रावधान: ₹250 करोड़ तक की पेनल्टी
डेटा सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों के लिए अभूतपूर्व वित्तीय दंड का प्रावधान किया गया है:
- डेटा सुरक्षा मानकों में लापरवाही बरतने और डेटा लीक होने पर: ₹250 करोड़ तक का जुर्माना।
- बच्चों के डेटा सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने पर: ₹200 करोड़ तक का जुर्माना।
- डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड को सूचना न देने या नोटिस की अनदेखी पर: ₹150 करोड़ तक का जुर्माना।
8. डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया (DPBI): नागरिक शिकायत कैसे दर्ज करें?
कानून को लागू करने और नागरिकों की शिकायतों के निवारण के लिए एक स्वतंत्र अर्ध-न्यायिक निकाय डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया (DPBI) की स्थापना की जा रही है:
- यह बोर्ड पूर्णतः डिजिटल कार्यालय (Digital Office) के रूप में कार्य करेगा।
- यदि कोई बैंक, टेलीकॉम कंपनी या ऐप आपके डेटा का दुरुपयोग करती है या आपका डेटा लीक होता है, तो नागरिक ऑनलाइन पोर्टल पर डिजिटल शिकायत दर्ज करा सकेंगे।
- बोर्ड कंपनियों को तलब कर सकता है, जांच का आदेश दे सकता है और सीधे जुर्माना अधिरोपित कर सकता है।
9. टेक कंपनियों और भारतीय स्टार्टअप्स पर नए कानून का प्रभाव
छोटे भारतीय स्टार्टअप्स और एमएसएमई पर अनावश्यक अनुपालन बोझ न पड़े, इसके लिए सरकार ने चरणबद्ध छूट (Graduated Exemptions) का प्रावधान किया है। अत्यधिक संवेदनशील और महत्वपूर्ण डेटा संभालने वाली बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों को 'महत्वपूर्ण डेटा फिड्यूशरी' (Significant Data Fiduciary - SDF) के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा, जिन्हें स्वतंत्र डेटा ऑडिटर नियुक्त करना होगा।
10. एक आम इंटरनेट यूजर के तौर पर आपको कौन से नए अधिकार मिलेंगे?
- सूचना पाने का अधिकार: जानने का अधिकार कि किसी कंपनी के पास आपका क्या-क्या डेटा है और वह उसे किसके साथ शेयर कर रही है।
- डेटा सुधार का अधिकार: गलत या पुराने डेटा को ठीक कराने का अधिकार।
- डेटा मिटाने का अधिकार (Right to Erasure): कार्य पूरा होने के बाद अपने डेटा को कंपनियों के सिस्टम से हमेशा के लिए डिलीट कराने का अधिकार।
- शिकायत निवारण का अधिकार: 30 दिनों के भीतर कंपनी से संतोषजनक उत्तर न मिलने पर सीधे डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड जाने का अधिकार।